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Showing posts from 2018

Message To All Teachers

Afterall, how does a high values based society ends up being a mass of plain givers and takers? In today's time, we see people becoming more and more transactional. ''Ambition' is a positive word and 'professionalism' is considered cool in all trades. Pertaining to the employment, words like 'service' and 'duty' are out of fashion. 'Job' is the new standard word. We are fast becoming a society where presentation is regarded higher than the deliverance. As a teacher, I ask to myself, is there anything that I can do even in a smallest way? Well, at the very least I can write an article! Not despite being a teacher, but because I'm a teacher, I will have to state the truth that along with all other sections of the society, teachers are also becoming professional. With obvious positives you would associate with the word 'professionalism' there is inherent element of 'trade' in it. So should that be ok for a teach...

कहानी - त्रिलोचन भट्ट

प्रहलादको अब अपना काल सामने दिख रहा था. एक चिढ़ी हुई शेरनी उसके सामने क्रोधसे घूर रही थी. रातका दो बजे का समय था, दूर दूर तक गीर का सुमसान जंगल था. उसकी मारुती अल्टो की हेडलाइट और पूनम के चन्द्रमा के प्रकाश के अतिरिक्त और कोई प्रकाश दूर दूर तक नहीं था. शेरनीके पांचो बच्चे अभी भी सड़क पर बैठे बैठे हिरनका ताज़ा मांस खा रहे थे, परंतु शेरनी उनको छोड़कर जहां प्रहलाद पुतला बनकर खड़ा था वहां धीरे धीरे और अभित कदमों के साथ जा रही थी. हाथमें उसका DSLR केमेरा धरा का धरा रह गया था और प्रहलादको पता नहीं था की अब वो करे तो क्या करे! अगर वो अपने स्थान से तनिक भी हिला और शेरनी उसके ऊपर कूद पड़ी तो! उसका शरीर तो स्थिर था परंतु उसका मन उसके साथ सतत बातें कर रहा था. "मुज उल्लू के पठ्ठे को इस जंगलमें अकेले निकलनेकी क्या ज़रूरत थी? निकला तो निकला, पर ऐसी आधी रातमें निकलनेकी क्या ज़रूरत थी? और निकलनेके बाद सड़क पर इस सिंह-परिवार को एकसाथ भोजन करते देख निचे उतरनेकी क्या ज़रूरत थी? क्या फोटो खींचे बिना मैं मर जाता? और मुज मुर्ख को केमेरा की फ्लेश बंध करना भी याद नहीं आया!" इतना अभ...

इतना पापाचार होनेपरभी भगवान् अवतार लेकर क्यों नहीं आते?

आपने बहोत लोगोंको ऐसा कहते हुए सुना होगा की पृथ्वी पर इतने सारा पापाचार हो रहा है, फिरभी भगवन अवतार धारण करके क्यों नहीं आ रहे है ? एक रावणको मारने के लिए भगवानने रामावतार धारण किया, आज लाखो करोडो रावण होनेके उपरांत भी भगवन क्यों नहीं आते ? क्या भगवन उन्होंने स्वयं ही दिया हुआ वचन भूल गए की “संभवामि युगे युगे” .. इत्यादि इत्यादि.. सबसे पहली बात तो यह है की जब भगवन यह कहते है की अधर्मका नाश करने के लिए मैं समय समय पर अवतार धारण करूँगा , तब वे स्वाभाविक रूपसे ही यह भी कह देते है की बार बार नाश करने पर भी अधर्म और पापाचार अपना प्रसार पुनः कर ही देगा. पापीजन तो बढ़ने ही वाले है , धर्मका निकंदन तो निकलने ही वाला है. अर्थात यह तो श्रृष्टिका क्रम है. तो यदि यह श्रृष्टिका क्रम ही है तो फिर दुखी क्यों होना ? और फिर यदि यह श्रृष्टिका क्रम ही है तो अवतार कब लेना है यह निर्णय भी हम श्रृष्टिके रचयता पर ही क्यों ना छोड़ दे ? फिरभी यदि हमारा मायागत अहम् हमको यह बात स्वीकारने नहीं देता है और सतत यही प्रश्न हो रहा है की क्यों भगवन अवतार नहीं ले रहे है तो यह प्रश्न हम दूसरोंको पूछनेकी अपेक...

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