तारकासुर - एक समुचित और प्रासंगिक दृष्टिकोण

शास्त्रों का नियमित अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है। जो ऐसा करते है उन सबका यह अनुभव रहा है की जब जब वे एक ही ग्रन्थ बार बार पढ़ते है तो हर बार कोई न कोई ऐसी नई बात सामने आ जाती है की आपके ज्ञान के चक्षु अचानक ही खुल जाते है, और आपका इस जगत को देखनेका दृष्टिकोण बदल जाता है। 

माता वरांगी और दैत्य वज्रांग के पुत्र, तारकासुर की कथा वैसे तो प्रचलित और बहुविदित है, परन्तु शिवपुराण पढ़ते पढ़ते आज एक अलग ही दृष्टिकोण मिल गया। 

तारकासुर एक अत्यंत बलशाली दैत्य था जिसका एक ही ध्येय था, देवताओं को परास्त करना! असुर वैसे तो देवताओंसे कभी जित नहीं पाते है, इसलिए उनको अत्यधिक कठोर तपस्चर्या करके देवताओं से भी बड़ी शक्तियोंसे, अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, शिव इत्यादि ईश्वरसे वरदान प्राप्त करने पड़ते है। परन्तु असुर परिश्रम करनेसे कभी नहीं चूकते है। अत्यंत कठोर से कठोर तपस्या करके तारकासुरने भगवान् ब्रह्माजी से यह वर प्राप्त कर लिए की वो त्रिलोकीमें सबसे अधिक बलशाली हो जाए और उसकी मृत्यु केवल शिवजी के वीर्य से उत्पन्न हुए पुत्र से ही सके। ऐसा वर उसने इसलिए माँगा क्योंकि माता सती के दक्षयज्ञमें शरीर त्याग देनेके उपरांत शिव निर्मोही होकर  तपस्यामें लीन हो थे। वे और कोई स्त्री को स्वीकार करनेवाले नहीं थे। इसलिए तारकासुर को यह विश्वास था की न शिव का पुत्र होगा और न उसका वध होगा। 

यह वर प्राप्त कर तारकासुर उन्मत्त हो जाता है। त्रिलोक को विजय करके वो स्वर्गमें निवास करने लगता है। इंद्र और अन्य सभी देवता अब उसके दास है। इंद्र अपना ऐरावत उसे दे देता है, कुबेर अपना धनकोष दे देता है, ऋषिगण उसको कामधेनु और कल्पवृक्ष दे देते है, समुद्र सारे रत्न दे देते है, वरुणदेव को अपना दास बनाकर मनमानी वृष्टि करवाता है, सारी अप्सराएं तारकासुरको ही समर्पित हो गई। अर्थात किसी देवता के पास कोई वैभव व् शक्ति रहती नहीं है। पृथ्वी और मनुष्यजाति का सञ्चालन भी देवता तारकासुर को ही सौंप देते है। सारे देवता शक्तिहीन होकर मनुष्योंकी भांति ही तारकासुर की सेवा, पूजा, अर्चना करने लगते है। 

अब उपरोक्त वृतांत पढ़कर आपको क्या लगा? यही सोचे ना, की तारकासुर के पास पूरी पृथ्वीका सञ्चालन आ गया तो अब तो वो मनुष्योंको अत्यंत ही दुख देगा, प्रताड़ित करेगा? मैंने भी यही सोचा था। और अधिकतर कथावाचक ऐसा ही कहते है। टीवी सीरियल की तो क्या बात ही करें! परन्तु शिवपुराणमें हुआ इससे ठीक उल्टा! तारकासुर पृथ्वी को बहुत ही अच्छे से संचालित करने लगा। मनुष्यों के लिए सुखसुविधाके अम्बार लग गए। पृथ्वी तारकासुरके डरसे बिना किसी प्रयत्नके ही धन धान्य उपजाने लगी। सूर्य मनुष्यों के लिए कोमल हो गए, वह अब न तो अत्यधिक ताप देते थे, न ही कम ताप देते थे। चन्द्रमाने अपना प्रकाश इतना बढ़ा दिया की रातको भी प्रकाश होने लगा। सारी मनुष्यजाति अत्यंत सुखी और वैभवशाली जीवन जीने लगी। 

अब यहांपर प्रश्न यह होता है की जब तारकासुर सबकुछ ठीक ही चला रहा था, तो फिर देवताओंका उद्धार करनेके लिए, और तारकासुर का वध करनेके लिए ब्रह्मा, शिव आदि ईश्वरने यत्न क्यों किया?

अब पौराणिक कथासे थोड़ा दूर हटकर हम हमारे आजके जीवनको देखते है। क्या तारकासुरने मनुष्यों के लिए जो व्यवस्था बनाई थी वो आज हमको भी उपलब्ध नहीं है? क्या हमारे आसपास, हमारे जीवनको सरल बनानेके लिए अनेकानेक सुविधाएं उपलब्ध नहीं है? क्या अधिकतर लोग अपना अन्न स्वयं उगाते है? क्या हमें चन्द्रमाके प्रकाशकी कोई आवश्यकता है? क्या हम रातमें भी उजाला करके नहीं बैठते है? यदि सूर्य बहुत तप्त हो जाए तो हमारे पास AC का विकल्प नहीं है? आज कृत्रिम वृष्टि करनेकी तकनीक भी उपलब्ध हो गई है। आज हमसब वे सभी सुख भोग रहे है जो तारकासुरने मनुष्यजाति को प्रदान किए थे। 

परंतु तारकासुरने बदलेमें मनुष्यों से क्या छीन लिया था? उसने मनुष्यों से पूजापाठ, यज्ञ हवन, ईश्वर अर्चन छीन लिए थे। मनुष्योंके सारे अर्चनका भोग केवल स्वयं तारकासुर ही प्राप्त कर रहा था। देवता अपने अधिकारोंसे निष्काषित हो चुके थे। मनुष्यगण कोई पूजन अर्चन करे भी, तो उसका सारा भोग तारकासुरको ही प्राप्त होता था। इसलिए मनुष्योंकी न तो कोई आध्यात्मिक उन्नति होती थी, और न ही मोक्ष होता था। कर्मफल भी तारकासुरके अनुसार ही मिलता था। अर्थात, सभी मनुष्योंकी आत्माको तारकासुरने ग्रास लिया था। यदि इस परिस्थितिको बदला न जाए तो मनुष्यजाति चिरकालके लिए तारकासुरकी बनाई हुई मायामें ही फंसी रहती। यही परिस्थिति रावणकी लंकाकी भी थी। लंकामें अत्यधिक वैभव था। भौतिक रूपसे लोग अत्यंत सुखी थे। परंतु उनकी प्रजा राक्षस बन चुकी थी। रावण किसीको पूजा पाठ, यज्ञ याग, जप तप, दान इत्यादि करने नहीं दे रहा था। 

मनुष्यकी आत्मा वास्तवमें मुक्ति चाहती है। और मुक्तिका मार्ग केवल एक ही है, ईश्वरके साथ एकत्व। ईश्वरने जब ये मायामयी सृष्टिका सर्जन किया तो इससे बहार निकालनेके भी मार्ग बनाए। वे मार्ग है देवताओं का पूजन अर्चन, यज्ञ हवन, शास्त्रोंका पठन, ईश्वर की तप साधना। परन्तु यह सब करनेसे तारकासुर मनुष्यों को रोक रहा था। आश्चर्यकी बात यह है की यही सब उपाय करके तारकासुर स्वयं इतना बलशाली बना था। रावण भी महान विद्वान् था, महान तपस्वी था, चारों वेदों का ज्ञाता था, यज्ञ हवन, तप साधना इत्यादि करता था। हिरण्यकश्यपु और अन्य सभी असुर यही करते थे। यहांतक की, वरदान मिलजानेके उपरांत भी वे सब यह सत्कर्म करनेसे चूकते नहीं थे। पर वे दूसरों को यह सब कल्याणके मार्ग करनेसे रोकते थे, ताकि इन सब सत्कर्मोंका फल केवल वह ही ले पाए, दूसरे केवल उसके दास बने रहें। 

तो फिरसे हम आपने आजके जीवनको देखते है। आजका हमारा वैभवपूर्ण जीवन अवश्य ही कलि राक्षसके द्वारा बनाई गई मायाका ही परिणाम है। असुर कली यही चाहता है की हम सब हमारे ही बनाए हुए उपकरणोंके दास बनकर जीवनके विचित्र प्रपंचोंमें उलझे रहें और अपनी मुक्तिका मार्ग न ढूंढे। देवता और ईश्वर चाहते है की हम उनका अर्चन करें, ताकि वे अपने उत्तम फल हमको प्रदान कर पाएं, पर हम है की इस मायावी जीवनसे ऊपर उठना ही नहीं चाहते है। 

और क्या हम इतना सुविधापूर्ण जीवन प्राप्त करभी सुखी हैं? जी नहीं। हम तो फिर भी कलि दानवके दास होकर दुखी ही हो रहे है। 

इसीलिए ईश्वरने तारकासुरकी अपेक्षा देवताओं की सहायता की। अंतमें कामदेवकी सहायतासे देवता शिवजीका ध्यान भंग करते है। शिवजी इससे क्रोधित होकर कामदेवको भस्म करते है। फिर देवताओं की प्रार्थना सुनकर शिवजी माता पार्वतीको अपनी पूर्वपत्नी देवी सतीका ही पुनरावतार जानकार अपनी पत्नीके रूपमें स्वीकार करते है। देवताओंकी ही प्रार्थनासे शिवजी कामदेवको कुछ अलग प्रकारसे पुनर्जीवित करते है। फिर शिवजी के वीर्य से कुमार कार्तिकेयका जन्म होता है, और फिर भगवन कार्तिकेय तारकासुरका वध करते है। 

तो आज हमें यह सोचना है की क्या हम लाखों जन्मजन्मांतर तक असुरोंकी इसी मायाके दास बनकर जीवन मरणका चक्कर काटते काटते, भगवन कार्तिकेय समकक्ष किसी तारणहारकी दुखमय प्रतीक्षा करते रहेंगे, या फिर कुछ अपने प्रयत्न करके स्वयंका उद्धार करनेके उपाय करेंगे?

हर हर महादेव 🙏

ॐ नमः शिवाय 🙏 

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