कहानी - त्रिलोचन भट्ट
प्रहलादको अब अपना काल सामने दिख रहा था. एक चिढ़ी हुई शेरनी उसके सामने क्रोधसे घूर रही थी. रातका दो बजे का समय था, दूर दूर तक गीर का सुमसान जंगल था. उसकी मारुती अल्टो की हेडलाइट और पूनम के चन्द्रमा के प्रकाश के अतिरिक्त और कोई प्रकाश दूर दूर तक नहीं था. शेरनीके पांचो बच्चे अभी भी सड़क पर बैठे बैठे हिरनका ताज़ा मांस खा रहे थे, परंतु शेरनी उनको छोड़कर जहां प्रहलाद पुतला बनकर खड़ा था वहां धीरे धीरे और अभित कदमों के साथ जा रही थी. हाथमें उसका DSLR केमेरा धरा का धरा रह गया था और प्रहलादको पता नहीं था की अब वो करे तो क्या करे! अगर वो अपने स्थान से तनिक भी हिला और शेरनी उसके ऊपर कूद पड़ी तो! उसका शरीर तो स्थिर था परंतु उसका मन उसके साथ सतत बातें कर रहा था. "मुज उल्लू के पठ्ठे को इस जंगलमें अकेले निकलनेकी क्या ज़रूरत थी? निकला तो निकला, पर ऐसी आधी रातमें निकलनेकी क्या ज़रूरत थी? और निकलनेके बाद सड़क पर इस सिंह-परिवार को एकसाथ भोजन करते देख निचे उतरनेकी क्या ज़रूरत थी? क्या फोटो खींचे बिना मैं मर जाता? और मुज मुर्ख को केमेरा की फ्लेश बंध करना भी याद नहीं आया!" इतना अभ...