कहानी - त्रिलोचन भट्ट
प्रहलादको अब अपना काल सामने दिख रहा था. एक चिढ़ी हुई शेरनी उसके सामने क्रोधसे घूर रही थी. रातका दो बजे का समय था, दूर दूर तक गीर का सुमसान जंगल था. उसकी मारुती अल्टो की हेडलाइट और पूनम के चन्द्रमा के प्रकाश के अतिरिक्त और कोई प्रकाश दूर दूर तक नहीं था. शेरनीके पांचो बच्चे अभी भी सड़क पर बैठे बैठे हिरनका ताज़ा मांस खा रहे थे, परंतु शेरनी उनको छोड़कर जहां प्रहलाद पुतला बनकर खड़ा था वहां धीरे धीरे और अभित कदमों के साथ जा रही थी. हाथमें उसका DSLR केमेरा धरा का धरा रह गया था और प्रहलादको पता नहीं था की अब वो करे तो क्या करे! अगर वो अपने स्थान से तनिक भी हिला और शेरनी उसके ऊपर कूद पड़ी तो! उसका शरीर तो स्थिर था परंतु उसका मन उसके साथ सतत बातें कर रहा था.
"मुज उल्लू के पठ्ठे को इस जंगलमें अकेले निकलनेकी क्या ज़रूरत थी? निकला तो निकला, पर ऐसी आधी रातमें निकलनेकी क्या ज़रूरत थी? और निकलनेके बाद सड़क पर इस सिंह-परिवार को एकसाथ भोजन करते देख निचे उतरनेकी क्या ज़रूरत थी? क्या फोटो खींचे बिना मैं मर जाता? और मुज मुर्ख को केमेरा की फ्लेश बंध करना भी याद नहीं आया!" इतना अभी तो प्रहलाद सोच लेता तबतक तो शेरनी उससे दस मीटर की दुरी तक आ गई और जैसे प्रहलादका प्राण कहांसे निकाला जाए इसका आयोजन कर रही हो वैसे फिरसे स्थिर होकर उसके सामने घूरने लगी.
प्रहलादको अब विश्वास हो गया था की यह रात उसके जीवन की अंतिम रात है. उसने अपना अंतिम प्रयास करते हुए गाड़ी की ओर जैसे ही जाने के लिए कदम उठाया की शेरनी दुगनी गतिसे उससे केवल एक छलांग दूर तक आकर खड़ी हो गई. अब प्रहलादके पास भगवान् को याद करनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था. वो कांपते पैरों के साथ दो हाथ जोड़कर अपने इष्टदेव महादेवको याद करके महामृत्युंजय मंत्रका जाप करने लगा. दो क्षण ऐसी ही स्थिरतामें पसार हो गई. इतनेमें ही पीछेसे एक गहरी, शांत, निर्भय और ऊँची आवाज आई...
"गंगा, उसे जाने दे.. "
इस समय इस सुमसान जंगलमें इसप्रकार गंगा के साथ ऊँची आवाजमें बात करने वाला कौन होगा? क्या वो इस शेरनीको गंगा नामसे बुला रहा है? क्या वो मुझे बचाने आया है? कौन होगा वो? प्रहलादका मन क्षणभरके लिए महामृत्युंजय मंत्रसे विचलित होकर उस आवाज़ पर चिपक गया. परंतु वह व्यक्ति कौन है यह देखनेके लिए पीछे घुमनेका सहस प्रहलादमें नहीं था. अगर वो हिला और शेरनीने वार कर दिया तो!
"यह तो मनुष्य जाती है, देवी! यह प्रजाति तो आत्महत्या भी पुरे विश्वको अपनी छवि दिखाकर ही करती है, तो तुम तो इसके लिए नावीन्य का विषय हो, मां! उसको तुम्हारी छवि तुम्हारी स्मृति के लिए नहीं चाहिए, उसे तो वह छवि अपने स्नेहीजनोको दिखाकर अपना अहंकार संतुष्ट करना है. उसकी मूर्खता के लिए उसपर दया करो मेरी मां, वह तुम्हारे प्रकोप के लिए पात्र नहीं है. हे दुर्गावाहिनी, हे वनदेवी, हे साक्षात् भवानी, इस निर्बोध को छोड़कर चली जाओ माई, चली जाओ!"
अब प्रहलादको अत्यंत ही आश्चर्य हुआ. ऐसा कौन हो सकता है जो इस जंगलमें एक शेरनी के सामने ऐसी दार्शनिक बाते कर रहा है, और स्वयं जैसे महाभारतके भीष्म पितामह हो ऐसे डायलॉग मार रहा है! वो चाहे जो भी हो, परंतु एक बात निश्चित है की उसे शेरनी से डर नहीं लग रहा. या तो वो जंगल विभाग काअधिकारी हो सकता है या तो कोई स्थानीक रहने वाला की जिसे शेरों के साथ रोज निपटना होता है. इतना सोचनेके बाद प्रहलाद को कुछ सुधि आयी. निश्चय किया के वो व्यक्ति चाहे जो भी हो, उसे शेरनी से डर नहीं लगता इतना ही पर्याप्त है तुरंत ही उसकी शरणमें जानेके लिए. इतना सोचकर प्रहलाद पीछे देखनेके लिए अपनी अपनी पीठ की ओर थोड़ा मुड़ा।
पीछे देखते ही प्रहलाद भयभीत हो गया. एक पुरे सवा सात फूट का लंबा और चौड़ा आदमी दृढ कदमों के साथ सीधा उसीकी ओर आ रहा था. उसने पारंपरिक रीती से धोती पहनी हुई थी और धड़ पूरा खुला था. चुस्त कमर, विशाल छाती, बड़ा शीश और बहुविकसित भुजाएं अंधेरेमें भी स्पष्ट दिख रहे थे. परंतु सबसे भयंकर बात यह थी की उसके दाहिने हाथमें एक लंबी खुली तलवार थी जिसे वो बड़ी ही सहजतासे लहराते हुए आ रहा था. अंधेरेमें वह दृश्य भयानक लग रहा था. प्रहलाद सोचने लगा की वास्तवमें अधिक भयंकर कौन है? वह शेरनी या यह प्रचंड पुरुष! चाहे जो भी हो, परंतु यह रात उसकी काल रात्रि है यह प्रहलादने मन ही मन स्वीकार कर लिया था.
वह महाकाय पुरुष जैसे जैसे निकट आ रहा था वैसे वैसे उसका सौम्य स्वरुप दिखने लगा था. दूरसे भयंकर लगने वाला वह अंधकार का साया जैसे जैसे निकट आ रहा था वैसे वैसे वह प्रहलाद के मन को शांत करता जा रहा था. वह एक मध्यम आयु का अधेड़ पुरुष लग रहा था. गोरा रंग, मनोहर आँखे, लंबे सुसज्जित बाल और बाल के ऊपर मोटी शिखा की बंधी हुई जटा, गलेमे रुद्राक्ष माला, विस्तृत कपाल पर चंदन का त्रिपुंड, छाती और भुजाओं पर भी राख से की हुई रक्षा, और उसके ऊपर भी रुद्राक्ष की मालाएं बाँधी हुई. धोती केसरी रंगकी थी. धड़ पर सहजतासे लिपटी हुई जनेऊ उसे कोई ऋषिमुनि का स्वरुप दे रही थी.
'यह साधु जैसा दिखने वाला पुरुष नंगी तलवार लेकर क्यों घूम रहा होगा? चाहे जो भी हो, उसे देखकर ऐसा नहीं लगता की वो किसीको हानि पहुचायेगा'. इतना जबतक प्रहलाद सोच लेता तब तक तो वह तगड़ा पुरुष उसके बिलकुल समीप आकर खड़ा हो गया और स्मित के साथ उसको देखने लगा.
"क्या आप इस जंगल के साधु है? क्या आप सिद्ध महात्मा है? क्या आप प्राणियों की भाषा जानते है? यह तलवार लेकर क्यों घूम रहे है?" प्रहलादसे रहा नहीं गया, उसने सारी औपचारिकताएं छोड़कर सीधे ही अपने प्रश्नों की झड़ी बरसा दी. "हा हा हा. मैं तो इनमेंसे कुछ भी नहीं हु, श्रीमान! मैं तो यहांका स्थानीय निवासी हु. आपको विपत्तिमें पड़े देख मैं दौड़े चला आया". पुरुषने अट्टहास्य करते हु कहा और फिरसे गंभीर होकर बोला "यह सब तो इस जंगल के देवी-देवता है, तात! उनको तो सन्मान से बुलाना चाहिए। यह बात अलग है की लोग आजकल उन्हें 'जानवर जानवार' कहकर संबोधिति करते है, अपने बाप को पूछ पकड़कर हांकते है, परंतु यह सब मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता।
इतना सुनते ही प्रहलाद को याद आया की शेरनी तो अभी भी उसके पीछे ही खड़ी है! शेरनी क्या कर रही है यह देखने के लिए वह पीछे मुड़ा तो उसने देखा की वो तो वापस अपने बच्चों के साथ सड़क पर बैठे हुए भोजन कर रही है. एकबार राहत की साँस लेनेके बाद शेरनी द्वारा उस पुरुषकी बात मान लेने पर प्रहलाद को बड़ा ही आश्चर्य हुआ. परंतु वह जानता था की जंगल के लोगों के लिए यह सब सचमुचमें रोज की ही बात है, इसलिए यह कोई इतने बड़े आश्चर्य की बात भी नहीं है.
"उसकी चिंता मत करो, श्रीमान, गंगा मुझे पहचानती है. वो अब नहीं आएगी। आप निश्चिंत होकर जाइए". इतना सुनते ही प्रहलाद को सुधि आई की अभीतक उसने अपने प्राण बचानेवालेका आभार तक व्यक्त नहीं किया था. "आपका बहोत बहोत धन्यवाद, श्रीमान". प्रहलादने समझकर ही उस शिष्टाचारी व्यक्ति के लिए "Sir" शब्द का प्रयोग नहीं करते हुए 'श्रीमन' से ही सम्बोधित किया. "आपका नाम क्या है श्रीमान?" वातावरण थोड़ा हल्का होनेसे अब प्रहलादने साहजिक शिष्टाचार का प्रारंभ किया। "त्रिलोचनशंकर जटाशंकर भट्ट". क्या अद्भुत नाम! प्रहलाद मन ही मन सोचने लगा. आजके छिछोरे युगमें लोग विचित्र, अर्थहीन और भारहीन नाम रखते है. ऐसे भारी भरखम नामोंका समय क्या कभी वापस आएगा? और यह सशक्त नाम क्या इस विराट पुरुषको शोभा नहीं देता! पहले मैंने उनके लिए भीष्मपितामहकी संज्ञा व्यंगमें ही दी थी. पर मुझे लगता है की भीष्मपितामह अपने समयमें कुछ ऐसे ही लगते होंगे। और उन्होंने शेरनीके सामने बोले हुए दार्शनिक वाक्य उन्हीको शोभा दे सकते है. अहो! यदि यह पुरुष ही इतना सबल व्यक्तित्व वाला है तो स्वयं भीष्मपितामह कैसे होंगे!
"आपका शुभनाम?" प्रहलादके विचारतरंग तुटे. उसने स्थिर होकर उत्तर दिया "प्रहलाद पुरोहित". "किस ओर जा रहे हो, भूदेव?" त्रिलोचन भट्ट अब जान गए थे की प्रहलाद ब्राह्मण है इसलिए उसे 'भूदेव' कहकर संबोधित किया. "अहमदाबाद से वेरावल-सोमनाथ जानेके लिए निकला हुं". "हम्म्म. तो आप कर्णावती से है". प्रहलादको आश्चर्य हुआ. इस जंगलमें रहने वाले इस व्यक्तिको यह कैसे पता है की अहमदाबादका असली नाम कर्णावती है? "क्या आप भी कहीं जा रहे थे, त्रिलोचनभाई.." थोड़ा हिचककर अपना संबोधन सुधारकर प्रहलादने फिर कहा "भूदेव". "मैं तो इस जंगलके छोर तक ही जाने वाला हुं". प्रहलादने सोचा की इस व्यक्तिका इतना बड़ा उपकार है तो इन्हे कमसे कम इतना रास्ता तो पार करवाना ही चाहिए. परंतु अभी भी उसके मनमें वह नंगी तलवार और उसका विचित्र वेशका डर मंडरा रहा था, और सोच रहा था की उसे अपनी गाडीमें बिठाया जाए या नहीं. अतंतः उसने पूछ ही लिया "यह तलवार लेकर कहां जा रहे हैं. और जब आप साधु नहीं है तो ऐसा वेश क्यों बना रखा है?" "अरे... यह सब तो नाटक के लिए है" त्रिलोचन भटने हसते हुए उत्तर दिया. "कल संध्याकालमें वेरावलमें एक नाटक है. उसमें मैं हजार वर्ष पूर्वका ब्राह्मण पुजारीका पात्र अभिनीत कर रहा हुं. नाटकमें महमूद ग़ज़नवी सोमनाथमें सेना लेकर आता है और उसके विरुद्ध मुझे लड़ना है".
त्रिलोचन भट्ट के शब्द सुनकर प्रहलादके कान चमके. एक हज़ार वर्ष... ग़ज़नवी... ब्राह्मण योद्धा... लड़ाई... "क्या आप सोमनाथ महादेवके मंदिर पर हुए आक्रमणके ऊपर नाटक कर रहे हो?" प्रहलादने आतुरतासे पूछा. "हां भूदेव. सोमैया देवके लिए लड़मरे वीर योद्धाओंके स्मरणमें यह नाटक करने जा रहे है. यदि आपको समय हो तो अवश्य आइयेगा". "ज़रूर आऊंगा. पर अभी आप बैठिए मेरी गाडीमें, आपको जहां जाना है वहां छोड़ दूंगा". प्रहलादके लिए यह कृतज्ञता व्यक्त करनेके अतिरिक्त अब स्वार्थका विषय भी था. उसे त्रिलोचन भट्ट्से बहोत महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती थी, इसलि उन्हें गाडीमें बिठाकर लेकर ही जाऊंगा ऐसा मन ही मन निश्चय कर लिया. "अरे हम वनवासियोंका तो क्या है भूदेव, हम तो योजनों तक ऐसे ही चल लें. और आपकी गाडीमें मेरी यह विशाल काया आ भी नहीं पाएगी". त्रिलोचन भट्ट्ने व्यंगात्मक आंखोसे कहा. "नहीं नहीं भूदेव, मैं सीट पीछे कर देता हुं. आपको कोई समस्या नहीं होगी. आपको आना ही पड़ेगा". प्रहलादने अपना निश्चय जता दिया. "ठीक है भूदेव. जो इच्छा सोमैया देवकी". त्रिलोचन भट्ट्ने अपनी तलवार पीछेकी सीट पर रखी, दोनों गाडीमें बैठे और गाडी चल पड़ी. प्रहलादने गाडी सड़कसे निचे उतारी और शेरोंसे बचकर निकाली. जाते हुए शेरनीको फिरसे एकबार देखा. वो भी प्रहलादको ही देख रही थी. शेरनीकी आंखोंमें आंखे डालकर प्रहलाद फिरसे थिरक गया और ईश्वरका उपकार मानकर गाडीको सडकपर फिरसे लाते ही तेज गतिसे आगे बढ़ गया.
"आप यहीं जंगलमें ही रहते हैं?" प्रहलादने बातोंका दौर शुरू किया. "हां. पहले मैं वेरावलमें रहता था. अब बहोत समयसे यहीं रह रहा हुं और मंदिरमें सेवा-पूजा करता रहता हु. प्रायः सोमनाथके दर्शनको चला जाता हु". प्रहलादने गाडीकी गति धीमी करदी क्योंकि जंगल समाप्त होनेमें अब अधिक समय नहीं था और अभी तो बहोतसी बातें त्रिलोचन भट्ट्से जाननी थी. उसने औपचारिक बातोंका दौर आगे बढ़ाया "तो आप पुजारी है... और कल नाटक कहाँ करने वाले है?" "वेरावलमें. अभी यहाँ आगे उतर जाऊँगा. वहांसे पूरी नाटक मंडलीके साथ कल वेरावल जाऊंगा". जवाब सुनकर प्रहलाद समज गया की अब उसे बात जल्दी आगे बढ़ानी होगी.
"सोमनाथ तो आप दर्शन करने ही जा रहे होंगे. पर वेरावल क्या आप किसी कामसे जा रहे हैं?" प्रहलादको जो विषय छेड़ना था वही बात त्रिलोचन भट्टने छेड़ दी, इसलिए प्रहलाद तुरंत ही अपने विषय पर आ गया. "मैं एक इतिहासकार हुं. महादेवके लिए मेरे मनमें पहलेसे ही प्रीति है इसलिए मैं सोमनाथ मंदिरके इतिहासके विषयमें संशोधन कर रहा हुं. मैं यहां पहली बार नहीं आ रहा हु. बहोत बार आ चूका हु. परंतु मुझे मेरे प्रश्नोंके उत्तर नहीं मिल रहे. लोककथाएं तो बहोत है. परंतु आवश्यक सबूत नहीं मिल रहे".
"अच्छा! बहोत अच्छी बात है की आप बहोत पढ़े लिखे है. साधु साधु. सोमैया देवके आशीर्वाद आपपर सदैव बने रहे. परंतु आपके प्रश्न क्या है?" प्रहलद इसी क्षणकी प्रतीक्षा कर रहा था. "वैसे तो बहोत सारा इतिहास जाना हुआ है. परंतु एक बात समजमें नहीं आती. उस समय उज्जैनके राजा भोज और गुजरातके सोलंकी राजा भीमदेव, दोनोंही शक्तिशाली राजा थे. फिरभी उन दोनोंने एक बर्बर स्थितिसे आये हुए और नीच प्रवृत्तियों वाले मेहमूद ग़ज़नवीको इतनी दूरसे आकर सोमनाथ मंदिर क्यों तोड़ने दिया? क्या वो दोनों राजा मिलकर उसे रोक नहीं सकते थे? वो दोनों भी तो शिवभक्त ही थे! अरे, दोनोंमेंसे एक राजा ही काफी था. तो फिर सोरठके राजाको सहाय करनेके लिए दोनोंमेसे कोई क्यों नहीं आया?" प्रहलद एक ही साँसमें अपना पूरा प्रश्न बोल गया. पांच सालसे वह अपने इस प्रश्नका उत्तर ढूंढ रहा था. बातें तो बहोत सुनी थी परंतु कहीं भी पुख्ता प्रमाण नहीं मिल रहे थे. उसे विश्वास था की कोई सच्चे इतिहासको जानने वाला मिलेगा तो कुछ न कुछ प्रमाण तो मिल ही जाएंगे, या तो कोई और मार्ग मिल जाएगा. इसके उपरांत उसके मनमें केवल यह एक प्रश्न नहीं था. उसके व्यक्तिगत प्रश्न अनेक थे. परंतु सार्वजनिक रूपसे उसके संशोधनका विषय यही था... और इसीका उसे वेतन मिलता था!
"उस समय पाटण के सोलंकी और उज्जैन के परमारों के बिच शत्रुता थी. सोरठका राजा भी सोलंकियोंके निचे था पर उनके साथ नहीं था. मेहमूदके आनेका समाचार मिला तब उसने दोनों राजाओंको सहायताके लिए पत्र लिखा, पर दोनोंमेंसे कोई भी अपना अहंकार छोड़कर सोमनाथको बचानेके लिए नहीं आया. समय जानेपर दोनोंही राजाओंको अपनी मुर्खताका ज्ञान हुआ और फिर दोनोंने मिलकर फिरसे सोमनाथ मंदिर बनवाया. पर तब पछताए होवत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत! पिछले एक हजार सालोंसे हिन्दुओंकी यही गति रही है. एक होकर लड़े होते तो क्या किसीमें साहस था!" त्रिलोचन भट्ट पूरी बात बड़ी ही सहजता से बोल गए. परंतु प्रहलाद यह कहानी कोई पहली बार नहीं सुन रहा था. वह यह बात भली भांति जानता था परंतु उसे इस बातके कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल रहे थे. "यह बात मैंने भी सुनी है, भूदेव. पर क्या इसके कोई लिखित दस्तावेज मिल सकते है? किसी एक राजाने दूसरे राजको भेजा हुआ संदेश, कोई शिलालेख, कोई पत्र... कुछ भी". प्रहलादको बातोंमें रूचि नहीं थी. उसे तो अपने संशोधन पत्रमें जोड़नेके लिए प्रमाण चाहिए थे. "दस्तावेज? दस्तावेज तो कागजों का ढेर होते है, भूदेव! उसका क्या करोगे? आपके सामने जीता जागता इतिहास रह रहा है. वेरावल जाइए... छोटे छोटे बच्चोंको भी सब पता है. क्या अंग्रेजीमें पढ़ पढ़कर अंग्रेजी पध्धतियोंके हथ्थे चढ़ गए? अंग्रेजी पद्धतियोंका इतिहास थोड़े समयमें या तो नष्ट हो जाता है, या तो भ्रमित हो जाता है. हमारे रामायण महाभारत आज भी लोगोंके हृदयमें वैसे के वैसे ही जीवित है. दस्तावेज तो एक व्यक्ति लिखता है, भूदेव. पर लोककथा तो पूरा समाज याद रखता है."
त्रिलोचन भट्टकी यह बात सुनकर प्रहलाद कुछ देर तक अवाक् रह गया. उनका तर्क सही है या गलत यह मूल्याङ्कन करने लगा. उनकी बात गलत नहीं थी. इतना बड़ा समाज सही है या किसी एक व्यक्तिने लिखा हुआ दस्तावेज? न जाने वह दस्तावेज लिखते समय उस लिखने वालेकि मनःस्थिति क्या रही होगी? क्या उसकी मंशा, क्या विवशता होगी? उसका प्रमाणके तौर पर निश्चयात्मक उपयोग कैसे किया जा सकता है? और फिर इतिहासकार लोककथाओंको काल्पनिक कथा कहकर क्यों नकार देते होंगे? क्या केवल इतिहासकार ही बुद्धिमान हैं, और बाकी का समाज ढोंगी, निर्बोध और जूठा? नहीं नहीं. वैसे इतिहासकार भी इतने निर्गुण नहीं है. वे लोककथाओंको महत्त्व तो देते ही है, पर साथ ही साथ प्रमाणों को भी तोलते है. किसी प्रमाण बिना ही कोई सिद्धांत कैसे प्रस्थापित हो सकता है? त्रिलोचन भट्ट अपने स्थान पर सही है परंतु उसे तो अपना काम ही करना चाहिए.
"क्या सोच रहे हो भूदेव?" त्रिलोचन भट्ट्ने प्रहलादकी समाधी तोड़ दी. "आपके नाटक समुहमें कोई ऐसा है जो मुझे किसी ठोस प्रमाण तक ले जा सके? मेरे लिए वो आवश्यक है". त्रिलोचन भट्ट अब समज गए थे की प्रहलाद बिना प्रमाणोंके नहीं मानेगा "क्षत्रिय तो सारे मेरे सोमेश्वर के काम आ चुके थे. उनके स्त्री और बच्चे भी वो महानीच पिशाच उठा ले गए थे. इसलिये उनका इतिहास कहने वाला कोई बचा नहीं था. अंतमें ब्राह्मण और मंदिरके पुजारी ही बचे थे. उनकी थोड़ी प्रजा बच गई थी. इसलिए उनका इतिहास कहने वाले लोग अभी भी है. पर जैसे आपको चाहिए वैसे दस्तावेज नहीं मिलेंगे". त्रिलोचन भट्ट स्थिर आंखोसे बोल गए. "हां. मैं वो इतिहास जानता हु" प्रहलादने आगे बोलते हुए कहा "सेंकडो ब्राह्मणोने अपने शीश दिए थे. ग़ज़नवी के पिशाच उनके कंधेके ऊपर प्रहार करके पुरे ब्राह्मणको खड़े खड़े ही चिर देते थे. इसीसे 'जनेऊचिर घात' शब्द प्रचलित हुआ". प्रहलादकी यह बात सुनते ही जैसे प्रहलादने उन शूरवीर ब्राह्मणोंका अपमान किया हो ऐसे तुच्छकारपूर्ण स्वरमें त्रिलोचन भट्टने कहा "महमूद के सैन्य की बातें तो बहोत सुनी लगती है. पर क्या उस समय युद्धातुर हुए परशुरामोंके बारेमें भी कुछ सुना है, भूदेव?" इतना सुनते ही प्रहलादके कान चमक उठे. क्या वो सचमें सोमनाथकी सेवा करने वाले ब्राह्मणोंकी शूरवीरताके विषयमें जानते होंगे? कहने वाले कहते है की वे बहोत बहादुरी से लडे थे. पर युद्धकी छोटी छोटी बात कोई जानता नहीं. यह महाशय इस विषयमें अवश्य ही जानते होने चाहिए क्योंकि वे इसी विषय पर नाटक करने जा रहे है, इसलिए उनसे अधिक यह बात कोई नहीं जानता होगा. त्रिलोचन भट्टके बदली हुए स्वरसे वह यह भी समज गया की यवन सैन्यकी प्रशंशा उन्हें पसंद नहीं आयी है. इस विषयमें प्रहलादका सोचना भी समान ही था. यवनोंकी एकतरफी प्रशंशा सुन सुनकर वह स्वयं भी ऊब चूका था. कितने वर्ष बीत गए. प्रहलाद बचपनसे ही यह कहानी जानना चाहता था. उसके पूर्वज बड़ी ही वीरता से लडे होंगे ऐसी उसे श्रद्धा थी. पर "जनेउचिर घात... जनेउचिर घात..." इस शब्दने उसके मनको ग्रसित कर दिया था. जब भी ब्राह्मणो और मेहमूद के बीचकी लड़ाईकी बात चलती थी तब कोई न कोई यह शब्दका प्रयोग कर ही देता था, और प्रहलादड के हृदयमें शूल भोंका जाता था. क्या सारे वार उन जंगली पिशाचोंने ही किये थे? तेजवान ब्राह्मणोने क्या कोई वीरता नहीं दिखाई थी? इन सारे प्रश्नोंके उत्तर त्रिलोचन भट्टसे मिलेंगे इसी आशा के साथ प्रहलादने अपना हृदय खोलते हुए कहा...
"भूदेव, मेरे पूर्वज भी भट्ट थे और सोमनाथ के निवासी थे. समयोपरांत गुजरात आकर पुरोहित कार्य करने लगे इसलिये पुरोहित उपनाम लग गया. मैं ठीकसे तो यह नहीं जानता की मेरे पूर्वज उस युद्धमें लडे थे या नहीं, पर मेरे लिए उनका इतिहास जानना बहोत आवश्यक है. कहिए भूदेव, कहिए की वो वीर कैसे लडे थे!" प्रहलादने उत्सुकता से प्रश्न किया. प्रश्न सुनते ही जैसे त्रिलोचन भट्ट उसका कोई भेद जान गए हो ऐसे सस्मित कहा "तो यह आपका असली प्रश्न है, सही ना? तो फिर पहले बात गोल गोल क्यों घुमा रहे थे? या आपको ही पता नहीं की आप क्या ढूंढने निकले हो?" प्रहलाद थोड़ा क्षोभमें पड़ गया. वह वास्तवमें यह नहीं जानता था की उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण क्या है, उस घटना का सत्य जानना या फिर अपना स्वयंका ही सत्य जानना! क्या उस युद्धमें उसके पूर्वज लड़े होंगे? यदि लड़े थे तो कैसी वीरता से लाडे थे? और यदि वीरतासे ना लड़े हो तो भी वो उन्हें अपने पूर्वजके रूपमें स्वीकार कर सकता था? प्रहलादके मनमें अनेक प्रश्न थे. वो तो यह भी नहीं जानता था की उसने सोमनाथ मंदिरका विषय शिव शंभु के लिए उसकी भक्ति के कारन लिया है या फिर अपना सत्य जानने के लिए!
"आप उस युद्धके बारेमें जितना भी जानते है वह छोटी से छोटी बात भी कहेंगे तो मुझे बहोत अच्छा लगेगा" प्रहलादने उत्सुकता से कहा. वह यह भी समज गया था की पुजारी भलेही जंगलमें रहने वाला हो, परंतु उसे निर्बोध समझना मूर्खता ही होगी. जो बातें बड़े बड़े ज्ञानी नहीं समज पाते वह बाते यह व्यक्ति बड़ी ही सरलतासे कह देता है. इसलिए वह जो भी कहेंगे वह निराधार बात तो नहीं ही होगी.
"तो सुनिए भूदेव, ब्रह्मतेजकी यह शौर्यगाथा" त्रिलोचन भट्ट छाती फुलाकर अपनी सीट पर आगे आ गए. उनका सर गाडी की छत पर छूने जा रहा था पर उसकी चिंता किये बिना ही जैसे की अभी वह नाटकका द्रश्य अभिनीत करने जा रहे हो ऐसे उन्नत मस्तकसे गाथाका वर्णन करना शुरू किया.
"क्षत्रिय सारे वीरगतिको प्राप्त हो चूक थे, गांव लूट गया था, सामान्य प्रजा भाग चुकी थी, और सोमैया देवको भी मंदिरसे निकालकर अन्य स्थान पर ले जाया गया था. बचा था केवल वह पुराना मंदिर. एक देव से रिक्त मंदिर और उसकी रक्षा करने वाले एकसौ अठारह बलवान भूदेव". नरबंकोंकी गाथाका वर्णन आरंभ हो चूका था. प्रहलादके लिए उन एकसौ अठारह ब्राह्मण योद्धाओंके स्वरूपकी कल्पना करना कठिन नहीं था. वे सभी त्रिलोचन भट्ट जैसे ही दीखते होने चाहिए ऐसी उसने कल्पना कर ली. अब वो इन योद्धाओमें कही न कही अपने पूर्वजों को देख रहा था. वह आतुर था यह जानने के लिए की उसके पुर्खोने युद्धमें कैसा कौशल दिखाया था. धीरे धीरे वह अतीतमें सरकता जा रहा था और गाडी की गति धीमी पड़ने लगी थी.
"प्रजाने भूदेवों को बहोत मनानेका प्रयत्न किया की भाग जाओ, तात... भाग जाओ. मंदिर तो टूटकर रहेगा. देव तो सुरक्षित ही है. यदि प्राण रहे तो फिरसे मंदिर बनाएँगे. पर आपके जैसे तपस्वी भूदेव कहांसे लाएंगे?" त्रिलोचन भट्ट जैसे यह घटना ताद्रश्य निहार रहे हो ऐसे बोलते रहे "भूदेवोनें कहा, नहीं तात नहीं, इस सोमैयाके काज तो यह स्थूल शरीर इतने चौड़े हुए है. आप सबकी दी हुई भीख खा खा कर यदि आज हम सोमैयाके काम ही नहीं आये तो हम किस जन्ममें छूटेंगे? आजका दिन तो भोलानाथके लिए कमलपूजा करनेका दिन है, तात. ऐसा अवसर जाने दें, ऐसे गुणहीन नहीं है हम. आप जाओ तात... आप जाओ. हमारे स्त्री और बच्चोंका ध्यान रखना, और हमारी ब्याधि मत करना. आने दो मैम्मूदको! उसकी मति भी ठिकाने ला देंगे. अब देर ना करो... जाओ तात, जाओ. हम यहीं खड़े है मैम्मूदके स्वागतके लिए!" इतना बोलते हुए तत्रिलोचन भट्ट जैसे स्वयं महमूदकी राह देखते खड़े हो ऐसे एक पल के लिये ठहरकर फिर बोलना शुरू किया. "उन नरबंकोमें पांच भाई थे. पांच पांडव जैसे भाई. शत्र और शास्त्र दोनोंके ही ज्ञानी. विराट और पराक्रमी. पांचोने निश्चय किया की मारेंगे तो मेहमूद! किसी औरमें समय व्यय ना किया जाए. सीधा ही उस नराधम की और जाना". प्रहलादका रक्तचाप और गाडीकी गति, दोनोही बढ़ रहे थे. त्रिलोचन भट्ट्ने गहरी साँस ली और जैसे अभी युद्ध शुरू ही करने वाले हो ऐसे गहरी आवाजमें बोलना शुरू किया "अंततः सैन्य आ गया. आगे मेहमूद खुश होते होते आ रहा था और पीछे उसका चारसौ सैनिको वाला सैन्य था. उसको लगा की क्षत्रियोंके मरनेके बाद अब उसके सामने कोई नहीं आयेगा. पर उसके सामने एकसौ अठारह योद्धा कपाल पर त्रिपुंड, नंगे धड़, हाथ और गलेमें रुद्राक्ष के साथ शरीर पर भस्मालेप करे हुए 'हरहर महादेव... हरहर महादेव...' की गर्जना कर रहे थे. उन सबके हाथोमें नंगी तलवार ऐसे सोह रही थी जैसे परशुरामके हाथोंमे परशु!".
गाडीमें अब एक अजब ही युद्दोन्माद छा चूका था. दोनों ही प्रवासी जैसे अभी वहां थे ही नहीं. वे दोनों एक हजार वर्ष पूर्व सोमनाथ मंदिरके प्रांगणमें खड़े खड़े ग़ज़नवीको खड़े खड़े चीर देनेकी ताकमें खड़े थे, और हरहर महादेवकी गर्जना कर रहे थे.
"कायर मेहमूद यह दृश्य देखकर सहम गया. मक्का और मदिनाके हरहर महादेवके नाद अभी भी उसके कानोंमें गूंज रहे थे. ऊँचे और विराट नरबंकोंको देखकर उसके गात्र शिथिल होने लगे. सबसे पीछे अपने अंगरक्षकोंके साथ जाकर खड़ा हो गया वह निर्माल्य, और सैन्य को आगे जाकर लड़नेको आदेश दिया. पर उन पांच भाइयोंका लक्ष्य तो एक ही था. मैम्मूद. पांचो उसकी तरफ दौड़ने लगे और बीचमें जो भी आता गया उसे काटते गए. अरबी लुटेरोंने योद्धा तो बहोत देखे थे, पर तपस्वी योद्धओंका प्रकोप कैसा होता है, उनकी खड़गकी गति कैसी होती है, यह पहली बार ही देख रहे थे. आधे तो अभी कुछ देखे और सोचे इससे पहले ही उनके शीश दूर पड़े पड़े अपने धड़को डगमगाते हुए निचे गिरते देख रहे थे. पुरे के पुरे घोड़े को काट डालने वाली खड्गों को देखकर सैन्यके घोड़े भी भाग जाने लगे. भाले वालोंके भाले उनतक पहुंच पाएं उससे पहले तो शंभुसेना उनतक पहोच जाती थी और भाले उन मृतदेहोंके हाथोमें धरे के धरे ही रह जाते थे".
प्रहलाद जोरसे बोल उठा "हरहर महादेव"! उसकी गाडीकी गति तीव्र हो चली थी. उसके शरीरमें ऐड्रिनलिनका स्त्राव अपने महत्तम स्तर पर था. इस क्षणका एक ही लक्ष्य था... मैम्मूद को मारना!
"सैन्य अस्तव्यस्त हो चूका था. सैनिक पिछेसे आने वाली और टुकड़ियोंकी प्रतीक्षामें विवश होकर लड़ रहे थे. जबतक और सैनिक नहीं आते तबतक उनके मस्तकोंको भगवाधारी योद्धओंकी खड़गकी प्रतीक्षा करनेके उपरांत और कोई विकल्प नहीं था. अवसरका लाभ लेकर पांचो भाई मेहमूदकी ओर दौड़े. अंगरक्षकोंके साथ उनका तुमुल युद्ध हुआ. चार भाई सोमैयाको समर्पित हो गए, पर अपने सबसे बड़े भाई के लिए मार्ग खुला करते गए. मेहमूद सामने ही था. केवल दो ही अंगरक्षक उसके समीप थे, बाकि सब पांच गज़ दूर थे. अवसर देखकर बड़े भाईने दोनोंही अगंरक्षकोंके शीश एक ही प्रहारमें धड़से अलग कर दिए. दूर खड़े हुए कोईभी रक्षक इस बिजलीकी चमकके समीप जा पानेको सक्षम नहीं था, इसलिए सबने एकसाथ अपने भाले बड़े भाई की तरफ फेंक कर प्रहार करा. भाले उसतक पहोच पाते उससे पहले ही वह सोमेश्वरका दास 'हरहर महादेव' के नाद के साथ वनराजकी भांति कूदा और खड़गका प्रहार सीधा मेहमूदके शीश पर किया. नपुंसक मेहमूद पीछे भागने लगा और अपना सर पीछे खिंच लिया. भुदेवका प्रहार थोड़ा पीछे रह गया और मेहमूदका नाक काटते हुए उसकी खडग निचे आयी. वह दूसरा प्रहार करे उससे पहले रक्षकोंके उड़ते हुए भाले उसके नश्वर देहको छेदकर निकल गए".
त्रिलोचन भट्टकी आँखें लाल थी, मुठ्ठियाँ पीसी हुई थी, नसें फूली हुई थी, और आँखें स्थिर थी जैसे वे वह दृश्य अपने सन्मुख ही देख रहे हो. प्रहलादकी स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी. वह अंतर्मनमें यह मानता था की उसके पूर्वज इस युद्धमें अवश्य ही लडे थे, पर उसके पास यह मानने के लिए कोई प्रमाण नहीं था. ग़ज़नवीका नाक कटा हुआ जानकार उसके मनमें एक अजब संतोष छा गया पर आगे अभी बात कुछ बाकि होगी यह सोचकर आतुरतसे पूछा "आगे क्या हुआ भूदेव? जल्दी कहिए". "आगे क्या कहु तात! रक्षकोंके भालों के प्रहार के बिच उस महावीरने महामृत्युंजय मंत्रका जाप किया और आशुतोषकी चरणसेवामें रहनेका सदाव्रत मांगकर उस मिट्टीके देहको त्याग कर दिया. अमर हो गया".
गाडीमें मौन छा गया. कुछ देर तक किसीने ना ही कुछ पूछा और ना ही कुछ कहा. रोष और उन्माद अब ढल रहा था और प्रहलादका मन गर्वसे भर रहा था. मरना तो एक दिन सबको है, परंतु यदि चंद्रशेखरकी सेवामें मस्तक रखनेका भाग्य लिखा हो तो वह मृत्यु जीवन से भी धन्य है. इस युद्धके हुतात्माओंमें उसके अपने पूर्वज भी हो सकते है इस विचार से प्रहलादका मन रोमांचित हो उठा था. वो इस क्षणको यही स्थगित कर देना चाहता था. वह इस गर्वान्वित क्षणको चिरसमय तक जीना चाहता था. परंतु घड़ीभर के वीरामके बाद त्रिलोचन भट्टके शब्दोंने इस स्थिरता को तोडा "मेहमूदने मंदिर तो तोडा, पर उसे देव नहीं मिले. वह सोमनाथ धन लूटने नहीं आया था. आरबके हिन्दुओंने इस्लाम नहीं माना और सोमनाथ आकर रहने लगे इस बातका उसे क्रोध था. मक्काके महादेवकोतो उसने मस्जिद बनाया था, तब वहांके शिवभक्त सोमनाथ आ गए थे. इसलिए द्वेषके मारे वो सोमनाथ तोड़ने आया था. पर उसे देव नहीं मिले इसलिए वह बहोत क्रोधित हुआ और अपनी कटी हुई नाक लेकर वो वापस अरबस्तान भी जानेसे लज्जित था. आगे जाते हुए उसका और उसके पुरे सैन्यका अंत भी निकट ही था. और वो भी एक भुदेवके हाथों ही होने वाला था".
वातावरण फिरसे शांत हो गया. प्रहलाद धीरे धीरे फिरसे इक्कीसवी सदीमें वापस आनेका प्रयत्न कर रहा था. गाडीकी बढ़ी हुई गति भी उसके ध्यानमें आयी - एकसौ दस! इस जंगलमें एकमार्गीय सडकपर यह गति अत्यंत ही आपत्तिजनक हो सकती थी. उसने जल्दीही गति घटाकर सत्तर पर ला दी. उसे अब याद आया की वह एक इतिहासकार है और वो यहां अपना संशोधन करने आया है. उसके लिए कही सुनी बातोंका कोई मोल नहीं है. उसे आवश्यकता है ठोस प्रमाणोंकी. उसके पास अब अधिक समय भी नहीं था इसलिए तुरंत ही मूल विषय आते हुए कहा "भूदेव, आपकी बातोंने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया. परंतु आप बुरा नहीं मानना, मैंने कथाएं बहोत सुनी है, पर मुझे उसका कोई आधार भी तो चाहिए. क्या आप इस विषयमें कोई ठोस प्रमाण दिला सकते है? कोई पत्र, कोई शिलालेख? कोई समाधीके ऊपर लिखा गया विवरण भी चल सकता है". प्रहलाद वैसतो मन ही मन स्वीकार चूका था की त्रिलोचन भट्ट्ने कही बात शत प्रतिशत सही है. जो निडर योद्धा केवल मरनेके लिए ही रणभूमिमें उतरे हो वो क्या नहीं कर सकते! जब अपने प्राणों पर बन आती है तो एक छोटासा कीड़ा भी असह्य पीड़ा दे जाता है, तो यह सब तो ब्रह्मतेजसे लथपथ तपस्वी थे! उनका प्रकोप तो महाकालके प्रकोपके समान होना चाहिए. निःशंक ही वे वीरता से लाडे होंगे. पर इतहासजगत ऐसी मनोवैज्ञानिक बातें नहीं मानता। उन्हें तो चाहिए लिखित पन्नोंके ढेर. और यही ढेर उसे खोजने हैं.
"आपको सत्य जानना है या प्रमाण चाहिए?" त्रिलोचन भट्टका सीधा और वेधक प्रश्न आया. यह सुनकर प्रहलादभी सोचने लगा. क्या प्रमाण है तो ही सत्य का अस्तित्व हो सकता है? और यदि छोटे बड़े प्रमाण सत्यसे विरुद्ध मिले तो क्या वह असत्य बन जाता है? पर सत्य कभी छुप नहीं सकता यह बात सही है तो फिर उसके प्रमाण भी तो मिलने चाहिए! साला, जबसे यह व्यक्ति मिला है तबसे दिमागमें केमिकल लोचा ही कर रहा है. मुझे लगा की यह मेरी मदद करेंगे, पर इन्होने तो मुझे ही भ्रमित कर दिया. वे निःसंदेहही एक प्रखर विचारक है, पर मुझे कठिन प्रश्न पूछ पूछ कर भ्रमित कर रहे है. कल इनके नाटकमें जाकर किसी सीधे सादे व्यक्तिसे पूछूंगा तो शायद मुझे कोई मार्ग मिल जाएगा.
"बस, यही रोक दो भूदेव" त्रिलोचन भट्ट्ने संकेत करते हुए कहा. "यहीं सड़क पर? आपको जहां जाना हो वहां मैं छोड़ दूंगा. अभी उजाला हुआ नहीं है. आपको रास्तेमें मुश्किल पड़ सकती है". अभी तक प्रहलादके भावनात्मक तंतु त्रिलोचन भट्टके साथ जुड़ चुके थे. उसने केवल औपरिक विवेक के लिए नहीं, परंतु उनके लिए चिंताको लेकर उन्हें अंत तक छोड़ने आनेके लिए आग्रह किया. "अपना मार्ग अपनेको स्वयं ही ढूँढना पड़ता है. दूसरोंसे कबतक सहायता मांगते रहेंगे, भूदेव? अपना हाथ जगन्नाथ. गाडी रोकिए, मेरा स्थान आ गया". प्रहलादको समजमें नहीं आया की उन्होंने उसपर व्यंग किया या फिर अपनी बात कही! क्या वो मेरे प्रश्नोंका उपहास कर रहे थे? वो चाहे जो हो, पर उनके गाड़ी रोकनेके आदेशात्मक सूचनका उल्लंघन करना असंभव है, यह सोचकर प्रहलादने गाडी वहीं रोक दी. त्रिलोचन भट्ट निचे उतर गए और तलवार भी हाथमें ले ली. "चलो फिर... जय सोमनाथ..." गाडीका दरवाजा बंध करते करते त्रिलोचन भटटने एक हाथ ऊँचा करते हुए कहा. "जय सोमनाथ" प्रहलाद उत्तर देकर देखता रहा. "कल नाटकमें आ जाना. आपको सत्य जानना है तो सत्य मिल जाएगा, और प्रमाण चाहिए तो प्रमाण" इतना कहतेही भूदेव तो तुरंत ही चलने लगे. प्रहलादको उनके कहे वाक्यका अर्थ अभी समजमें भी नहीं आया था और वे तो आगे निकल गए. एक क्षणके बाद प्रहलादको याद आया की कल नाटक देखने के लिए कहां जाना है यह तो पूछा ही नहीं! वो तुरंत ही गाडीसे नीचे उतरा और ऊँची आवाज़से पूछा "भूदेव, कल नाटकमें कहां आना है यह तो बताते जाओ..." "भट्टकी वंडी पर आ जाना" सामनेसे आवाज़ आई पर पीठ मोड़कर देखा नहीं. तेज़ीसे दूर जा रहे त्रिलोचन भट्टकी आसपास कुत्ते भोंक रहे थे. पर वे अपनी अविचलित गतिसे सीधे ही जा रहे थे. जबतक वे अंधेरेमें विलीन नहीं हो गए तबतक प्रहलाद उन्हें देखता रहा. "कैसा अदभुत और निडर व्यक्तित्व था! एकबार मुझे उन्होंने कही हुई बातोंका प्रमाण मिल जाए की मैं तुरंत ही उनके चरण स्पर्श करने यहाँ आऊंगा" प्रहलाद मन ही मन बोलते हुए फिरसे गाडीमें बैठ गया और सोमनाथ के लिए निकल गया. उसे पता नहीं था की पुरे वेरावलमें वो भट्टकी वंडी कहां ढूंढेगा, इसलिए उसके लिए समय भी बचाना पड़ेगा.
दूसरे दिन सोमनाथ महादेवके दर्शन करनेके बाद प्रहलादने बहारसे अपने पांच सालके बेटेके लिए एक खिलौना ख़रीदा और सीधा ही निकल गया वेरावल की ओर. बहुत ढूँढ़नेके बाद पता चला की भट्टकी वंडी पुराने वेरावलकी सिकड़ी गलियोंमे आई हुई है जहां उसकी गाडी नहीं जा सकती इसलिए वह पैदल ही उन गलियोंमें घुसा और अंतमें भट्टकी वंडीका पुश्तैनी दरवाजा खटखटाया. अंदरसे एक पांच-छे सालके लड़केने दरवाजा खोला. बालकको देखते ही प्रहलाद चकित रह गया. वह बालक बिलकुल ही उसके बेटका जुड़वा भाई हो ऐसा लग रहा था. एक क्षणके लिए तो उसे ऐसा ही लगा की वो उसीका बेटा है. कुछ पल उसे निहारनेके बाद उसे अंदरसे किसी बड़े को बुलाने के लिए कहा. अंदरसे उसकी माता घूँघट करते हुआ आई. "यहां नाटक कब होने वाला है?" प्रहलादने सहजतासे पूछा. "नाटक? कैसा नाटक? यहां तो कोई नाटक नहीं होता. लगता है आप रास्ता भूल गए है. गृहिणीका उत्तर आया. "यह भट्टकी वंडी ही है न? और वेरावलमें और तो कोई भट्टकी वंडी तो नहीं?" प्रहलादने आतुरता से पूछा. "हां. यह भट्टकी वंडी ही है, और पुरे वेरावलमें और कोई भट्टकी वंडी नहीं है. और यहां कभी कोई नाटक नहीं होता. आपको किसीने गलत सुचना दी लगती है." प्रहलाद निरास हो गया और उसे कुछ सूज नहीं रहा था की अब वो क्या करे. त्रिलोचन भट्ट जुठ क्यों बोलेंगे? और उसने 'भट्टकी वंडी' ऐसा बराबर सुना था. अब निरास होकर वापस जानेके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं था इसलिए द्वार की तरफ मुड़ा की जहां वो बालक खड़ा था. बालक पर फिरसे प्यार आनेसे उसे अपने बेटे के लिए लिया हुआ खिलौना दे दिया, उसे प्यारसे सहलाकर वह जैसेही उठकर द्वार की ओर जा रहा था की पीछेसे गृहिणीकी आवाज आई "अब यहांतक आ ही गए हैं तो यहां मथ्था टेकते जाइए". प्रहलादने पीछे मुड़कर देखा तो गृहिणी अपनी बायीं ओर हाथसे संकेत कर रही थी. प्रहलादने उस दिशामें देखा तो वहां एक लंबा और अर्धगोल पथ्थर जमीनमें थोड़ा गड़ा हुआ था. और उसपर लिखा हुआ था "त्रिलोचनशंकर जटाशंकर भट्ट - सड़सठ यवन राक्षशोंका वध किया. मेहमूद ग़ज़नवीकी नाक काटी, और सोमनाथ महादेवके काम आये... वि.सं. १०८३".
*ऐतिहासिक तथ्योंपर आधारित काल्पनिक कथा
** कमल पूजा का अर्थ है अपना शीश काटकर शिवके चरणोंमें प्रस्तुत करना
*** मेहमूद ग़ज़नवी और मेहमूद गज़नी एक ही व्यक्तिके नाम है
**** सोमनाथ मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए है. यह कथा सबसे पहले हुए आक्रमण पर आधारित है
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