कर्म सिद्धांत - भाग १ - कर्मों के कितने प्रकार होते है?

 ॐ श्री गणेशाय नमः

लोगों को पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख के विषयमें अनेक प्रश्न होते है। और जब उनको संतोषकारक उत्तर नहीं मिलता तब उनमें अश्रद्धा की स्थिति उत्पन्न होती है, और फिर नास्तिकता आ जाती है। केवल सामान्य लोग ही नहीं, बड़े बड़े विद्वान् भी इस विषयमें अज्ञान के कारण स्वयं भी अश्रद्धावान होते हुए देखे गए है, और दूसरों को भी नास्तिक बनाते है। 

कुछ तथाकथित विद्वान् कहते है की - "सब यहीं का यहीं है"। परन्तु जब वे अच्छे मनुष्यों को दुखी होते देखते है तब अपनी ही इस मान्यता पर अश्रद्धा उत्पन्न होती है, और अंत में नास्तिक बनकर अपनी अधोगति कर लेते है।

इसलिए लोगों का अज्ञान दूर हो, और ईश्वर में श्रद्धा बैठे इस हेतु से इस "कर्म सिद्धांत" श्रृंखला के माध्यम से मैं शास्त्रसम्मत रूप से कर्मों की गति, कर्मो का विज्ञान, स्वर्ग-नर्क, कर्मों के प्रकार इत्यादि विषयों पर विशद चर्चा करनेका प्रयत्न करूँगा। 

इस श्रृंखला के श्रद्धावान पाठकों को इस श्रंखला के समाप्त होते तक मनमें किसी भी प्रकार का संशय अथवा प्रश्न शेष न रह जाए ऐसा प्रयत्न मैं करूँगा। महादेव मुझे इसके लिए यथोचित सामर्थ्य प्रदान करें, इसी प्रार्थना सह....

-----------------------------------------------

कर्मों के मुख्यतः तीन वर्ग होते है। 

१. संचित कर्म    २. प्रारब्ध कर्म    ३. क्रियमाण कर्म (अथवा आगामी कर्म)


संचित कर्म 

ये कर्म ऐसे है जो हमने अनेक जन्मों से इकठ्ठे किए हुए है, और अभी उनको भोगे नहीं गए।  प्रत्येक जन्ममें हम कर्म करते है और हमारे कर्मों का भार बढ़ाते जाते है। 

प्रारब्ध कर्म 

ये उन कर्मों का समूह है जो की हम इस जन्म में भुगतने वाले है। संचित कर्मोंमेंसे कुछ ही भाग हमको इस जन्म में भुगतनेको मिल सकता है, क्योंकि संचित कर्म तो अनेक जन्मों के होते है।  एक जन्ममें हम वे सारे कर्म भुगत नहीं सकते। इसलिए इस जन्म में जिन कर्मों को हमें भुगतना है उन कर्मों के समूह को प्रारब्ध कहते है। ये वही कर्म है जिसे हम "भाग्य" कहते है (और उसको कोसते भी रहते है)। 

क्रियमाण कर्म

इस जन्म में हमें हमारे कर्म तो भुगतने ही है। परन्तु साथ ही साथ हम नए कर्म भी करते जाते है। तो जो नए पाप-पुण्य इकठ्ठे होते जाते है इनको क्रियमाण कर्म कहते है। क्रियमाण कर्म का फल इस जन्म में अथवा आनेवाले जन्मों में मिल सकता है।

क्यों कुछ लोग पाप न करनेपर भी दुखी होते है, और कुछ लोग पुण्य न करनेपर भी सुखी होते है?

मनुष्य अपने इस जन्म में अपने किस जन्म का फल भोग रहा है, यह कोई नहीं जानता। यह केवल ईश्वर ही जानता है। हो सकता है कि मनुष्य बहुत पापी होने के बावजूद अपने किसी जन्म के पुण्यों को भोग रहा हो, और ऐसा भी हो सकता है कि कोई बहुत अच्छा व्यक्ति अपने पापों का बोझ इस जन्म में उतार रहा हो।

यहाँ नीचे दो कोष्ठक दिए गए है। इन कोष्ठकोंमें इन तीनों प्रकार के कर्मों के उदहारण के साथ आलेखन किया गया है। यह उदहारण सरलता से समझने के लिए है। 


आप ऊपर देख सकते है की संचित कर्म तो बहुत अधिक मात्रा में होते है, और अनेक प्रकार के होते है। वो सब एक ही जन्म में भुगतना संभव नहीं है। इसलिए उनमेंसे अमुक भाग लेकर हमारे एक जन्म का प्रारब्ध निश्चित होते है। 

यहाँ ऊपर दिए गए कोष्ठक में देखिए। इस व्यक्ति के संचित कर्मों में पाप और पुण्य दोनों ही है। परन्तु  उसके इस जन्म के प्रारब्ध कर्ममें कुछ ही पुण्य का भोग आया है। बाकि सब पाप ही भुगतने है। जबकि यदि उसके क्रियमाण कर्म देखे जाएं तो वे सभी अच्छे ही कर्म है। इसलिए हमको लगता है की यह व्यक्ति बहुत अच्छा, है फिरभी दुखी है। परन्तु उसके क्रियमाण कर्मोंमेंसे कुछ ही भाग ऐसा है जो उसे इस जन्ममें भुगतने को मिल रहा है। परन्तु रोज मंदिर में दर्शन करनेसे उसका जीवन कुछ तो सरल हो ही रहा है।  इसी प्रकार सुख भुगतने वाले पापियों के कर्म भी फल देते है।

इसी प्रकार कोई पापी मनुष्य बहुत सुख भोग रहा हो तो समझना कि वह अपने पुण्यों को क्षीण कर रहा है, और उसकी अधोगति निश्चित है।

इसके उपरांत भी बहुत लोग इस प्रकार प्रश्न पूछते रहते है...

क्या हम जीवनमें कुछ पापों के सामने कुछ अधिक पुण्य भी कर दें तो क्या हमारे पाप नाश होते है?

नही। नहीं होते। अब्राहमिक मजहब (इस्लाम, ईसाई इत्यादि) कर्म के सिद्धांतमें, और पुनर्जन्मन के सिद्धांतमें भी नहीं मानते है, इसलिए वे कहते है की जिस व्यक्ति के कुल पापों की राशि से अधिक पुण्य होते है वे जन्नत में जाते है, नहीं तो जहन्नुम में जाते है। अर्थात यदि पांच लाख पाप किए है, और पांच लाख से अधिक एक पुण्य किया है तो वो व्यक्ति जन्नत में ही जाएगा। 

परन्तु हमारे शास्त्र इस विषयमें स्पष्ट है। पाप और पुण्य दोनों ही अलग अलग भुगतने पड़ेंगे।  यदि ९९ पुण्य है और मात्र एक ही पाप है तो भी वह एक पाप तो भुगतना ही पड़ेगा।  इन पापों को भुगतने के लिए हमें अलग अलग योनियों में जन्म मिलता है। 

क्या भगवान के सामने पश्चाताप (confession) कर लेने से पापों का नाश हो जाता है?

अब्राहमिक धर्मों की यह विचारधारा बहुत विचित्र है कि यदि आप अपने अपराधों के लिए भगवान के सामने पश्चाताप कर लें, तो आपके पाप नष्ट हो जाएँगे! यानी, चाहे जितने भी पाप करते रहो, लेकिन रोज़ मंदिर जाकर पश्चाताप कर लो, तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा। इससे अधिक नीच विचारधारा नहीं हो सकती।

हमारे धर्म में कहा गया है कि...

"अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
न भुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।।"
अर्थात: मनुष्य को अपने किए हुए शुभ और अशुभ कर्मों का फल निश्चित रूप से भोगना पड़ता है। जिस कर्म का फल भोगा न जाए, वह कर्म लाखों-करोड़ों कल्प (कालचक्र) बीत जाने के बाद भी नष्ट नहीं होता।

इसलिए कर्म का फल भोगने से ही छुटकारा है।
तो फिर प्रश्न उठता है कि क्या पश्चाताप करने का कोई लाभ नहीं है? नहीं, ऐसा भी नहीं है। पश्चाताप करने से मन शुद्ध होता है और हम ऐसे कर्मों को दोबारा करने से बचते हैं। साथ ही, भगवान के सामने पश्चाताप करने से भगवान हमें भविष्य में ऐसी गलतियाँ करने से रोकते हैं और अच्छी प्रेरणा देते हैं। लेकिन जो कर्म हो चुका है, उसके फल को भोगने में भगवान भी बाधा नहीं डालते।
--------------------------------------------------------------------------------------------

अब हम इस "कर्म सिद्धांत शृंखला" में आगे देखेंगे कि हमारे किए हुए कर्मों की गति कैसी होती है।

हम भाग २ में देखेंगे कि

  • क्या स्वर्ग नरक जैसा कुछ होता है?
  • क्या गरुड़ पुराण में लिखी सभी यातनाएँ वास्तव में होती हैं?
  • क्या ८४ लाख योनियों वाली बात सच्ची है?
  • क्या मनुष्य के सिवाय किसी अन्य योनि में कर्म का दोष नहीं लगता?
  • मनुष्यों के भूत-प्रेत बनते हैं, तो पशुओं के भूत-प्रेत क्यों नहीं बनते?

पढ़ें भाग २ यहाँ - कर्मसिद्धांत - भाग २ - क्या स्वर्ग-नरक जैसा कुछ होता है? गरुड़ पुराण में वर्णित यातनाएँ क्या सच्ची हैं?

-----------------------------------------------------------------------------------------

इस विषय से संलग्न एक और लेख मैंने पहलेसे लिखा हुआ है। पढ़नेके लिए इस लिंक पर क्लिक करें -  क्या "जिन्दगि ना मिलेगि दोबारा" ऐसा सोचना सही है?

Comments

Recent Posts

Popular posts from this blog

जवाहरलाल नेहरु के 26 गुनाह - 26 Crimes of Jawaharlal Nehru

रावण की असली लंका कहाँ है? श्रीलंका या सुमात्रा?