Posts

Showing posts from September, 2020

शाकाहार से भी जीवहत्या होती है तो मांसाहार का विरोध क्यों?

Image
यह प्रश्न बहोत शाकाहारियों ने जिला होगा. इस प्रश्न का शास्त्रीय उत्तर धर्म धुरंधर परम पूज्य पूरी शंकराचार्य श्री निश्चलानंद सरस्वति जी ने स्वयं दिया है. मैं क्या उनकी माँ शारदा स्वरुप वाणी को यहांपर शब्दों में निरूपित करूँगा? मैं उनका स्वयं वीडियो ही यहांपर रख देता हु. जिज्ञासु जन इस वीडियो को देखें और अपना कल्याण करें। 🙏

क्या वास्तव में हिन्दुओं के इतिहास में बहुपत्नी प्रथा थी? क्या राजाओं की अनेक पत्नियां बहुपत्नी प्रथा के कारण थी?

Image
प्रायः आपने हिन्दू विरोधी मानसिकता वाले लोगों को ऐसी टिपण्णी करते देखा होगा की यदि मुस्लिमो में चार-चार  पत्नी करने का आदेश है, तो हिन्दुओं में भी पुरातन काल के प्रत्येक राजा एक से अधिक पत्नियां रखते ही थे. तो बहुपत्नी प्रथा तो हिन्दुओं में भी थी. तो किस मुँह से अन्य मजहबों की टिका कर रहे हो? बात सुनाने में तारिक और सच्ची लगती है, इसलिए हमारे पास कोई उत्तर नहीं होता।  परंतु वास्तव में ऐसा है नहीं!  हिन्दुओं में अकारण ही एक से अधिक पत्नी करना वर्जित है .  कुछ अपवाद स्थिति में अनुमति है, पर उन अपवादों को हम आगे देखेंगे। सर्वप्रथम तो मैं मुस्लिम बहुपत्नीत्व और हिन्दू विवाह व्यवस्था की तुलना की ही कठोर भर्तसना करता हु. क्या आप जानते है की 'शादी' एक मूल फ़ारसी शब्द है,और इसका अर्थ होता है 'विलास'. और सीधी सादी भाषा में कहें तो 'मौज'! और इस्लामी सभ्यता में शादी करनेका अर्थ है एक 'अनुबंध' (contract) करना। इसका अर्थ यह हुआ की शादी करनेका अर्थ है 'मौज करनेका कॉन्ट्रैक्ट' करना। इस्लाम में शादी की कल्पना केवल पुरुष के शारीरिक सुख के लिए ही की गई है, और यह अन...

मैथुन क्रिया के विषय में शास्त्रों का क्या मत है?

Image
मैथुन क्रिया एक ऐसा विषय है की जिसके विषयमें लगभग प्रत्येक व्यक्तिका अपना कोई न कोई अभिप्राय अवश्य ही है, परंतु सभ्य समाजमें इसके विषयमें चर्चा करना अयोग्य और असंस्कृत माना जाता है. यद्यपि हमारे शास्त्रोनें इस विषयको कभी अस्पृश्य नहीं माना है. अस्पृश्य तो क्या, शास्त्रोनें तो मैथुन क्रिया को मानव जीवनके चार महाकर्मों मेंसे एक माना है. धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष, यह प्रत्येक मनुष्यके 4 ऐसे कर्म है जो की नीतिपूर्ण और शास्त्रोक्त विधि से किये जानेपर मनुष्य का कल्याण होता है. कामसूत्र के रचयिता ऋषि वात्स्यायन चारों वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे (आज के समयमें चारों वेदों के पंडित हो ऐसे विद्वान् पुरे देशमें पुरे 10 भी नहीं होंगे). वात्स्यायन ऋषि की रचना 'कामसूत्र' के विषयमें तो हम सब जानते है, पर यह बात बहोत कम लोग जानते है की वेदों के भाष्यकारों में भी वात्स्यायन ऋषि का नाम अतिआदर पूर्वक लिया जाता है. उपरोक्त पूर्वभूमिका के द्वारा हम यह समज सकते है की काम वासना होना या इसकी तृप्ति के लिए रत होना, यह कोई अधार्मिक बात नहीं है. फिरभी, जीवन के अन्य अनेक विषयभोगों की ही भांति, इस विषयभोग के...

हिन्दुओं की घटती जनसँख्या का उपाय यदि कानून या सामाजिक जागृति से नहीं हो सकता, तो कैसे हो सकता है? - भाग 2

इस भागमें हम देखेंगे की हिन्दुओं की जनसँख्या की समस्या कितनी बड़ी है, क्यों यह समस्या है, और उसका उपाय क्या है. हमने इस लेख श्रेणी के भाग 1 में देखा की अधिक जनसँख्या कोई समस्या नहीं है, परंतु कम जनसँख्या अवश्य ही एक बहोत बड़ी समस्या है. अब आप कल्पना करीए की यदि भारतमें ही हिन्दुओंकी संख्या कम हो गई तो परिणाम क्या हो सकता है! क्यों हिन्दुओं के जन्मदर को बढ़ाना अतिआवश्यक है? भारतमें वर्तमान स्थिति के अनुसार 8 राज्य और 5 केन्द्र्साषित प्रदेश पहलेसे हिन्दू अल्पसंख्यक है. 8 राज्योंमेंसे 4 ऐसे राज्य है जहाँपर हिन्दू अब 10% से भी कम रह गए है. वर्ष 2011 में देशव्यापी जनगणना हुई. इस जनगणना के अनुसार हिन्दुओं का जन्मदर 2001 की तुलनामें 2.64 से घटकर 1.9 हो चूका है . इसका अर्थ है की एक हिन्दू जोड़ा उनके जीवनकालमें 2 से भी कम वच्चों को जन्म दे रहे है, इसका स्वाभाविक अर्थ है की हिन्दुओं की संख्या प्रतिदिन घट रही है. और यह तो 2011 की जनगणना के आंकड़े है, अब तक यह जन्मदर उससे भी कम हो चूका होगा ऐसा हम मानकर चल सकते है. इससे विपरीत मुस्लिम और इसाई की जनसँख्या बढ़ रही है. मुस्लिमों का जन्मदर 2001 के 3.52 से ...

हिन्दुओं की घटती जनसँख्या का उपाय यदि कानून या सामाजिक जागृति से नहीं हो सकता, तो कैसे हो सकता है? - भाग 1

क्या जनसँख्या नियंत्रण कानून हिन्दुओं की घटती हुई जनसँख्या का उपाय हो सकता है? कल एक समूहमें इसी विषय को लेकर चर्चा हुई. इस विषय के बहोत से पहलु है इसलिए इसके ऊपर एक विस्तृत लेख लिखना ही मैंने उचित समजा. हिन्दुओं की घटती जनसँख्या का विषय कुछ देर के लिए हम बाजूमें रखकर यह देखते है की सर्वप्रथम तो, क्या हमारे देशमें जनसँख्या नियंत्रण करनेकी कोई आवश्यकता है भी या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर मैं इस लेख में दूंगा, और फिर हिन्दुओं की जनसँख्या बढ़ाने के उपाय मैं अगले लेख, भाग 2 में दूंगा . सर्वप्रथम तो, देश की जनसँख्या, देश का भार कभी नहीं होती. वे देश के संसाधन होते है. इसी लिए उन्हें अर्थशास्त्र की भाषामें "मानव संसाधन" कहा जाता है. तो स्वाभाविक ही है की संसाधन कभी समस्या नहीं होते. जितने अधिक संसाधन उतने अधिक अवसर. समस्या उनके सही उपयोग की, सही शिक्षण की, और सही अवसर प्रदान करनेकी ही होती है. यदि एक देश अपनी प्रजा को यह सब प्रदान कर सकता है तो उसके लिए अधिक जनसँख्या समस्या नहीं, एक वरदान है. चलिए देखते है कुछ देशों के उदहारण...  अमरीका खंड के दक्षिण भाग में आया हुआ देश, वेनेज़ुएला एक...

Recent Posts