भारतीय शिक्षण प्रणालीका इतिहास और उसका अंग्रेजों द्वारा किया गया निकंदन - भाग 4
भाग 4
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अंग्रेजों के इस निर्णय का परिणाम यह आया की गाओंकी स्वयंसंचालित अर्थव्यवस्था टूट गई और लोग दरिद्र होने लगे. भारतीय समाज अंग्रेजों के द्वारा की जाने वाली व्यवस्था के लिए लाचार बन गए. अंग्रेज यदि वास्तवमें केन्द्रीय रूपसे व्यवस्था करना चाहते तो भी इतने बड़े देशमें यह करना उनके लिए उस समय संभव नहीं था. और फिर वे तो करना ही नहीं चाहते थे. गाँव की पाठशालाएँ बंध हो चुकी थी, और कुछएक महानगरों में चलने वाली अंग्रेजी स्कूलोंमें पढ़ानेके लिए गांवके लोगोके पास ना ही पैसे थे और ना ही उन्हें ऐसा अंग्रेजी शिक्षण लेना आवश्यक लग रहा था.
इन सबका परिणाम यह आया की 100% साक्षरता वाला देश कुछ ही दशकों में महत्तम रूपसे निरक्षर बन गया (स्वतंत्रता के समय भारत की साक्षरता 14% थी). केवल बहोत ही थोड़े वर्ग के लोग अंग्रेजी स्कूलों में भर्ती हो रहे थे, और यही लोग साक्षर बन रहे थे. साथ ही साथ कम्पनी सरकार द्वारा भारतके संसाधनों की अत्यधिक लूट हो रही थी जिससे समाज और दरिद्र बन रहा था. सदिओं से चली आ रही सिंचाई व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी थी, कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अकाल पड़ना एक सामान्य बात हो चुकी थी. शिक्षण न मिलने के कारण भारतका समाज केवल एक ही पीढ़ी के बाद आर्थिक रूपसे अत्यंत दरिद्र और मानसिक रूपसे हतोत्साहित हो जाने वाला था.
अंग्रेज केवल इतने से संतुष्ट नहीं होने वाले थे. वे यह चाहते थे की हिन्दू समाज अपने मूलभुत संस्कार भूल कर इसाई बन जाएं. एक ऐसा इसाई समाज जो विचार, वाणी और रूचि से पुर्णतः अंग्रेज हो. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मेकोले अब क्या करता है? देखेंगे भाग-5 में.
(जिस केन्द्रीय व्यवस्था का वचन अंग्रेजों ने 1835 में दिया था वह व्यवस्था आज स्वतंत्रता के 67 वर्ष पश्चात भी, भारत की अपनी सरकार नहीं दे पाई है! अंग्रेज केवल केंद्रीय न्याय प्रणाली दे पायें है जो की उनके स्वयं के हित में थी. स्वतंत्रता के उपरांत भी भारत यह अंग्रेजों की दी गई अधम न्याय प्रणाली को कार्यक्षम नहीं बना पाएं है. न्याय, सिंचाई और खाद्यान्न व्यवस्था जिस दयनीय परितस्थिति में आज है इतनी इतिहास में कभी नहीं थी. और निकट के भविष्यमें यह व्यवस्था पर्याप्त रूपसे उपलब्ध होनेकी कोई अपेक्षा भी नहीं है.)
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Indian Education Board का चेयरमैन मेकोले 19वी
सदी के आरंभ से ही देशमें इसाई मिशनरी स्कूलें बनाने लगा था. किंतु केवल
इसाई मिशनरी स्कूलें बनाने से काम नहीं बनने वाला था. परापूर्व से चली आ रही भारत
की सुद्रढ़ शिक्षण प्रणाली को मिटाने के लिए सर्वप्रथम तो गांव गांव में फैली देसी
पाठशालाओं को ध्वस्त करना अनिवार्य था. इसलिए मेकोले ने ऐसे नियम बनाए की जो
पाठशालाएँ पक्की ईमारत से न बनी हो, या अमुक विदेशी विषय न पढ़ाती हो ऐसी पाठशालाएँ
असंवैधानिक बन गई. उस समयकी पाठशालाएँ पेड़ के निचे खुलेमें बैठकर चलाई जाती थी. जो
भी ज्ञान दिया जाता था वो प्रत्यक्ष और प्रायोगिक (practical) ज्ञान दिया जाता था.
और विषय पढ़ाने वाले शिक्षक भी केवल देशी
विषय ही जानते थे.
पक्की पाठशालाओं के उपरांत एक और नियम अंग्रेज लाए जिसने भारतकी समाज व्यवस्थाकी कमर तोड़ दी. जैसा हमने भाग 3 में देखा की गाओंकी 35% से 50% भूमि खुली छोडी जाती थी. अंग्रेजोंने इसको कम करके केवल 5% कर दिया. भारतियोंने इस निर्णय का विरोध किया, किंतु अंग्रेजोंने यह कहकर उन्हें समजा दिया की गावों की सिंचाई व्यवस्था, शिक्षण व्यवस्था, खाद्यान्न व्यवस्था, न्याय व्यवस्था इत्यादि के लिए अंग्रेज केन्द्रीय रूपसे व्यवस्था कर देंगे. इसका अर्थ था की भारतीय परंपरा से पूर्णरूप से विपरीत व्यवस्था प्रस्थापित की जाने वाली थी.
पक्की पाठशालाओं के उपरांत एक और नियम अंग्रेज लाए जिसने भारतकी समाज व्यवस्थाकी कमर तोड़ दी. जैसा हमने भाग 3 में देखा की गाओंकी 35% से 50% भूमि खुली छोडी जाती थी. अंग्रेजोंने इसको कम करके केवल 5% कर दिया. भारतियोंने इस निर्णय का विरोध किया, किंतु अंग्रेजोंने यह कहकर उन्हें समजा दिया की गावों की सिंचाई व्यवस्था, शिक्षण व्यवस्था, खाद्यान्न व्यवस्था, न्याय व्यवस्था इत्यादि के लिए अंग्रेज केन्द्रीय रूपसे व्यवस्था कर देंगे. इसका अर्थ था की भारतीय परंपरा से पूर्णरूप से विपरीत व्यवस्था प्रस्थापित की जाने वाली थी.
अंग्रेजों के इस निर्णय का परिणाम यह आया की गाओंकी स्वयंसंचालित अर्थव्यवस्था टूट गई और लोग दरिद्र होने लगे. भारतीय समाज अंग्रेजों के द्वारा की जाने वाली व्यवस्था के लिए लाचार बन गए. अंग्रेज यदि वास्तवमें केन्द्रीय रूपसे व्यवस्था करना चाहते तो भी इतने बड़े देशमें यह करना उनके लिए उस समय संभव नहीं था. और फिर वे तो करना ही नहीं चाहते थे. गाँव की पाठशालाएँ बंध हो चुकी थी, और कुछएक महानगरों में चलने वाली अंग्रेजी स्कूलोंमें पढ़ानेके लिए गांवके लोगोके पास ना ही पैसे थे और ना ही उन्हें ऐसा अंग्रेजी शिक्षण लेना आवश्यक लग रहा था.
इन सबका परिणाम यह आया की 100% साक्षरता वाला देश कुछ ही दशकों में महत्तम रूपसे निरक्षर बन गया (स्वतंत्रता के समय भारत की साक्षरता 14% थी). केवल बहोत ही थोड़े वर्ग के लोग अंग्रेजी स्कूलों में भर्ती हो रहे थे, और यही लोग साक्षर बन रहे थे. साथ ही साथ कम्पनी सरकार द्वारा भारतके संसाधनों की अत्यधिक लूट हो रही थी जिससे समाज और दरिद्र बन रहा था. सदिओं से चली आ रही सिंचाई व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी थी, कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अकाल पड़ना एक सामान्य बात हो चुकी थी. शिक्षण न मिलने के कारण भारतका समाज केवल एक ही पीढ़ी के बाद आर्थिक रूपसे अत्यंत दरिद्र और मानसिक रूपसे हतोत्साहित हो जाने वाला था.
अंग्रेज केवल इतने से संतुष्ट नहीं होने वाले थे. वे यह चाहते थे की हिन्दू समाज अपने मूलभुत संस्कार भूल कर इसाई बन जाएं. एक ऐसा इसाई समाज जो विचार, वाणी और रूचि से पुर्णतः अंग्रेज हो. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मेकोले अब क्या करता है? देखेंगे भाग-5 में.
(जिस केन्द्रीय व्यवस्था का वचन अंग्रेजों ने 1835 में दिया था वह व्यवस्था आज स्वतंत्रता के 67 वर्ष पश्चात भी, भारत की अपनी सरकार नहीं दे पाई है! अंग्रेज केवल केंद्रीय न्याय प्रणाली दे पायें है जो की उनके स्वयं के हित में थी. स्वतंत्रता के उपरांत भी भारत यह अंग्रेजों की दी गई अधम न्याय प्रणाली को कार्यक्षम नहीं बना पाएं है. न्याय, सिंचाई और खाद्यान्न व्यवस्था जिस दयनीय परितस्थिति में आज है इतनी इतिहास में कभी नहीं थी. और निकट के भविष्यमें यह व्यवस्था पर्याप्त रूपसे उपलब्ध होनेकी कोई अपेक्षा भी नहीं है.)
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