वेद मानवनिर्मित नहीं, अपौरुषेय और नित्य हैं: एक तार्किक विवेचन
ऐसे बहुतसे हिन्दू विचारक है जो की इस बातसे बहुत भ्रमित रहते है की वास्तवमें हिन्दू है कौन? और कौन हिन्दू नहीं है? ऐसे तथाकथित विचारकोंने कभी हिन्दू शास्त्रोंका गंभीरतासे अभ्यास नहीं किया है. यदि किया होता तो वे जानते की हिन्दू वही है जो वेदों को सर्वोच्च, सार्वभौम, दिव्य और अपौरुषेय मानते है। जो ऐसा नहीं मानते, वे हिन्दू हैं ही नहीं। पौरुषेय का अर्थ होता है जिसको किसी पुरुषने -अर्थात मनुष्यने - बनाया हो. वेद अपौरुषेय है. और वेदों के परिपेक्ष्यमें पुरुषका अर्थ केवल मनुष्य ही नहीं, कोई भी जीवात्मा, अर्थात देवता भी होता है. इसलिए अपौरुषेय का अर्थ है जिसे किसे देवताने भी नहीं बनाया, अर्थात वे स्वयंभू है। शास्त्रों के अनुसार सृष्टि के उदय के साथ ही, अर्थात भ्रह्मा के साथ ही, वेदों का उदय होता है, और लय के साथ उनका लय हो जाता है. इस बिच, सृष्टि के प्रारम्भमें ऋषिगण वेदों के मन्त्रों का दर्शन करते है और उनको संकलित करते है। इसलिए उन्हें मन्त्रद्रष्टा कहा जाता है। अब ये तो हो गई परंपरागत विचारों की बात. पर इस विचारको चुनौती देने वाले तथाकथित हिन्दू विचारक भी है। उनका कहना है ...