कर्मसिद्धांत - भाग २ - क्या स्वर्ग-नर्क जैसा कुछ होता है? गरुड़ पुराण वाली यातनाएं क्या सच है?
पिछले अनुभागमें हमने देखा की कर्म कितने प्रकार के होते है । परन्तु यदि सारे कर्म मनुष्य योनिमें ही भुगतने है तो फिर स्वर्ग नर्क इत्यादि लोक क्यों बने हुए है? क्या स्वर्ग-नर्क जैसा कुछ होता है? मनुष्य अपने जीवनकाल में बहुतसे ऐसे कर्म करता है जिसका भोग मनुष्य शरीर से नहीं हो सकता। मनुष्य शरीर की कुछ सीमाएं होती है। ये एक मर्यादा से अधिक दुःख या सुख सह नहीं सकता। मनुष्यों की अपेक्षा पशुओं में भोग की क्षमता अधिक होती है, पर उनकी भी मर्यादा होती है। कुछ घोर पाप ऐसे होते है जिनका फल अतिकठोर होता है, जैसे की गरुड़ पुराण में जघन्य पापों के लिए तेल के तवे में बार बार तलने इत्यादि जैसी भयंकर यातनाएं बताई गई है। यह यातनाएं कोई भी लौकिक शरीर सह नहीं सकता। न मनुष्य और न पशु। इसी प्रकार कुछ पुण्य इतने बड़े होते है की जिनका फल हम इस शरीर से नहीं भुगत सकते। जैसे की आपको कोई व्यंजन बहुत अच्छा लगता है, पर आप उसे उतना ही खा पाएंगे जितनी आपको भूख हो। इसके बाद आप चाहे तो भी नहीं खा सकते। उपरोक्त मर्यादाओं के कारण ही स्वर्ग और नर्क की रचना की गई है। जब जीवात्मा स्वर्गमें जाता है तो वो वहांपर भोग शरीर प्र...