मैथुन क्रिया एक ऐसा विषय है की जिसके विषयमें लगभग प्रत्येक व्यक्तिका अपना कोई न कोई अभिप्राय अवश्य ही है, परंतु सभ्य समाजमें इसके विषयमें चर्चा करना अयोग्य और असंस्कृत माना जाता है. यद्यपि हमारे शास्त्रोनें इस विषयको कभी अस्पृश्य नहीं माना है. अस्पृश्य तो क्या, शास्त्रोनें तो मैथुन क्रिया को मानव जीवनके चार महाकर्मों मेंसे एक माना है. धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष, यह प्रत्येक मनुष्यके 4 ऐसे कर्म है जो की नीतिपूर्ण और शास्त्रोक्त विधि से किये जानेपर मनुष्य का कल्याण होता है. कामसूत्र के रचयिता ऋषि वात्स्यायन चारों वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे (आज के समयमें चारों वेदों के पंडित हो ऐसे विद्वान् पुरे देशमें पुरे 10 भी नहीं होंगे). वात्स्यायन ऋषि की रचना 'कामसूत्र' के विषयमें तो हम सब जानते है, पर यह बात बहोत कम लोग जानते है की वेदों के भाष्यकारों में भी वात्स्यायन ऋषि का नाम अतिआदर पूर्वक लिया जाता है. उपरोक्त पूर्वभूमिका के द्वारा हम यह समज सकते है की काम वासना होना या इसकी तृप्ति के लिए रत होना, यह कोई अधार्मिक बात नहीं है. फिरभी, जीवन के अन्य अनेक विषयभोगों की ही भांति, इस विषयभोग के...