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Showing posts from June, 2025

कर्मसिद्धांत - भाग २ - क्या स्वर्ग-नर्क जैसा कुछ होता है? गरुड़ पुराण वाली यातनाएं क्या सच है?

पिछले अनुभागमें हमने देखा की कर्म कितने प्रकार के होते है । परन्तु यदि सारे कर्म मनुष्य योनिमें ही भुगतने है तो फिर स्वर्ग नर्क इत्यादि लोक क्यों बने हुए है? क्या स्वर्ग-नर्क जैसा कुछ होता है? मनुष्य अपने जीवनकाल में बहुतसे ऐसे कर्म करता है जिसका भोग मनुष्य शरीर से नहीं हो सकता। मनुष्य शरीर की कुछ सीमाएं होती है। ये एक मर्यादा से अधिक दुःख या सुख सह नहीं सकता। मनुष्यों की अपेक्षा पशुओं में भोग की क्षमता अधिक होती है, पर उनकी भी मर्यादा होती है। कुछ घोर पाप ऐसे होते है जिनका फल अतिकठोर होता है, जैसे की गरुड़ पुराण में जघन्य पापों के लिए तेल के तवे में बार बार तलने इत्यादि जैसी भयंकर यातनाएं बताई गई है। यह यातनाएं कोई भी लौकिक शरीर सह नहीं सकता। न मनुष्य और न पशु। इसी प्रकार कुछ पुण्य इतने बड़े होते है की जिनका फल हम इस शरीर से नहीं भुगत सकते। जैसे की आपको कोई व्यंजन बहुत अच्छा लगता है, पर आप उसे उतना ही खा पाएंगे जितनी आपको भूख हो। इसके बाद आप चाहे तो भी नहीं खा सकते।  उपरोक्त मर्यादाओं के कारण ही स्वर्ग और नर्क की रचना की गई है। जब जीवात्मा स्वर्गमें जाता है तो वो वहांपर भोग शरीर प्र...

कर्म सिद्धांत - भाग १ - कर्मों के कितने प्रकार होते है?

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  ॐ श्री गणेशाय नमः लोगों को पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख के विषयमें अनेक प्रश्न होते है। और जब उनको संतोषकारक उत्तर नहीं मिलता तब उनमें अश्रद्धा की स्थिति उत्पन्न होती है, और फिर नास्तिकता आ जाती है। केवल सामान्य लोग ही नहीं, बड़े बड़े विद्वान् भी इस विषयमें अज्ञान के कारण स्वयं भी अश्रद्धावान होते हुए देखे गए है, और दूसरों को भी नास्तिक बनाते है।  कुछ तथाकथित विद्वान् कहते है की - "सब यहीं का यहीं है"। परन्तु जब वे अच्छे मनुष्यों को दुखी होते देखते है तब अपनी ही इस मान्यता पर अश्रद्धा उत्पन्न होती है, और अंत में नास्तिक बनकर अपनी अधोगति कर लेते है। इसलिए लोगों का अज्ञान दूर हो, और ईश्वर में श्रद्धा बैठे इस हेतु से इस "कर्म सिद्धांत" श्रृंखला के माध्यम से मैं शास्त्रसम्मत रूप से कर्मों की गति, कर्मो का विज्ञान, स्वर्ग-नर्क, कर्मों के प्रकार इत्यादि विषयों पर विशद चर्चा करनेका प्रयत्न करूँगा।  इस श्रृंखला के श्रद्धावान पाठकों को इस श्रंखला के समाप्त होते तक मनमें किसी भी प्रकार का संशय अथवा प्रश्न शेष न रह जाए ऐसा प्रयत्न मैं करूँगा। महादेव मुझे इसके लिए यथोचित सा...

क्या "जिन्दगि ना मिलेगि दोबारा" ऐसा सोचना सही है?

 क्या "जिन्दगि ना मिलेगि दोबारा" ऐसा सोचना सही है? यह एक भोगवादी विचारधारा है जिसकी जड़ें अब्राहमिक मजहबों से जुडी हुई है। अब्राहमिक मजहब मानते है की यह पूरा जगत मनुष्यों - और विशेषतः पुरुषों के उपभोग के लिए बना हुआ है। वे पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को तो मानते नहीं, इसलिए वे यही सोचते है की एक ही अवसर मिला है भोग भोगनेका, फिर तो मरनेके बाद कब्र में पड़े पड़े क़यामत का इंतेज़ार ही करना है, तो इसलिए जितने अधिक भोग भोगे जाएं उतना ही बढ़िया है। इससे अधिक मूर्खतापूर्ण और अंधकारमय सोच नहीं हो सकती हमारी संस्कृति इस विषय में स्पष्ट, गहन और अधिकारात्मक है। यह पूरी सृष्टि देवताओं से बनी हुई है। सृष्टि का दोहन तो हम कर सकते है, जो की हमारे पोषण के लिए आवश्यक है, परन्तु अविचारी उपभोग से इसका संहार वर्ज्य है। और हमारे कर्मों का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता।  कर्मों को भोगे बिना कोई छुटकारा नहीं है। हमको जीवन एकबार नहीं, बार बार मिलता है, और अनेक पशु पक्षियों की योनि में हमें कर्म भुगतने पड़ते है। जिन भोगों को हम भोगने की बात करते है, वे सारे भोग हम अनेकबार, अनेक जन्मों में भोग चुके है। हम चाहे य...

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