भारतीय शिक्षण प्रणालीका इतिहास और उसका अंग्रेजों द्वारा किया गया निकंदन - भाग 7
भाग 7
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अंग्रेजो द्वरा हिन्दुओं की संस्कृति और
परम्पराओं का पर्याप्त रूपसे विकृतीकरण हो रहा था. अब केवल दूसरी विदेशी सभ्यताओं
का महिमामंडन करना शेष रह गया था. ऐसा करनेका मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं के मनमें
हिंदुत्व के प्रति घृणा उत्पन्न करनेका था. तो देखते है की अंग्रेजोंने भारतमे
व्याप्त विविध विदेशी पंथो को कैसे प्रोत्साहन दिया.
इस्लाम
अंग्रेजों की सामान्य रूपसे मुस्लिम नवाबों से
बहोत बनती थी. उत्तर भारत में, खास करके मैदानी विस्तार में "गंगा-जमनी तहज़ीब" के नाम पर मुस्लिम जमीनदारों,
नवाबों, इतिहासकारों, साहित्यकारों और कविओं को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया गया. आर्थिक
रूपसे उच्च वर्ग का एक संकुल बनाया गया जो की या तो अंग्रेजी या तो उर्दू बोलता
था, केवल मुस्लिम साशकों का "स्वर्णिम इतिहास" पढता था (और लिख लिख कर
सबको पढ़ता था), हिंदी कविताओं के स्थान पर उर्दू शेरो-शायरी में रूचि रखता था.
केवल अंग्रेजी पढ़े हुए और किसी भी भारतीय परम्पराओं से घृणा कर रहे हिंन्दु
"बौधिक वर्ग" को ही उस संकुल में प्रवेश मिलता था. एक धनिक मुस्लिम होना
एक "बौधिक व्यक्ति" होनेका प्रमाणपत्र हुआ करता था. यही कारण था की
मुंशी प्रेमचंद (जीनका वास्तविक नाम "धनपत राय श्रीवास्तव" था) ने अपनी
लिखाई का आरंभ "नवाब राय" के नाम से किया!
इस संकुल के अधिकांश सभ्य धनिक मुस्लिम थे
(जमींदार और नवाब) जिन्होंने अपने स्वार्थ हेतु पाकिस्तान का निर्माण किया और
दरिद्र, अनपढ़ और अबोध मुस्लिमों को भारत में ही पीछे छोड़ दिया. परंतु अंग्रेजों
द्वारा पाल पोस कर बड़ा किये गए इस संकुल ने एक ऐसी धरोहर का निर्माण किया जिसके
उत्तराधिकारी आज भी वहीँ रह रहे है और अपने वैचारिक पूर्वजों का कार्य आगे बढ़ा रहे
है. मैं दिल्ली और उसके आसपास के विस्तारों की बात कर रहा हु. आज इस संकुलमें से
अधिकांश हिन्दू ही है जिन्हें भारत, हिंदुत्व और राष्ट्रीयता से कोई सम्बन्ध नहीं
है, और फिर भी यह लोग प्रशाकीय व्यवस्था में अत्यंत ही उच्च स्थान पर बैठे हुए है.
यह वाही लोग है जो भारत को पूर्ण रूपसे India बनाने पर तुले हुए है.
टिपण्णी: सामान्य रूपसे ऐसा माना जाता है की अंग्रेजोने आकर मुस्लिम सशकों से राज्य लिए
और इसलिए उन्होंने हिन्दुओको इस्लामीकरण से बचाया. किन्तु यह वास्तविकता से एकदम
विपरीत बात है. अंग्रेज जब आये तब तक मुस्लिम साशक अधिकांश रूपसे हिन्दुओं से हार
चुके थे और भारतमे से इस्लाम को चारो ओरसे अस्वीकृति मिल रही थी. परंतु अंग्रेजोने
आकर “शत्रु-का-शत्रु मित्र” वाली निति से हिंदुत्व को दबाकर इस्लाम को प्रोत्साहन
दिया. जाते जाते भी वे मुस्लिम्मों की सहायता से पाकिस्तान नामक शूल भारतकी बगलमे
भोंकते गए.
पारसी
अंग्रेजों ने बड़ी ही चतुराई से भारत के
स्वतत्रता के अभियान को अपने अंकुश में करने के लिए पारसिओं का उपयोग किया. 1857 के विप्लव के बाद इस
स्वतंत्रता संग्राम को नियंत्रित करना आवश्यक था. इसलिए 1885 में कोंग्रेस पार्टी
की स्थापना की गई. इस पार्टी के संस्थापक तिन लोग थे. एक थे अंग्रेज जिनका नाम था “एलेन ओक्तावियान हुम”, दुसरे दो पारसी थे
जिनके नाम थे दादाभाई नवरोजी और दिनशो वाचा. यह दोनों पारसी विलायती (ब्रिटिश)
शिक्षण प्राप्त किये हुए थे और प्रत्येक अर्थ में पुरे अंग्रेज ही थे. पश्चिमी
भारत में परसिओं को अत्यधिक महत्त्व दिया गया और उन्हें व्यापर करने के लिए
सुवधाएँ उपलब्ध करवाई गई. इसके उपरांत अंग्रेजी साहित्य में जब भी भारत का उल्लेख
आता था तब परसिओं का महिमा मंडन और हिन्दुओं की हीनता को उजागर किया जाता था.
उदहारण के लिए पढ़िए जुले वर्न द्वारा लिखित "Around The World In 80 Days". पारसिओं को हिन्दुओं के
लिए एक आदर्श के रूपमें प्रस्थापित करनेका प्रयास पश्चिमी साहित्यकारों द्वारा
किया जा रहा था. आज भी यदि हम पुराने मुंबईके धनिकों और अंग्रेजों के अनुरूप जीवन
जी रहे लोगोंका निरिक्षण करें तो उसमे अधिकांश पारसी ही मिलेंगे.
अंग्रेजों को परसिओं से इतना प्रेम क्यों था?
यह विषय एक संशोधनात्मक विषय है. और यदि किसीने इसपर संशोधन कर लिया है तो वह इस
लेखक के ध्यानमे नहीं आया है. किन्तु मेरा यह अनुमान है की पारसिओं के मूल भौगोलिक
(ईरान) और आनुवांशिक रूपसे अंग्रेजोंके निकट होनेके कारण उनका यह पक्षपात था.
पश्चिमी साहित्यकारोंकी लिखाईमें यह द्रष्टिकोण स्पष्ट रूपसे उजागर होता है.
इस्लाम और पारसी सभ्यता का महिमामंडन देखने के
बाद अब हम देखेंगे अंग्रेजों ने कैसे इसाई मजहब को प्रोत्साहन दिया... इस श्रेणी
के अंतिम भाग, भाग 8 में.
(ब्रिटिशरों द्वारा ही प्रस्थापित कोंग्रेस पार्टी ब्रिटिशरों के विरुद्ध चल रहे स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभाले हुई थी. कोंग्रेस में जितने भी मुलभुत रूपसे भारतीय नेता आए उन सब को अंग्रेजों ने मार दिया. उदहारण के लिए लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक, सुभाषचंद्र बोज़. कोंग्रेस का जो नेता अंग्रेजों के कहने पर चलता था वही टिक पाता था. स्वतंत्रता तक सरदार पटेल नेहरु और गाँधी की छायाँ में रहे इस लिए बच गए. यह भी ध्यान देने वाली बात है की कोंग्रेस के जितने भी बड़े नेता हुए वे सब विलायत में ही पढ़े हुए थे! गाँधीजी भी! उनका अहिंसक आन्दोलन हिंसक क्रन्तिकारीयों को "अवैध" घोषित करने में कारगर सिद्ध हुआ! पहले और दुसरे विश्वयुद्ध में फसें अंग्रेजों को यह अत्यंत ही लाभप्रद सिद्ध हुआ.)
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