भूत, प्रेत, पिशाच का रहस्य - भाग १

भूत, प्रेत और पिशाच में क्या अंतर है?

सामान्यतः यह तीनों शब्दों को अभेद रुपसे उपयोग किया जाता है। परन्तु कोई भी दो शब्दों का एक ही अर्थ कभी नहीं होता। पर्यायवाची हो सकते है, परन्तु समानार्थी कभी नहीं होते।

प्रेत: ये वही मरी हुई भटकती आत्मा है जिसको हम भूत प्रेत कहकर चिन्हित करते है। ये आत्माएं अच्छी, बुरी या निष्क्रिय हो सकती है।

पिशाच: यह भी प्रेत ही होते है परन्तु ये आत्माएं बुरी होती है। अधिकतर पिशाच अन्य कुछ दुर्बल आत्माओं को वश में करके स्वयं बलि होकर लोगों को पीड़ित करता है। जी हां, प्रेत योनि में भी गुंडागर्दी और साम्राज्य होते है।

भूत: ये वास्तवमें शिवगण होते है। किसी के कुकर्मों का दंड देनेके लिए शरीरमें घुसकर पीड़ित करते है। इसलिए शिवजी भूतनाथ कहलाते है।

यदि शब्दों को ठीकसे समझेंगे तो कर्मों के फल को सरलता से समझ पाएंगे।

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प्रेतों का जीवन कैसा होता है?

प्रायः लोग ऐसा मानते है कि भगवान की माया जीव को मनुष्य रूप में ही लगती है। जीव का मृत्यु हो जानेपर माया भुला दी जाती है। इसलिए प्रेत तो सर्वज्ञानी होते है, और अपने कर्मों पर पछतावा करते है। परन्तु ऐसा अधिकतर प्रेतों के साथ नहीं होता।

यह समझना आवश्यक है कि प्रेत केवल अपना शरीर खेता है। उसका सूक्ष्म शरीर और अंतःकरण अभी भी वही रहता है। प्रेत मरनेके बाद भी अपनी वही पहचान लेकर घूमता है। प्रायः प्रेतों को पता ही नहीं होता कि वे मर गए है। यह एक अत्यंत ही दयनीय स्थिति है।

जब हम मरे हुए प्रेतों को पूजने लगते है तब उन्हें भी ऐसा भ्रम हो जाता है कि वे देवता बन गए है। हमारे पूजा और भोग के कारण उनमें किसी और शरीर में घुसनेकी शक्ति भी मिल जाती है। इसलिए वे अपनेआप को परम शक्तिमान देवता समझने लगते है।

प्रेत तभी अपनी मुक्ति की कामना करते है जब उन्हें पता चलता है कि वे मर चुके है, और जब उनका किसीभी प्रकार पोषण नहीं होता  या तो जब वे किसी पिशाच के चंगुल में फंस जाते है।

प्रेत का अपने शरीर से मोहभंग हो जाए इसलिए हम मृत शरीरको जला देते है। गाड़ने पर प्रायः उनको यह मोहभंग नहीं होता। और इसलिए हम केवल सिद्ध योगियों को ही समाधि देते है, क्योंकि उनको वैसे भी कोई मोह नहीं होता।

हिंदुओं के पितृ अधिकतम 7 पीढ़ी में अपनेआप प्रेत योनि से मुक्त हो जाते है। परन्तु अन्य अधर्मों में 20-25 पीढ़ियों तक मुक्त नहीं होते क्योंकि उनके प्रेत अपने शरीर से मोहित रहते है।

क्या अपने जीते जी कोई नास्तिक या विधर्मी हो और पितृ - प्रेत में विश्वास न करता हो, तो भी क्या वो पितृ या प्रेत बन सकता है?  जीवनभर पितृमें न मानने वाले क्या स्वयं पितृ बनकर पीड़ित करते है?

क्या यदि कोई कहे की मैं गुरुत्वाकर्षण के नियमको नहीं मानता, तो क्या वो निचे नहीं गिरेगा? बहुत लोग ऐसा कहते है की मेरे पूर्वज तो बहुत पढ़े लिखे थे, मॉडर्न थे, नास्तिक थे, वो कभी पितृ बनकर पीड़ित नहीं कर सकते। परंतु वे लोग ये नहीं समझते की एक व्यक्ति जीते जी भी अपने अनुभवों के अनुसार अपने विचार बदलते रहता है। जो वो २० वर्षकी आयुमें सोचता था, वो विचार ५० की आयुमें पुरे बदल गए हो सकते है, और वही ५० वाले विचार ८० में बदल जाएंगे। ऐसे नास्तिक लोग इसलिए विश्वास नहीं करते क्योंकि अभी उन्होंने नर्क की या प्रेत योनि की यातना सही नहीं है। जब वह उस दारुण यातनाओंसे गुजरेगा तब उसके विचार अवश्य ही बदल जाएंगे और वह भोग या मुक्ति के लिए सरे संभव प्रयत्न करेगा। 

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अब हम अगले भागमें देखेंगे की कैसे हिन्दू समाज इन भूत प्रेतों की पूजा के चक्करमें फंसता जा रहा है और अपने साथ अपने पुरे कुटुंब-परिवार की अधोगति करनेका प्रचलन बढ़ चूका है। भूत, प्रेत, पिशाच का रहस्य - भाग २ - क्या मृत व्यक्तियों (प्रेतों) की पूजा करनी चाहिए? 

इस भाग में हम देखेंगे कि:

  • आजकल पितृदोष और प्रेतजनित पीड़ाओं में इतना वृद्धि क्यों देखने को मिल रही है?
  • मनुष्य की मृत्यु के बाद प्रेत कैसे और क्यों बनता है?

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