क्या "जिन्दगि ना मिलेगि दोबारा" ऐसा सोचना सही है?

 क्या "जिन्दगि ना मिलेगि दोबारा" ऐसा सोचना सही है?

यह एक भोगवादी विचारधारा है जिसकी जड़ें अब्राहमिक मजहबों से जुडी हुई है। अब्राहमिक मजहब मानते है की यह पूरा जगत मनुष्यों - और विशेषतः पुरुषों के उपभोग के लिए बना हुआ है। वे पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को तो मानते नहीं, इसलिए वे यही सोचते है की एक ही अवसर मिला है भोग भोगनेका, फिर तो मरनेके बाद कब्र में पड़े पड़े क़यामत का इंतेज़ार ही करना है, तो इसलिए जितने अधिक भोग भोगे जाएं उतना ही बढ़िया है। इससे अधिक मूर्खतापूर्ण और अंधकारमय सोच नहीं हो सकती

हमारी संस्कृति इस विषय में स्पष्ट, गहन और अधिकारात्मक है। यह पूरी सृष्टि देवताओं से बनी हुई है। सृष्टि का दोहन तो हम कर सकते है, जो की हमारे पोषण के लिए आवश्यक है, परन्तु अविचारी उपभोग से इसका संहार वर्ज्य है। और हमारे कर्मों का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता।  कर्मों को भोगे बिना कोई छुटकारा नहीं है। हमको जीवन एकबार नहीं, बार बार मिलता है, और अनेक पशु पक्षियों की योनि में हमें कर्म भुगतने पड़ते है। जिन भोगों को हम भोगने की बात करते है, वे सारे भोग हम अनेकबार, अनेक जन्मों में भोग चुके है। हम चाहे या ना चाहे, हमें नयी नयी योनियोंमें नए नए जन्म मिलते ही रहेंगे। हम चाहे ऊब जाएं अपने भोगों से, या थक जाएं दुःख सहते सहते, पर कर्म भुगतने के लिए हमें जन्म लेते ही रहना पड़ेगा। इसलिए बुद्धिमानी इसीमें है की भगवान् की शरण में जाकर मोक्ष की कामना करें। 

कर्मफल क्या होता है, कर्म का सिद्धांत कैसे काम करता है, कर्म की गति कैसी होती है, और कर्मों से छुटकारा कैसे मिलता है, यह विषय पर पढ़िए मेरी "कर्मसिद्धांत श्रृंखला"। 

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