जवाहरलाल नेहरु के 26 गुनाह - 26 Crimes of Jawaharlal Nehru

मित्रों, मैं कोई नेहरु विशेषज्ञ नहीं हु. जो मैं लिखने जा रहा हु वो मेरा सिमित अभ्यास ही है. फिरभी यह सूचि इतनी लम्बी होने जा रही है की आप भी सोचते रह जाओगे की यदि इस विषय पर किसी विशेषज्ञ ने खोजपत्र लिखा हो तो वो कितना बड़ा होगा.

क्या आप जानते है की 14 नवम्बर को जवाहरलाल नेहरु की यादमें बाल दिवस के रूपमें क्यों मनाया जाता है? ऐसा क्या विशेष नेहरु ने बच्चों के लिए कर दिया था की बाल दिवस उसके नाम चला गया?

क्या आप जानते है की देश के "चाचा" की उपाधि नेहरु को क्यों दी गई?

मैं भी नहीं जानता 😋

चलो, अब अधिक समय ना लेते हुए मैं सीधा मुद्दों पर आता हू...

हमारे देशको स्वतंत्र होनेके बाद एक दूरदर्शी और राष्ट्रवादी नेता की आवश्यकता थी. परन्तु मिला हमें उससे ठीक उल्टा ही. यही कारण है की आज हमारे देश की लगभग सारी समस्याओं के साथ हमारे पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु जुड़े हुए है.

नेहरु की भूलों को "भूल" कहना वह "भूल" शब्द का अपमान है. उन्हें कमसे कम "अपराध" कहा जा सकता है, और यदि "देशद्रोह" कहा जाए तो भी बहोत लोग इससे सहमत होंगे. नेहरु के अपराधों का काला चिठ्ठा जितना मैं जानता हु उतना यहां प्रस्तुत करता हु और बाकी पाठकों पर छोड़ता हु...

भुक्षेत्रिय अपराध

1. कश्मीर - स्वतंत्रता के बाद भारत देश के एकीकरण का भार गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के ऊपर आया. नेहरु बहोत सारे राज्यों को समजानेका काम अपने आप करना चाहते थे परन्तु पटेल ने उन्हें साफ़ ना बोल दिया. फिरभी नेहरु अपनी हठ पर अड़े रहे और कमसे कम कश्मीर राज्य वे ही संभालेंगे ऐसा उन्होंने निर्णय दे दिया. परिणामतः पटेल के भागमें आये 555 राज्य देशमें विलीन हो गए और एक कश्मीर के लिए हम आज भी लड़ रहे है.

जब पाकिस्तानी सेना कश्मीर में आ चुकी थी (जो आज का POK है) तब भी नेहरु भारतीय सेना वहां भेजना नहीं चाहते थे. उस समय सरदार पटेल ने बड़ी ही द्रढ़ता के साथ नेहरु को सेना के लिए आदेश देनेको विवश किया, तब जाकर आज हमारे पास कश्मीर का आधा हिस्सा है.

2. नेपाल - स्वतंत्रता के बाद 1952 में नेपाल भारतमें विलीन होना चाह रहा था. परंतु नेहरु ने साफ़ ना बोल दिया. नेहरु ने आगे से चलके नेपाल को UN में एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया. इसके ऊपर रशिया ने वीटो किया और उसे एक स्वतंत्र राष्ट्र मानने से नकार दिया. फिरभी नेहरु टस से मस नहीं हुए और अंतमें नेपाल को भारत से अलग एक स्वतंत्र देश बनाकर ही छोड़ा.

3. कोको आईलैड - 1950 में नेहरू ने भारत का ' कोको द्वीप समुह' बर्मा को भेंट दे दिया, जो कोलकाता से 900 KM दुर समंदर मे है ।

बाद मे बर्मा ने कोको द्वीप समुह चीन को दे दिया, जहाँ से आज चिन द्वारा भारत पर सैन्य निगरानी रखी जाती है।

4. काबू तराई - नेहरू ने 13 Jan 1954 को भारत के मनिपुर प्रांत की काबू तराई बर्मा को दे दी. काबू व्हेली लगभग 11000 स्के. किमी है.

अत्यंत ही सुंदर और मनमोहक यह तराई का कुछ हिस्सा बर्मा ने चिन को दे रखा है जहां से चिन भारत पर सैन्य निगरानी कर रहा हैं ।

5. तिब्बत और लदाख - 1962 में चीन अरुणाचल, सिक्किम, असम, लदाख तक घुस गया फिरभी नेहरु ने कुछ भी नहीं किया. जब उन्हें भारतीय सेना को आदेश देने के लिए विवश होना पड़ा तब भी सेना के ऐसे यूनिट को भेजा जो की इस विस्तार में लड़ने के लिए बना ही नहीं था, जबकि जो सैनिक वहा पहलेसे थे और लड़ सकते थे उन्हें लड़ने से स्पष्ट नकार दिया गया. यदि इतिहास में कोई ऐसी पुस्तक लिखी जाए जिसमें यह बताया जाए की युद्ध के समय क्या क्या *नहीं* करना चाहिए, तो उसके लिए 1962 का युद्ध सर्वोत्तम विषय रहेगा. सैन्य विशेषज्ञ इस बात पर पूर्णतः सहमत है की हम चीन के विरुद्ध युद्ध हारे उसका एकमात्र कारण नेहरु थे. और उन्हीके कारण हम जम्मू-कश्मीर से भी बड़ा भू-भाग खो बैठे.

भूराजनैतिक अपराध

6. UNSC की स्थायी सदस्त्यता - 1953 में अमेरिका भारत को UN का स्थायी सदस्य बनाने के लिए प्रस्ताव लाया था. इसके साथ ही भारत को वीटो का पॉवर भी मिल जाता. परंतु नेहरु ने यह कहकर बार बार नकार दिया की चीन को छोड़कर भारत वीटो पॉवर नहीं ले सकता. UN सिक्यूरिटी कौंसिल में केवल एक ही स्थान रिक्त था जो की अंतमें चीन को मिल गया.

आज भारत वर्षो से UN की स्थायी सदस्यता के लिए परिश्रम कर रहा है परंतु चीन हर बार वीटो का उपयोग करके हमें रोक रहा हा. इतना ही नहीं, पाकिस्तान के विरुद्ध भारत के किसीभी प्रस्ताव के विरुद्ध चीन वीटो का उपयोग करके निष्फल बना देता है. क्या यह "चाचा" नेहरु की भूल थी? या अपराध था? या देशद्रोह था?

7. चीन के साथ पंचशील समजौता - नेहरु ने 1954 में केवल दोस्ती के दावे से पंचशील समजौते के अंतर्गत तिब्बत को चीन का भाग मान लिया. 1962 में चीन इसी मार्ग से फिर भारतमें घुसा और हमारा क्षेत्र हस्तगत कर लिया. और जब देश में प्रश्न उठने लगा तब नेहरूने कहा की जो भूमि हम हार गए है वह किसी काम की नहीं है. वहाँपर घांस का एक तिनका भी नहीं उगता.

पंचशील सिद्धांतों के अंतर्गत शीत युद्ध के समय नेहरु ने अम्रीका और रूस, इन दोनोंमें से किसी भी ध्रुव को समर्थन देनेसे नकार दिया और जीन देशों का कोई वर्तमान और भविष्य नहीं था ऐसे देशों के साथ मिलकर अपना एक तीसरा ध्रुव खड़ा किया. अंततः देश प्रत्येक आयाम में पीछे रह गया.

8. अपूर्णकालीन सेना - नेहरु ऐसा मानते थे के एक "शांति वादी" भारत देश को सेना की कोई आवश्यकता नहीं है. इसलिए हमें कोई पूर्णकालीन सेना की आवश्यकता नहीं है. इस विचार का देशके चिंतकों ने बहोत विरोध किया इसलिए उनका यह विचार कार्यान्वित तो नहीं हो पाया परंतु उनकी यह सोच के कारण भारतीय सैन्य शक्ति और उद्योग विश्व से पिछड़े रह गए.

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अपराध 

9. सुभाष बाबू की हत्या - यह बात तो सर्वविदित है की नेहरु को सुभाष बाबू से बहोत चिड थी. निष्पक्ष इतिहासकारों का यही मत है की सुभाष बाबु को पकडवानेमें और फिर उनकी हत्या करवानेमें नेहरु का ही हठ है. नेहरु की सुभाष बाबू से चिड के लिए बहोत कुछ लिखा जा सकता है परंतु विषय मर्यादा को धनमें रखते हुए यहां नहीं लिख रहा हु.

10. चंद्रशेखर आज़ाद की हत्या - चंद्रशेखर आज़ाद जबतक जीवित रहे तबतक अंग्रेजों की पकड़ में ना आ सके. उनका पता अंग्रेज कभी लगा नहीं सकते थे. परंतु जिस दिन वे अंग्रेजो द्वारा घिरे गए उस दिन वे कुछ ही क्षण पहले नेहरु के घर से निकले थे. वे नेहरु से मिलने इसलिए गए थे क्योंकि वे चाहते थे की नेहरु भगतसिंग, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा माफ़ करने के लिए अंग्रेजो से कहे. इससे नेहरु (और गाँधी ने भी) साफ़ नकार दिया था. और उनके घर से निकलते ही कुछ ही दूर अंग्रेजो ने उन्हें आज़ाद को घेर लिया.

11. सरदार पटेल से घृणा - आज़ाद और सुभाष बाबु तो फिरभी कोंग्रेसी नहीं थे. परंतु सरदार पटेल तो उनकी अपनी ही पार्टी के नेता थे! नेहरु की सरदार के प्रति घृणा सर्वविदित है. इसके लिए बहोत उदहारण दिए जा सकते है परंतु अभी एक ही उदहारण दूंगा.

सरदार पटेल ने जीवनभर कोंग्रेस पार्टी का हिसाब किताब बड़ी ही प्रमाणिकता से रखा. जब वे मरणशैया पर थे तब उन्होंने अपनी बेटी को कहा की उनकी मृत्यु के बाद पार्टी के सारे पैसे नेहरु को दे दे. सरदार की बेटी और उनका परिवार बहोत दरिद्र था. उनके पास कभी कभी खानेके पैसे भी नहीं होते थे. फिरभी सरदार की मृत्यु के बाद उनकी बेटी पैसो की थैली लेकर नेहरु के पास गई और उन्हें 4 लाख रुपये (उस समय ये बहोत बहोत
बड़ी रकम होती थी) दे दिए. बेटी ने थोड़े समय नेहरु की प्रतीक्षा की की वो उसका थोडा हालचाल भी पूछ ले. परन्तु नेहरु ने उन्हें खड़े खड़े ही जानेको कह दिया और सांत्वना के दो शब्द भी नहीं कहे. उनकी बेटी का देहांत अति दरिद्र परिस्थितिमें बिना किसी डॉक्टरी इलाज के हो गया. और नेहरु ने यह 4 लाख रुपये पार्टी में कभी जमा नहीं करवाए. बनस्पत नेहरु की बेटी आगे जाकर देशकी प्रधानमंत्री बनी.

12. अन्य स्वतंत्र वीरों की अवगणना - नेहरु ने स्वतंत्रता के बाद उनके और गाँधी के अतिरिक्त किसीभी स्वतंत्रता वीर को कोई सन्मान नहीं दिलवाया. वह इसलिए की उनका अपना स्वतंत्रता के संग्राम में कोई भी विशेष योगदान नहीं था. इसलिए यदि औरों का योगदान प्रजा जान लेती तो उनकी कोई महत्ता नहीं रह पाती.

13. नेहरु की रंगरलियाँ - नेहरु रंगीले स्वाभाव के थे. देश जब बड़ी बड़ी समस्याओं से जुज रहा था तब भी वे लेडी माउंटबेटन के साथ रंगरलियाँ मना रहे थे. इसके अतिरिक्त उनके पास अनेक और स्त्री मित्र थी जिनमें वे सतत रत रहते थे. अपनी पत्नी कमला नेहरु उन्हें तनिक भी पसंद थी. बीमारी का बहाना करके कमलाजी को नेहरु ने जर्मनी इलाज के लिए भेज दिया था. 10 साल तक कमलाजी राह तकती रही की उनके पति परमेश्वर उनका हालचाल पूछने आयेंगे परंतु उनकी मृत्यु तक वे नहीं गए. उनका दुःख सुभाष बाबु जानते थे इसलिए वे एक बार उनका हाल पूछने गए थे. शायद इसी कारण नेहरु सुभाष बाबू से चिड़ते थे.

राजनैतिक अपराध 

14. देश और देशवासियों के प्रति कोई लगाव नहीं - नेहरु का देशवासियों के साथ तनिक भी जुड़ाव नहीं था. उनकी पूरी निष्ठा अंग्रेजो के प्रति थी.

जब देश स्वतंत्र हुआ तब उनका पहला भाषण अंग्रेजी में था. क्या आप कल्पना कर सकते है की देश का प्रथम प्रधानमंत्री देश के नाम पहला सन्देश भेज रहा है और वो भी उस भाषा में जो की 99% देश नहीं समजता? और कौनसी भाषा? देश को आधीन बनाने वालों की भाषा? इतना ही नहीं, उनके प्रथम भाषण के कुछ प्रभावी अंश भी विश्व के अन्य नेताओं के भाषण से चोरी किए गए थे.

नेहरु के कपडे भी भारतमें नहीं धुलते थे. चार्टर प्लेन से नियमित रूपसे उनके कपडे लन्दन धुलने जाते थे. इसलिए क्योंकि भारतीय धोबी बहोत गंदे होते है.

विदेश से जो भी अतिथि आता था उन्हें वे साप और सपेरे के कार्यक्रम दिखाते थे, ना की भारत कैसे प्रगति कर रहा है.

भारत का बजेट सत्र शाम को 5 बजे से आरम्भ करनेका नियम रखा क्योंकि इंग्लैंड वाले तबतक उठ गए हो और वे अपनी नींद बिगाड़े बिना हमारा बजट सुन पाएं.

ऐसे तो अनेको उदहारण है....

15. असंवैधानिक रूपसे प्रधानमंत्री बनना - स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री निश्चित करने के लिए सारे 12 सभ्यों की कोंग्रेस समिति में से *प्रत्येक ने* सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट किया. परंतु नेहरु ने गाँधी से मिलकर सबको विवश किया की वे नेहरु को प्रधानमंत्री स्वीकार करें.

16. कश्मीर प्रश्न असंवैधानिक रूपसे उल्जा देना - अधिक गहराई में ना जाते हुए यह जान लीजिए की धारा 370 को बल देने वाली धारा 35A को नेहरु ने बिना संसद को बताए लागू कर दिया है, जो की सर्वथा असंवैधानिक है. धारा 370 लाने के लिए भी स्वयं आम्बेडकर का विरोध था परन्तु नेहरु ने उन्हें यह धारा डालने पर विवश कर दिया था. इसलिए आज हम जो भी कश्मीर की समस्या देख रहे है वह केवल और केवल नेहरु के कारण ही है.

17. स्वयं को ही भारत रत्न दे देना - नेहरु विश्व के एक मात्र ऐसे नेता होंगे जिन्होंने देश का सर्वोच्च पदक अपने आप को ही दे दिया. उन्होंने भारत रत्न अपने आप को ही दे देने पर इस पदक की समिति को विवश कर दिया. क्या आपने इससे बड़ा दंभी और ठरकी देखा है?

18. नेहरु एक असहिष्णु नेता - नेहरु एक अत्यंत ही असहिष्णु (Intolerant) नेता थे. वे अपने निर्णय सबपर थोपना पसंद करते थे. उनसे विरुद्ध विचार रखने वालों के लिए कोई स्थान नहीं था. किसी सभा में यदि किसी कार्यकर्त्ता से केवल माइक भी ठीक से नहीं सेट किया जाता था तो उसे इस छोटी सी बात के लिए थप्पड़ मार दिया करते थे.

आर्थिक अंधता 

19. अवसर चूकना - स्वतंत्रता के बाद पुरे विश्वमें औद्योगिकता की एक बहोत बड़ी क्रांति उठ कड़ी हुई थी. परन्तु नेहरु की आर्थिक अंधता ने देश को पीछे ही रख दिया. परिणाम स्वरुप जब विश्व 12% के वृद्धिदर से आगे बढ़ रहा था तब भारत देश 2% से भी कम वृद्धि कर रहा था और लोग भूखे मर रहे थे.

20. साम्यवादी विचारधारा - यह बात सब जानते है की नेहरु साम्यवादी विचारधारा रखते थे. उन्हें उद्योग और उद्योगपतियों से घृणा था. एकबार जब जमशेदजी टाटा ने उनसे कहा की उनकी नीतियों के कारण टाटा कंपनी मुनाफा नहीं कर रही है तब नेहरु ने कहा की उन्हें "मुनाफा" शब्द से घोर नफरत है.

यदि केवल उलटे काम करने वाला हमारा प्रथम प्रधानमंत्री नहीं होता तो भी आज हम आर्थिक रूपसे बहोत आगे होते.

हिन्दुओं के प्रति घृणा 

यदि मैं नेहरु का यह स्वाभाव पहले लिखता तो उसका इतना प्रभाव नहीं रहता. परन्तु अबतक आप सोच रहे होंगे की नेहरु ऐसे क्यों थे? यदि मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूँगा की वे ऐसे थे क्योंकि उन्हें हिन्दुओं के प्रति, भारतीयता के प्रति और भारतीय संस्कृति के प्रति घोर घृणा थी. कुछ उदहारण प्रस्तुत करता हु....

21. अपने हिन्दू होने से लज्जित - नेहरु ने एकबार प्रख्यात रूपसे कहा था की वे "शैक्षणिक रूपसे एक ब्रिटिश है, विचारधारा से एक आंतरराष्ट्रियवादी (Internationalist), सभ्यता से एक मुस्लिम है, और एक अकस्मात् के कारण वे हिन्दू है और वह अकस्मात् उनका जन्म है". जैसा की आपने देखा, उनके अपने परिचय में हिंदुत्व तो छोडो, केवल भारतीयता भी कही नहीं आती है. उनकी विचारधारा को देश और हिन्दू संस्कृति से
कोई लेना देना नहीं था.

एकबार उन्होंने यह भी कहा था की "आप मुझे चाहे गधा कह दो, परन्तु हिन्दू कभी मत कहना".

22. हिन्दू और मुस्लिम के प्रति नेहरु के विचार - जब किसीने नेहरु को पूछा की यदि सारे हिन्दू मुस्लमान हो जाएंगे तो? इसपर नेहरु ने कहा की इसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. इसपर किसी और ने यह पूछा की यदि सब मुस्लिम हिन्दू हो जाएं तो? इसपर उन्होंने तत्काल उत्तर दिया की ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे भारत की विविधता नष्ट हो जाएगी.

23. संघ पर प्रतिबंध - हिन्दुओं के लिए काम कर रहे एकमात्र संगठन "राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ" को नेहरु ने दो दो बार प्रतिबंधित कर दिया था. वह भी बिलकुल निराधार कारणों के अंतर्गत.

24. मौलाना को प्रथम शिक्षण मंत्री बनाना - नेहरु चाहते थे की देश का भविष्य हिंदुत्व ना सिख पाएं. इसलिए उन्होंने देश के सर्वप्रथम शिक्षण मंत्री मौलाना अब्दुल कलम आज़ाद को बनाया. आज हम जानते है की हम कैसा इतिहास पढ़ रहे है. इसका प्रारंभ इसी मौलाना ने किया था.

25. संविधान में हिन्दुओं को अन्याय - संविधान बनाते समय मुस्लिमों को अपना पर्सनल लॉ दिया गया, जबकि हिन्दुओं के बार बार मांगने पर भी उन्हें सेक्युलर संविधान दिया गया जिसमें हिन्दुओं के लिए कुछ भी नहीं था. था तो केवल अन्य सम्प्रदायों के लिए स्वयं सहन करना.

26. हिंदी भाषा को नष्ट करनेका प्रयास - नेहरु ने बड़े प्रमाण में हिंदी भाषा को नष्ट करनेका अभियान चलाया. उन्होंने बहोत बड़ी मात्रामे हिंदी में उर्दू और फ़ारसी शब्दों की जबरन मिलावट करवाई. कुछ हद तक यह प्रयास सफल भी हुए परंतु आगे चलते हिन्दू विचारकों ने इस प्रयास को वाही रोक दिया.

हमारे "राष्ट्रिय चाचा" नेहरु के विषयमें बहोत बहोत कुछ लिखा जा सकता है. ऊपर लिखे एक एक विषय में ही एक एक खोजपत्र लिखा जा सकता है. और जैसा की मैंने कहा, मैं तो कोई "नेहरु विशेषज्ञ" भी नहीं हु. जिन्होंने थोडा बहोत भी अभ्यास किया है वे नेहरु के प्रति अपार घृणा रखते है.

अब ऊपर लिखित सारी भूलों को "भूल" कहा जाए, या "अपराध" कहा जाए, या "देशद्रोह" कहा जाए यह निर्णय मैं पाठकों पर छोड़ता हु.

धन्यवाद __/\__

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