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भूत, प्रेत, पिशाच का रहस्य - भाग १

भूत, प्रेत और पिशाच में क्या अंतर है? सामान्यतः यह तीनों शब्दों को अभेद रुपसे उपयोग किया जाता है। परन्तु कोई भी दो शब्दों का एक ही अर्थ कभी नहीं होता। पर्यायवाची हो सकते है, परन्तु समानार्थी कभी नहीं होते। प्रेत: ये वही मरी हुई भटकती आत्मा है जिसको हम भूत प्रेत कहकर चिन्हित करते है। ये आत्माएं अच्छी, बुरी या निष्क्रिय हो सकती है। पिशाच: यह भी प्रेत ही होते है परन्तु ये आत्माएं बुरी होती है। अधिकतर पिशाच अन्य कुछ दुर्बल आत्माओं को वश में करके स्वयं बलि होकर लोगों को पीड़ित करता है। जी हां, प्रेत योनि में भी गुंडागर्दी और साम्राज्य होते है। भूत: ये वास्तवमें शिवगण होते है। किसी के कुकर्मों का दंड देनेके लिए शरीरमें घुसकर पीड़ित करते है। इसलिए शिवजी भूतनाथ कहलाते है। यदि शब्दों को ठीकसे समझेंगे तो कर्मों के फल को सरलता से समझ पाएंगे। -------------------------------------------------------------------------------------- प्रेतों का जीवन कैसा होता है? प्रायः लोग ऐसा मानते है कि भगवान की माया जीव को मनुष्य रूप में ही लगती है। जीव का मृत्यु हो जानेपर माया भुला दी जाती है। इसलिए प्रेत तो सर्व...

वेद मानवनिर्मित नहीं, अपौरुषेय और नित्य हैं: एक तार्किक विवेचन

ऐसे बहुतसे हिन्दू विचारक है जो की इस बातसे बहुत भ्रमित रहते है की वास्तवमें हिन्दू है कौन? और कौन हिन्दू नहीं है? ऐसे तथाकथित विचारकोंने कभी हिन्दू शास्त्रोंका गंभीरतासे अभ्यास नहीं किया है. यदि किया होता तो वे जानते की हिन्दू वही है जो वेदों को सर्वोच्च, सार्वभौम, दिव्य और अपौरुषेय मानते है। जो ऐसा नहीं मानते, वे हिन्दू हैं ही नहीं।   पौरुषेय का अर्थ होता है जिसको किसी पुरुषने -अर्थात मनुष्यने - बनाया हो. वेद अपौरुषेय है. और वेदों के परिपेक्ष्यमें पुरुषका अर्थ केवल मनुष्य ही नहीं, कोई भी जीवात्मा, अर्थात देवता भी होता है. इसलिए अपौरुषेय का अर्थ है जिसे किसे देवताने भी नहीं बनाया, अर्थात वे स्वयंभू है।  शास्त्रों के अनुसार सृष्टि के उदय के साथ ही, अर्थात भ्रह्मा के साथ ही, वेदों का उदय होता है, और लय के साथ उनका लय हो जाता है. इस बिच, सृष्टि के प्रारम्भमें ऋषिगण वेदों के मन्त्रों का दर्शन करते है और उनको संकलित करते है। इसलिए उन्हें मन्त्रद्रष्टा कहा जाता है।  अब ये तो हो गई परंपरागत विचारों की बात. पर इस विचारको चुनौती देने वाले तथाकथित हिन्दू विचारक भी है। उनका कहना है ...

भाषा की उत्पत्ति : क्या मनुष्य ने भाषा बनाई या भाषा मनुष्य को देवताओं से मिली?

हम यह मानते है की वेद अपौरुषेय है, अर्थात मनुष्यनिर्मित नहीं है, वे सृष्टि के साथ स्वयं उदित होते है और श्रिष्टि के साथ ही लय हो जाते है. इस सिद्धांत को बड़ी सरलतासे सिद्ध किया जा सकता है (पढ़िए वेद मानवनिर्मित नहीं, अपौरुषेय और नित्य हैं: एक तार्किक विवेचन )। परन्तु इसके साथ ही साथ संस्कृत भाषा भी अपौरुषेय बन जाती है क्योंकि वेद संस्कृत भाषा में ही बने है. हम तो वैसे भी संस्कृत को "देव भाषा" ही मानते है। ऐसी भाषा जो देवता बोलते है। तो इसको मनुष्यके द्वारा निर्मित होनेका तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। फिरभी, आधुनिक भाषाविदों का मत इससे बिलकुल उल्टा है. आइए देखते है की आधुनिक भाषाविद क्या कहते है।  १. सारी भाषाओँ का मूल संस्कृत नहीं है २. सारी भाषाएं मनुष्यों द्वारा क्रमशः, समयके साथ विकसित होकर बनती गई (evolution of languages) ३. कुछ भाषाविद मानते है की पशु पक्षिओं की ध्वनि सुनकर मनुष्योंने प्रथम अक्षर बनाए उपरोक्त सारे विचार निराधार और मनघडंत तो है ही, वैज्ञानिक द्रष्टिकोणसे असंभव भी है.  इस सारे विषय पर स्वामी करपात्री महाराजने एक अतिउत्तम शोध लेख लिखा है। उस लेख का संक्षिप्त...

गरबा नृत्य की उत्पति और रहस्य

नवरात्री पर्व के अवसर पर सभी को जय अंबे 🙏 गरबा तो लगभग सभी खेलते हैं, लेकिन इसकी उत्पत्ति के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। तो आइए देखें कि गरबे की उत्पत्ति कैसे हुई। गरबा क्या है? गरबा शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के "गर्भ दीप" शब्द से हुई है। हमारे शरीर में जीवात्मा रहती है जो विभिन्न इंद्रियों के द्वारा बाह्य जगत के लिए प्रकाशित होती है। उसी तरह गरबा एक अनेक छेदों वाली गोल मटकी होती है, जिसके अंदर दीया जलाया हुआ होता है। इस दीये का प्रकाश छेदों के द्वारा बाहर फैलता है। यदि ये छेद न हों तो प्रकाश बाहर नहीं फैलेगा, और यदि अंदर दीप प्रज्वलित न हो तो भी प्रकाश नहीं फैलेगा। इस प्रकार गरबा हमारे शरीर और अंतःकरण का प्रतीक है। इस गरबे को लेकर माताजी के विग्रह के चारों ओर एक वृत्त में घूमकर नृत्य किया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अनेक जन्मों तक इस संसार में चक्कर लगाता रहता है, और इस संसार की धुरी, इसका केंद्रबिंदु, यही आद्यशक्ति अंबे माता हैं। गरबा रात में ही क्यों खेला जाता है? हमारी संस्कृति में कई ऐसे त्योहार हैं जो रात्रि-प्रधान हैं। जैसे शिवरात्रि, दिवाली, कृष्ण...

तारकासुर - एक समुचित और प्रासंगिक दृष्टिकोण

शास्त्रों का नियमित अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है। जो ऐसा करते है उन सबका यह अनुभव रहा है की जब जब वे एक ही ग्रन्थ बार बार पढ़ते है तो हर बार कोई न कोई ऐसी नई बात सामने आ जाती है की आपके ज्ञान के चक्षु अचानक ही खुल जाते है, और आपका इस जगत को देखनेका दृष्टिकोण बदल जाता है।  माता वरांगी और दैत्य वज्रांग के पुत्र, तारकासुर की कथा वैसे तो प्रचलित और बहुविदित है, परन्तु शिवपुराण पढ़ते पढ़ते आज एक अलग ही दृष्टिकोण मिल गया।  तारकासुर एक अत्यंत बलशाली दैत्य था जिसका एक ही ध्येय था, देवताओं को परास्त करना! असुर वैसे तो देवताओंसे कभी जित नहीं पाते है, इसलिए उनको अत्यधिक कठोर तपस्चर्या करके देवताओं से भी बड़ी शक्तियोंसे, अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, शिव इत्यादि ईश्वरसे वरदान प्राप्त करने पड़ते है। परन्तु असुर परिश्रम करनेसे कभी नहीं चूकते है। अत्यंत कठोर से कठोर तपस्या करके तारकासुरने भगवान् ब्रह्माजी से यह वर प्राप्त कर लिए की वो त्रिलोकीमें सबसे अधिक बलशाली हो जाए और उसकी मृत्यु केवल शिवजी के वीर्य से उत्पन्न हुए पुत्र से ही सके। ऐसा वर उसने इसलिए माँगा क्योंकि माता सती के दक्षयज्ञमें शरीर त्याग ...

कर्म सिद्धान्त - भाग ६ - मानसिक कर्मों का फल कैसे मिलता है?

  इस लेख श्रृंखला के पिछले अंक में हमने देखा: कर्म सिद्धांत – भाग ५ – भाग्य अधिक बलवान है या कर्म?  कर्मों से मुक्ति कैसे मिलती है?  भक्त लोग क्यों अधिक दुःखी रहते हैं? इस लेख में हम देखेंगे कि: मानसिक कर्मों की क्या गति होती है? क्या किसी को मन-ही-मन में गाली देने से, किसी का अहित चाहने से, या मन-ही-मन में भगवान का स्मरण करने से फल मिलता है? क्या ऑनलाइन हिंसक वीडियो गेम खेलने से या हस्तमैथुन करने से पाप लगता है? --------------------------------------------------------------------------------------- मानसिक कर्मों की क्या गति होती है? हमने पहले देखा था कि कर्मों की गति बहुत गहन होती है, लेकिन मानसिक कर्मों की गति तो उससे भी कहीं अधिक गहन होती है।  शास्त्रों के सामान्य नियम के अनुसार, किसी भी कर्म के पीछे की भावना ही यह निश्चित करती है कि उस कर्म का कैसा फल मिलेगा। हर कर्म पहले मन में होता है, फिर बाद में भौतिक रूप से किया जाता है। इसलिए मन से किए गए कर्म का फल तो मिलना ही है, चाहे बाद में किसी भी कारण से, वह भौतिक रूप से किया न गया हो। यदि किसी की हत्या करने का मानसि...

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