गणपति स्थापना, पूजन और विसर्जन क्यों करना और कैसे करना चाहिए?
Everything That You Want To Know About Ganpati Sthapna
गणपति देव का महात्म्य:
सनातन धर्म में प्रत्येक लौकिक और परलौकिक कार्यों के लिए किसी
न किसी “Specialist” देवता की व्यवस्था की गई है. तेजस प्राप्ति के लिए सूर्य, बल
व् ब्रम्हचर्य के लिए हनुमानजी, धन के लिए लक्ष्मी, विध्या के लिए सरस्वती, विनाश
के लिए भैरव, दुर्गा, काली इत्यादि
देवता उपलब्ध है. इसी प्रकार कार्यारंभ और विघ्न विनाश का “Department” गणपति देव के
आधीन है. रिध्धि और सिध्धि उनकी पत्नी है. रिध्धि का अर्थ है ऐसी समृद्धि जो की
संतोषदायी और सुखदायी हो. और सिध्धि का अर्थ है किसी भी कला एवं कौशल का हस्तगत
करना. तो स्वाभाविक रूपसे यह स्पष्ट हो जाता है की गणपति देव रिध्धि और सिध्धि को
प्राप्त करनेमें आनेवाली बाधाओं को नाश करते है.
जब एक साधक अथवा योगी अपनी साधना करता है तब सदैव उसे अपने
साध्य को प्राप्त करनेमें अनेक विघ्न उपस्थित होते है. उदहारण के लिए परमेश्वर प्राप्ति
की साधना करने वाले योगी जब अपनी साधना के बिचमें होता है तब उसे भ्रमित करने वाली
अनेक सिध्धियाँ प्राप्त होती है. यह सिध्धियाँ लुभावनी होती है जो साधक के काम,
क्रोध, लोभ इत्यादि को संतुष्ट करनेके साथ साथ उसे उत्तेजित करके उसे धूर्त व्
विलासी बना सकती है. यदि इस समय योगी अपने उद्देश्य से चलित होकर भोगी और विलासी
हो जाता है तो उसकी साधना अधूरी रह जाती है और उसका पतन होता है.
इसी प्रकार मन और इश्वर को जोड़ने वाले संगीत की साधना करता
हुआ साधक जब उसको मिल रही प्रसिध्धि और विलास की चकाचौंध में आकर अपने मार्ग से विचलित
हो जाता है तब उसकी साधना अधूरी रह जाती है, सिध्धि मिलती नहीं, और धन ऐसा मिलता
है जो शांति देने वाला नहीं होता, अर्थात रिध्धि और सिद्धि, दोनों ही नहीं मिलते.
समाज कल्याण का काम करने निकला एक नेता जब राजनीति की अटपटी
गलियोंमें उलजकर एक भोग-विलासी जंतु बन जाता है तो उसे भी आप एक पथभ्रष्ट साधक के
रूपमें ही देखें.
इस प्रकार जीवन का प्रत्येक उद्देश्यपूर्ण कार्य एक साधना
है. इन साधनाओं से हम विचलित न हो जाएं, और साधना के अंतमें रिध्धि व् सिध्धि की
प्राप्ति हो इसलिए किसीभी पूजा, कार्य या साधना के प्रारंभ में गणपति देव को
अग्रेसर रखा जाता है जो कार्यमें आने वाली बाधाओं का नाश करते है.
गणपति देव की स्थापना कैसे और क्यों करे?
सर्वप्रथम तो “स्थापना क्यों करें” यह समजना अत्यंत
ही महत्वपूर्ण है. किसीभी देवता की स्थापना दो प्रकारकी होती है, i) चल और ii)
अचल. अचल स्थापना सार्वजनिक मंदिर अथवा घरमें रहे मंदिर में की जाती है. यह मूर्ति
वहां सदैव रहने वाली है इसलिए उसमें प्राणों का आवाहन करके “प्राण प्रतिष्ठा” की जाती है. योग्य विधि और भावना के
साथ की गई इस प्रक्रिया के बाद उस मूर्ति में प्राण आ जाते है, और देवता उसमें साक्षात्
बिराजमान होते है. इसके बाद इस मूर्ति को न ही चलित किया जाता है, और न ही
विसर्जित किया जाता है. केवल खंडित होनेपर ही उस मूर्ति को “मृत” मानकर विसर्जित
किया जाता है और उसके स्थान पर नयी मूर्ति में प्राण प्रवाहित करके रखी जाती है.
हम गणेशोत्सवमें जिस गणपति देव की स्थापना करते है वो चल
स्थापना होती है. चल मूर्ति की स्थापना अस्थायी होती है. इसमें स्थापना के समय
अस्थायी रूपसे मूर्ति के अंदर देवता का आवाहन किया जाता है. अब जैसा मैंने पहले
कहा, गणपति देव की स्थापना (या अन्य किसीभी देवता की स्थापना) कोई निश्चित कार्य सिद्धि
के लिए की जाती है. इसलिए चल स्थापना करनेके लिए आपके पास कोई परमार्थिक उद्देश
होना आवश्यक है. जैसे एक डॉक्टर को किसी रोगी की चिकित्सा करने के लिए ही घर
बुलाया जाता है, अकारण नहीं बुलाया जाता, इसी प्रकार देवताओंका आवाहन भी अकारण नहीं
करना चाहिए. इसलिए स्थापन करनेसे पहले अपना उद्देश्य अथवा कोई मनोकामना अवश्य चून
लें.
अब मूर्ति की स्थापना करनेके लिए वैदिक विधि विधान अत्यंत
ही महत्वपूर्ण है. इस विधि के अंतर्गत मुर्ति में देवता का आवाहन किया जाता है जो
की पूर्णतः विधानोक्त और भावपूर्ण होना चाहिए. यह स्थापना किसी विद्वान् और शाश्त्र
के जानकार पंडित से ही करवाना उचित है. और स्थापना के समय भक्तिपूर्ण मनोभाव भी
अनिवार्य है.
पूजा विधि कैसे करे?
मुर्तिमें देवता का आवाहन करनेके पश्चात उस मुर्तिमें
साक्षात् देवता का दर्शन करना चाहिए. वैसे तो देवता और भगवान् रंग, रूप, आकार से पर
होते है. परंतु वे इतने दयालु होते है की भक्त उनको जिस स्वरुपमें देखना चाहता
है उसी स्वरूपमें वे ढल जाते है. इसलिए आपकी भावना के वश होकर देवता मुर्तिमें
बिराजमान हो जाते है. सामान्यतः मनुष्य देवताओं को भी कहीं न कहीं एक मनुष्य के रूपमें ही देखना पसंद
करता है, इसलिए मुर्तिमें बिराजमान होनेके बाद देवता का भी स्वागत, सत्कार, पूजा,
स्नान व् भोजन मनुष्य की ही भांति करता है. भक्त जितना भावनात्मक रूपसे सेवा करता
है, मूर्ति में स्थित देवता उतने ही समर्थ और सार्थक होते जाते है. इसलिए आवाहित देवता
की सेवा-पूजा अत्यंत ही भावपूर्ण रूपसे करें.
और एक बात. सदैव यह याद रखें की आपने देवता का स्थापन किसी विशेष कार्यसिध्धि के लिए किया हुआ है. इसलिए इस उद्देश्य को पूजा के समय कभी भी अपने मनसे दूर न होने दें. देवता का पूजन पूर्णतः समर्पित भावसे करें और साथ ही अपनी मनोकामना भी देवता को बताते रहें.
देवताओं का एक और रोचक गुण होता है. आप देवता के साथ जिस
प्रकार का संबंध रखते है उसी प्रकार देवता आपके साथ व्यव्हार करते है. उदहारण के
लिए जब किशन कन्हैया को बाल स्वरुपमें देखा जाता है तो उसका व्यवहार भी साधक के
साथ बालकों वाला ही बन जाता है, और यदि भैरव के रौद्र रूप का संधान किया जाता है
तो उसका व्यवहार साधक के साथ रौद्रतापूर्ण ही रहता है. बालक हठ भी कर सकता है और
रूद्र विनाश भी कर सकता है, इसलिए देवताओं के साथ भी ऐसी समस्या हो सकती है. यूं समजिये
की देवता भक्तों की भावनाओं के दास होते है. जो स्वरुप भक्त कल्पना करता है उस
प्रकार व्यव्हार करनेके लिए देवता विवश होते है, और यही बात कभी कभी समस्या भी
उत्पन्न कर सकती है.
प्रखर सिध्ध साधक देवताओं को भी अपने वशमें रखना जानते है
इसलिए उनके स्वरुप से संबंधिति समस्याओं से वे बचे रहते है. ऐसे सिध्ध साधक
देवताओं को अपनी इच्छा के दास बना लेते है, न की अपनी भावनाओं के दास! यही अंतर
होता है एक भक्त और एक सिध्ध योगी में. वैसे सिद्ध हो चुके भक्त भी देवताओं के ऊपर अपना प्रेमपूर्ण
आधिपत्य रखा करते है.
देवताओं का कोई निश्चित स्वरुप न होनेके कारण ही आजकल प्रयोगात्मक मूर्तियों का
प्रचालन हुआ है. आपने अनेक चित्र-विचित्र गणपति देखे होंगे, जैसे की चुनाव के समय मोदी
के साथ चाय पी रहे गणपति, वर्ल्ड कप के समय क्रिकेट खेल रहे गणपति, इत्यादि.
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| Ganpati Playing for World Cup |
| Ganpati On Chai Pe Charcha To Wish Modi Luck |
सैधांतिक रूपसे हमें यह मानना चाहिए की ऐसी मूर्तियों की स्थापना के पीछे चुनाव और वर्ल्ड कप जीतने के लिए गणपति देव से आशीर्वाद लेनेका आशय है, और ऐसी मूर्ति बनाने से भक्तों में यही भावना जागृत होती है. यदि ऐसा ही है तो ठीक है.
परंतु हां, किसी विशेष मनोकामना से रिक्त “कुछ नया
करनेके लिए” बनाई गई चित्र-विचित्र मूर्तियों के स्वरुप से मेरा निजी
विरोध है. जैसे की ये....
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| Odd Idols Of Ganpati To Do "Something Different" |
विसर्जन क्यों करें?
“विसर्जन क्यों करें” इस प्रश्न का उत्तर देनेसे पहले मैं
यह स्पष्ट करना चाहूँगा की “विसर्जन किस मूर्ति का ना करें”.
अधिकांश ऐसा देखा गया है की अज्ञान वश कई भक्त अस्थायी मूर्ति के साथ साथ प्राण
प्रतिष्ठा की हुई स्थायी मूर्ति का भी “सांकेतिक विसर्जन” कर देते है. ऐसा कभी
ना करें. इस मुर्तिमें प्राण होते है, इस मुर्तिमें आप अपने स्थायी देवता देख
रहे होते है इसलिए समयांतरमें इसमें आपकी इच्छानुसार देवता प्रवाहित होते है.
देवता आपके वशमें होते है. आप जब उन्हें खाना खिलते है तो वो खाते है, जब स्नान
कराते है तब स्नान करते है, और वस्त्र देनेपर वस्त्र ओढ़ते है. अब यदि आप उन्हें विसर्जित
कर देंगे तो मुर्तिमें ही उनकी मृत्यु हो जाएगी और फिर वे मुर्तिमें और आपके वशमें
नहीं रहेंगे. इसलिए कभी भी स्थायी और अचल मूर्ति का खंडित होने तक विसर्जन न करें.
गणपति उत्सवमें स्थापित करी जानेवाली अस्थायी मुर्तिमें देवता
आवाहित होते है. इसलिए मूर्ति का विसर्जन करनेसे पहले देवता को मुर्ति से बहार
निकलकर अपने स्थान पर जाने के लिए कहा जाता है. इसे “उस्थापन विधि” कहते
है. यह विधि भी किसी शाश्त्रों के ज्ञाता पंडित के द्वारा ही की जानी चाहिए. देवता
को वापस भेजने से पहले उनको वंदन करके उनसे मनचाहे फल की अपेक्षा करनी चाहिए. यदि
देवता आपकी भक्ति से प्रसन्न है तो अवश्य
ही फलपुर्ती होती है.
अब देवता को हमने अपने धाम को भेज दिया. मूर्ति तो खाली हो
गई. फिर उसका विसर्जन करनेकी क्या आवश्यकता है? ...... बहोत बड़ी आवश्यकता है.....
चाहे कितनेही विधि विधान से उस्थापना की गई हो, परंतु इसमें
त्रुटी रहनेकी पूरी संभावना है. और फिर जैसा की पहले कहा गया है, पूजा विधि के
प्रत्येक चरनमें साधक का भावनात्मक एकीकरण आवश्यक है. इसलिए यह हो सकता है की मूर्ति
की उस्थापना ठिकसे न हुई हो, और देव अभी भी उसमें बिराजमान हो. या यह भी हो सकता
है की साधक उस मूर्ति से इतना भावनात्मक रूपसे जुड़ गया है की वो देवता को उस
मूर्ति से निकल कर स्वधाम भेजने के लिए तैयार ही नहीं है, इसलिए उस्थापना विधि से
वो अलिप्त रह रहा है. ऐसा होनेसे देवता मुर्तिमें ही रह जाते है. ऐसे समय समस्या
हो सकती है.
कैसी समस्या?
पहली समस्या तो ये है की देवताओं को अकारण ही बाधित करके
नहीं रखना चाहिए. कार्य समाप्ति होते ही उन्हें मुक्त कर देना चाहिए.
और दूसरा कारण यह है की भक्त कोई भी हो सकता है, उसकी
इच्छाएँ कुछ भी हो सकती है. कोई नहीं जानता की किस उद्देश्य से भक्त ने देवता का
आवाहन किया हुआ है. हो सकता है की किसी विनाशी उद्देश्य से भी आवाहन किया हो! और
यदि ऐसा ना भी हो, तो भी, कोई भी सांसारिक कार्य अचल रूपसे शुभ या अशुभ नहीं होता है.
धन प्राप्ति शुभ भी हो सकती है, अशुभ भी. संतान प्राप्ति शुभ भी हो सकती है, अशुभ
भी. नयी गाडी का लेना शुभ भी हो सकता है, अशुभ भी. भविष्य के गर्भमें क्या छुपा है
यह कोई नहीं जानता. और फिर एक काम किसी एक व्यक्ति के लिए शुभ हो सकता है, तो
दुसरे के लिए वही कार्य अशुभ भी हो सकता है. हम ये भी नहीं जानते की वही कार्य उसी भक्त के लिए भविष्यमें
शुभ होगा या अशुभ. इसलिए मूर्ति किसी और के संपर्कमें ना आये और यजमान के स्वयं के
भी संपर्क में आगे चलते ना आ जाए इसलिए उसका विसर्जन आवश्यक है.
देवता भक्त की इच्छा के आधीन होनेके कारण जबतक मूर्ति में
रहते है, अपना निर्देशित कार्य करते रहते है. वे शुभ-अशुभ का विचार नहीं करते. शुभ-अशुभ
का विचार करना देवताओं का काम भी नहीं है. यह विचार करनेका अधिकार केवल मनुष्य को
ही मिला हुआ है (इस परिपेक्ष्यमें विचार किया जाए तो मनुष्य देवताओं से भी उच्च स्थान
रखता है). इसलिए बुद्धिमानी इसीमें है की अपने कार्यकी सिद्धि करनेके उपरांत मूर्ति
को विसर्जित कर दिया जाए जिससे की यदि अभी भी उसमें देवता स्थित है तो मूर्ति के
जलमें विलीन होते ही वे स्वधाम पहोंच जाएंगे और कोई हानि नहीं होगी.
महाराष्ट्र के पेशवा परिवार की एक दंतकथा के अनुसार किसीने
अपने शत्रु की हत्या के लिए एक मुर्तिमें गणपति देव का आवाहन किया. मूर्ति धातु की
थी. कार्य सिद्ध हो गया परन्तु मूर्ति विसर्जित होकर जलमें विलीन नहीं हुई. इस
कारण जिसके पास भी वो मूर्ति जाती थी वहां विनाश होता था. उस मुर्ति का अंतमें
क्या हुआ यह किसीको नहीं पता, या तो यूं कहिए की इस लेखक की जानकारी में नहीं है.
महत्वपूर्ण सुचना:
जैसा की अभी कहा गया है, मूर्ति का जलमें विलीन होना आवश्यक
है. यही कारण है की शाश्त्रोंमें स्पष्ट रूपसे अस्थायी मुर्ति को मिटटी से बनाने
का विधान है. आजकल बनाई जा रही POP की मूर्तियाँ इको फ्रेंडली तो नहीं है, परन्तु
शाश्त्र समर्थित भी नहीं है. यह मूर्तियाँ जलमें विलीन नहीं होती इसलिए विसर्जन
अधुरा रहता है. इसलिए अस्थायी मूर्ति के लिए सदैव ही मिटटी की मूर्ति का ही आग्रह
रखें.
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इश्वर से प्रार्थना है की गणपति देव इस पावन अवसर पर आप
सभीकी मनोकामना पूर्ण करे.
गणपति बाप्पा मोरिया!


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