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Showing posts from August, 2025

हाँ। प्रभु श्री राम का सीता त्याग सही था। और उत्तर रामायण प्रक्षिप्त नहीं है।

आजकल के सामान्य लोगों की तो क्या बात करनी, कुछ धर्माचार्य और कथावाचक भी कहते रहते है की रामजीको सीता माता का त्याग नहीं करना चाहिए था। हमारे लाखों वर्षों के इतिहासमें किसीभी ग्रंथमें या किसीभी मान्य संप्रदाय के आचार्यने ये कभी नहीं कहा, पर ये आजकल के महाज्ञानी लोग - नारीवादियों के प्रभावमें आकर - अनर्गल प्रलाप कर रहे है क्योंकि उनको शास्त्रों को समजनेकी यथार्थ दृष्टि नहीं है।  चलिए देखते है की इन निर्लज्जों के द्वारा प्रभु श्री राम के ऊपर क्या क्या आरोप लगाए जाते है।  ------------------------------------------------------------------------------------------------------------ मेरा अपना मंतव्य सर्प्रथम तो मैं अपना मंतव्य बता दूं. मैं प्रभु श्री राम और माता जानकी का - और समस्त पंचदेवों का - भक्त हुं। इसलिए उन्होंने कुछ भी गलत किया ऐसा मैं न सोच सकता हुं, न मान सकता हुं। भगवान् के अवतारोंकी लीला रसास्वादन के लिए होती है, भावविभोर होनेके लिए होती है, भक्ति के सागरमें डूबनेके लिए होती है........ टिका-टिपण्णी, आलोचना, तर्क-वितर्क-कुतर्क करनेके लिए नहीं होती। अवतार कुछभी गलत नहीं करते...

हिन्दू संस्कृति इतनी उत्कृष्ट होनेके बाद भी आज हिन्दुओंकी स्थिति इतनी दयनीय क्यों है?

प्रश्न: इतिहासमें हिंदू इतना शक्तिशाली था, इसके अपने इतने देश थे वह क्यों मार खाता रहा? हिन्दू धर्म आज सबसे पवित्र और कल्याणकारी धर्म है, अन्य तो सारे अधर्म ही है, तो फिर हिन्दुओं की आज इतनी दयनीय स्थिति क्यों है? उत्तर: इस भूमण्डलमें आर्य जाति केवल हम हिन्दू ही है, अन्य सभी मलेच्छ जातियां है। इतिहासका अवलोकन करनेपर समझ आता है की पिछले २००० वर्षों में अलग अलग म्लेच्छ जातियां अपने वैभव और सुख के चरम पर थी। कभी शक, कभी हुण, कभी मंगोल, कभी अरब तो आजकल आंग्ल प्रजा (current white race) अपने वैभव के चरम पर है। इन प्रजाओंने ऐसा क्या कर्म किया है जो इतना सुख पा रहे है? शास्त्रों के अनुसार नास्तिक लोग जब ईश्वरार्पण की अनिच्छासे पुण्य कर्म करते है तो उनको म्लेच्छ देशोंमें वैभवशैली जीवन जिनका फल मिलता है। ऐसे लोग अपना फल भोगकर फिरसे पुण्यशुन्य हो जाते है और कर्मों के बंधनमें बंधते है। जबकि जब कोई आस्तिक व्यक्ति ईश्वर के प्रति प्रेम को ही केन्द्रस्थानमें रखकर पुण्य करता है वह भारत देशमें सुख भी भुगतता है और आध्यात्मिक प्रगति भी करता है।  यदि आप देखें तो इन सब विविध म्लेच्छ जातियों के वैभव का ...

वर्ण व्यवस्था का विज्ञान और उसकी की सार्थकता

लेख के आरम्भ होनेसे पहले ही लिख देता हूँ की मैं केवल और केवल जन्म से वर्ण व्यवस्था मानता हूँ, और जो कर्म से यह व्यवस्था मानते है उन्हें मैं महामूर्ख मानता हूँ। ऐसे लोग यदि मुझसे चर्चा (शाश्त्रार्थ नहीं, चर्चा) करना चाहे तो मैं तैयार हूँ। अब आगे... किसी प्रजातिके वंश की शुद्धि का क्या महत्त्व है ये तो कहनेकी आवश्यकता ही नहीं है। आज यदि हम देखें तो कुत्ते, बिल्लियां, घोड़े पालने वाले लोग भी अपने पालतू प्राणी के वंश (नस्ल) के बारेमें अत्यधिक सावधान होते है। कुछ लोग तो अपने कुत्तोंके २०० साल की पीढ़ियों का नाम, पता और प्रमाणपत्र रखते है। दुर्भग्यसे लोगोंमें मनुष्य के बीज-अंशकी शुद्धताकी कोई चिंता नहीं रही है। यदि ऐसा कहा जाए की आंतरजातीय विवाहसे वर्णसंकरता व्याप्त होती है और मनुष्योंकी गुणवत्ता कम होती है, तो पता नहीं कितने ही लोग लड़ने आ जाएंगे। जबकि यह बात १००% वैज्ञानिक और सरलतासे समझी जा सकती है। तो मुझे लगता है की इस विषयमें तो इतना कुछ लिखनेकी आवश्यकता नहीं है, पर वर्णव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलु है जिसके ऊपर बहुत कम लिखा गया है, और वो है, वर्ण व्यवस्थाका सामजिक विज्ञान।  क्या है ...

ज्योतिष की दृष्टि से गर्भसंस्कार - करें इच्छित गुणों वाले संतान की प्राप्ति

सामान्यतः लोग यह मानते हैं कि बच्चे जब 8 से 10 वर्ष के हो जाते हैं, तभी संस्कारों का सिञ्चन शुरू हो सकता है, क्योंकि उससे पहले वे बहुत छोटे होते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि बच्चा जब जन्म लेता है, तभी उसका 80% तय हो जाता है कि वह कैसा जीवन जीएगा । केवल 6 वर्ष की आयु तक उसका 90% जीवन तय हो जाता है। बाकी जीवन में जो संस्कार वह प्राप्त करता है, वे केवल 10% ही प्रभाव डालते हैं। इसलिए गर्भसंस्कार व्यक्ति निर्माण के किसी भी अन्य आयाम से कई गुना अधिक महत्वपूर्ण हैं। बच्चा किस स्कूल में पढ़ेगा, किस समाज में रहेगा, ये सब तो बहुत ही तुच्छ बातें हैं। सामान्यतः गर्भसंस्कार को केवल आयुर्वेद का विषय माना जाता है। गर्भसंस्कार वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक उत्तम कोटि का संतान प्राप्त किया जा सकता है। आयुर्वेद का यह विषय अत्यंत गहन है, और यदि इसे अच्छी तरह से अनुसरण किया जाए तो निश्चित रूप से इच्छित संतान की प्राप्ति हो सकती है। आयुर्वेद की दृष्टि से गर्भसंस्कार कैसे करना है, इसके बारे में कई पुस्तकें लिखी गई हैं और प्रचुर मात्रा में शोध साहित्य उपलब्ध है। इसलिए यहाँ उस विषय...

भूत, प्रेत, पिशाच का रहस्य - भाग - ३ - क्या दिवंगत हो चुके सिद्ध संतों की पूजा, अर्चना करनी चाहिए?

इस लेखमाला के पिछले लेखमें हमने देखा की किसीभी मृत व्यक्तिको देवता बनाकर, मूर्ति बनाकर, मंदिरमें बिठाकर पूजा अर्चना नहीं करनी चाहिए । इसके ऊपर एक प्रश्न आया था जिसके उत्तरमें यह लेख लिखा जा रहा है।  प्रश्न है: क्या नगर देवता, ग्राम देवता और भी सिद्ध पुरुष उदाहरण के रूप में नीम करौली बाबा (कैंची धाम), गुरु गोरख नाथ। क्या इनको भी देव बनाया गया है। इनकी पूजा करना या मंदिर में स्थान देना सही है? उत्तर: ग्राम देवता, स्थान देवता, क्षेत्रपाल इत्यादि सदैव शास्त्रीय ही होते है। अधिकतर ये सब पंचदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणपति और शक्ति देवी) के उग्र स्वरूप होते है। जैसे कि भैरव, रुद्र, काली, नरसिम्हा इत्यादि। जो लोग मनुष्यों को यह उपाधि दे देते है बहुत बड़ा अनर्थ करते है। वे इन क्षेत्रों की रक्षा तो नहीं कर पाते है, पर इन क्षेत्रों में उपद्रव बढ़ा देते है। निम करौली बाबा इत्यादि सिद्ध पुरुषों को देव नहीं बनाना चाहिए। गुरु के रूप में उनकी प्रसंगोपात पूजा हो सकती है। जैसे की गुरु पूर्णिमा इत्यादि। जैसे हम अपने पूर्वजों को याद करते है वैसें। परन्तु उनका मंदिर ही बना देना, भोग आरती दैनिक रूप स...

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