आपने कितने लोगों को ऐसा कहते सुना है की "राम और कृष्ण भगवान् नहीं, अपितु मनुष्य थे, समय के चलते उनको भगवान् बना दिया गया" , या फिर "यदि राम और कृष्ण को समजना है तो उनको एक सामान्य व्यक्ति की द्रष्टि से देखा जाना चाहिए" ? बहुत लोगों को आपने ऐसा कहते हुए सुना है, नहीं? बड़े बड़े विचारक, अख़बारों में लिखने वाले लेखक, उपन्यास लेखक, समाज सुधारक, और कुछ तो तथाकथित धर्मात्मा भी ऐसा कहते रहते है. सुननेमें लगती यह तार्किक और सुहावनी बात क्या वास्तवमें सत्य है? ऐसी बातें सच मानने में एक समस्या यह है की जब आप यह बात स्वीकार करते हो, तब आप यह भी स्वीकार करते हो की भारतके हजारों लाखो वर्ष के इतिहासमें हुए अगणित संत, महात्मा और धर्मात्मा सदंतर मुर्ख और अंधश्रद्धालु थे, क्योंकि वे भगवानों को भगवान् की भांति ही पूजते थे. क्या यह बात मानने योग्य है? तो सत्य क्या है? सौभाग्य से (वास्तवमें दुर्भाग्य से) हमारे पास एक ऐसे समाज का उदहारण है की जो राम-कृष्ण को अपने पूर्वज तो मानते है, उनके जीवन के प्रत्येक आख्यान को भी सच मानते है, परंतु उनको भगवान् के रूप में ना देखते हुए, एक ऐतिहासिक मनु...