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भूत, प्रेत, पिशाच का रहस्य - भाग १

भूत, प्रेत और पिशाच में क्या अंतर है? सामान्यतः यह तीनों शब्दों को अभेद रुपसे उपयोग किया जाता है। परन्तु कोई भी दो शब्दों का एक ही अर्थ कभी नहीं होता। पर्यायवाची हो सकते है, परन्तु समानार्थी कभी नहीं होते। प्रेत: ये वही मरी हुई भटकती आत्मा है जिसको हम भूत प्रेत कहकर चिन्हित करते है। ये आत्माएं अच्छी, बुरी या निष्क्रिय हो सकती है। पिशाच: यह भी प्रेत ही होते है परन्तु ये आत्माएं बुरी होती है। अधिकतर पिशाच अन्य कुछ दुर्बल आत्माओं को वश में करके स्वयं बलि होकर लोगों को पीड़ित करता है। जी हां, प्रेत योनि में भी गुंडागर्दी और साम्राज्य होते है। भूत: ये वास्तवमें शिवगण होते है। किसी के कुकर्मों का दंड देनेके लिए शरीरमें घुसकर पीड़ित करते है। इसलिए शिवजी भूतनाथ कहलाते है। यदि शब्दों को ठीकसे समझेंगे तो कर्मों के फल को सरलता से समझ पाएंगे। -------------------------------------------------------------------------------------- प्रेतों का जीवन कैसा होता है? प्रायः लोग ऐसा मानते है कि भगवान की माया जीव को मनुष्य रूप में ही लगती है। जीव का मृत्यु हो जानेपर माया भुला दी जाती है। इसलिए प्रेत तो सर्व...

तारकासुर - एक समुचित और प्रासंगिक दृष्टिकोण

शास्त्रों का नियमित अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है। जो ऐसा करते है उन सबका यह अनुभव रहा है की जब जब वे एक ही ग्रन्थ बार बार पढ़ते है तो हर बार कोई न कोई ऐसी नई बात सामने आ जाती है की आपके ज्ञान के चक्षु अचानक ही खुल जाते है, और आपका इस जगत को देखनेका दृष्टिकोण बदल जाता है।  माता वरांगी और दैत्य वज्रांग के पुत्र, तारकासुर की कथा वैसे तो प्रचलित और बहुविदित है, परन्तु शिवपुराण पढ़ते पढ़ते आज एक अलग ही दृष्टिकोण मिल गया।  तारकासुर एक अत्यंत बलशाली दैत्य था जिसका एक ही ध्येय था, देवताओं को परास्त करना! असुर वैसे तो देवताओंसे कभी जित नहीं पाते है, इसलिए उनको अत्यधिक कठोर तपस्चर्या करके देवताओं से भी बड़ी शक्तियोंसे, अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, शिव इत्यादि ईश्वरसे वरदान प्राप्त करने पड़ते है। परन्तु असुर परिश्रम करनेसे कभी नहीं चूकते है। अत्यंत कठोर से कठोर तपस्या करके तारकासुरने भगवान् ब्रह्माजी से यह वर प्राप्त कर लिए की वो त्रिलोकीमें सबसे अधिक बलशाली हो जाए और उसकी मृत्यु केवल शिवजी के वीर्य से उत्पन्न हुए पुत्र से ही सके। ऐसा वर उसने इसलिए माँगा क्योंकि माता सती के दक्षयज्ञमें शरीर त्याग ...

कर्म सिद्धान्त - भाग ६ - मानसिक कर्मों का फल कैसे मिलता है?

  इस लेख श्रृंखला के पिछले अंक में हमने देखा: कर्म सिद्धांत – भाग ५ – भाग्य अधिक बलवान है या कर्म?  कर्मों से मुक्ति कैसे मिलती है?  भक्त लोग क्यों अधिक दुःखी रहते हैं? इस लेख में हम देखेंगे कि: मानसिक कर्मों की क्या गति होती है? क्या किसी को मन-ही-मन में गाली देने से, किसी का अहित चाहने से, या मन-ही-मन में भगवान का स्मरण करने से फल मिलता है? क्या ऑनलाइन हिंसक वीडियो गेम खेलने से या हस्तमैथुन करने से पाप लगता है? --------------------------------------------------------------------------------------- मानसिक कर्मों की क्या गति होती है? हमने पहले देखा था कि कर्मों की गति बहुत गहन होती है, लेकिन मानसिक कर्मों की गति तो उससे भी कहीं अधिक गहन होती है।  शास्त्रों के सामान्य नियम के अनुसार, किसी भी कर्म के पीछे की भावना ही यह निश्चित करती है कि उस कर्म का कैसा फल मिलेगा। हर कर्म पहले मन में होता है, फिर बाद में भौतिक रूप से किया जाता है। इसलिए मन से किए गए कर्म का फल तो मिलना ही है, चाहे बाद में किसी भी कारण से, वह भौतिक रूप से किया न गया हो। यदि किसी की हत्या करने का मानसि...

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