राम मंदिर बने - विथ नो कोम्प्रोमाईज़
हाल ही में संघ के प्रमुख,
सरसंघचालक श्री मोहन भागवतजीने अपनी एक सभामें हुंकार करते हुए कहा की राम जन्मभूमि
के ऊपर केवल और केवल मंदिर ही बन सकता है और इस विषयमें कोई भी समजौते का अवकाश
नहीं है.
रामजन्मभूमि के विवाद्को
कैसे सुलजाया जाए इस विषयमें बहोत समयसे विविध विचारधारा वाले लोग विविध सुजाव दे
रहे है. इसमेसे अधिकतर सुजाव उस स्थान पर केवल मंदिर ना बने ऐसा सोचने वाले लोग ही
दे रहे है. यह बात समजने के लिए हम अभी तक प्रस्तुत किये गए सारे सुजावों को एक
एक करके संक्षेपमें देखेंगे. और इन सबमें मंदिर के पक्षकारोंका द्रष्टिकोण भी
देखेंगे जिससेकी इस पुरे विषयको पूर्णतः समजा जा सके, और यह भी समाज पाएं की यह विवाद क्या और क्यों है.
1. बाबरी मस्जिद ढांचा जैसा अभी है उसी स्थितिमें
ज्यों का त्यों रखना चाहिए और वहां कोई नयी ईमारत नहीं बननी चाहिए. और यदि कुछ नया
बनाना भी है तो वहां फिरसे मस्जिद बननी चाहिए.
मंदिर के पक्षकार: यह
समाधान स्वाभाविक रूपसे ही मंदिर के पक्षकारों के लिए मान्य नहीं है. न्यायालयोंमें
यह बात पहलेही प्रमाणित हो चुकी है की उस स्थान पर पहले राम मंदिर था जिसको गिराकर
मस्जिद बनवाई गई थी. इस स्थितिमें मंदिरके पक्षकारों के लिए यह सुचन सुनना भी
मुर्खता है.
2. रामजन्मभूमि के ऊपर मंदिर और मस्जिद, दोनों ही बनने चाहिए जो की “एकता”
का सन्देश देगा.
मंदिरके पक्षकार: मंदिरके पक्षकारों के अनुसार क्या मुस्लिम अपने तरफसे “एकता” का
परिचय देकर, अपने पुरखों द्वारा की गई भूलों को सुधारकर हिन्दुओं को यह भूमि नहीं
सौप सकते? इससे बड़ा एकता का सन्देश क्या हो सकता है? पक्षकार श्री सुब्रमनियम स्वामिके
मतानुसार हिन्दुओं के लिए श्री रामने जहां जन्म लिया था वह स्थान अत्यंत ही
महत्वपूर्ण है. और मुस्लिमों के लिए बाबरी मस्जिद तनिक भी महत्वपूर्ण स्थान नहीं
है. वैसे भी इस्लाममें कहा गया है की मस्जिद केवल एक नमाज़ पढनेके लिए एकत्रित
होनेका स्थान है. उस स्थान का इससे अधिक कोई महत्त्व नहीं है. जबकि हिन्दुओंमें तो
मुर्तिमें प्राण प्रतिष्ठा करके भगवान को स्वयं मंदिरमें प्रस्थापित किया जाता है.
इसलिए हिन्दुओं के लिए मंदिर पवित्र स्थान है, जबकि मुस्लिमों के लिए मस्जिदका कोई
विशेष महत्त्व नहीं है.
मंदिर के पक्षकारों के अनुसार भारत देश हजारों वर्षोसे हिन्दुओं का
देश रहा है. राम भगवन हिंदुओंके प्रमुख देवताओंमेंसे एक है. यदि उनकी जन्मभूमिके
ऊपर उनके मंदिर के साथ साथ उनके ही मंदिर को तोड़ने वालों का भी स्थान बनाने के लिए
विवश किया जाएगा तो वे स्वाभिमान से जीने के लिए और कहां जाएँगे? मुस्लिम देश तो
अनेक है. हिन्दू कहां जाएंगे? क्या मक्कामें किसी और धर्म के देवता का स्थान बनाना
संभव है? क्या वेटिकन सिटिमें राम मंदिर बन सकता है?
3. यदि राममंदिर बनता है तो अयोध्यामें ही रामजन्मभूमिसे थोड़े ही
दूर, या तो अयोध्या के बाहर कही और स्थान पर हिन्दुओंके खर्चे से एक मस्जिद बननी
चाहिए.
मंदिरके पक्षकार: यहांपर मंदिरके पक्षकारोंका द्रष्टिकोण बहोत दिलचस्प है. शुरुसे ही,
रामजन्मभूमि के ऊपर केवल मंदिर बनाना उनका उद्देश्य था ही नहीं. यह प्रश्न तो उनकी
गरिमा और आत्मसन्मान से जुड़ा हुआ है. इस विषयमें कोई भी समजौता करनेका अर्थ है, आततायियोंसे समजौता करना की जिन्होंने इस मंदिरको बलपूर्वक तोड़ गिराया था.
पिछले 450 वर्षोमें राम
जन्मभूमिके ऊपर मस्जिद तोड़कर फिरसे मंदिर बनाने के लिए अनेक युद्ध हो चुके है.
कितने ही लाखो योद्धा मंदिर बनाने के लिए मर मिट गए है, अनगिनत साधू महात्मा अपने
प्राणोंका बलिदान दे चुके है. जब राजा युद्धमें हार जाते थे तब साधू समाज अपनी एक “चिमटाधारी”
सेना बनाकर मुग़ल आक्रान्ताओं के विरुद्ध लड़ मरते थे. ऐसा माना जाता है की बाबरी
मस्जिद के लिए लगने वाली इंटों में हिन्दू योद्धाओं का रक्त मिलाकर बाबरी मस्जिद
बनाई गई थी. इस सबके उपरांत भी हिन्दुओं के ह्रदयसे उसी स्थान पर राम मंदिर
बनानेकी उत्सुकता कभी कम नहीं हुई. तो फिर आज मंदिरके पक्षकार इस मुद्दे पर समजौता
करके अपने पूर्वजोंके बलिदान का अपमान कैसे कर सकते है?
4. रामजन्मभूमि का निर्णय सर्वोच्च न्यायलयके आदेश के अनुसार ही किया
जाना चाहिए.
मंदिरके पक्षकार: मंदिरके पक्षकारों को इस सुचन के साथ कोई समस्या नहीं है. परन्तु
समस्या यही है की न्यायालयोंने दशकों से इस विषयमें कोई निर्णय ही नहीं दे रहे थे.
1-2 दशक नहीं, 90-90 वर्षो से यह अभियोग एक या दुसरे न्यायलयमें चल रहा है. जी हा,
यह अभियोग हमारी स्वतंत्रता से भी पुराना है.
वैसे तो यह केस बिलकुल ही
सीधा और स्पष्ट है. मुख्य पक्षकार स्वयं श्री रामलला को ही बनाने के लिए कोर्ट
सहमत हो गया था. और पुरातत्व विभागने अत्यंत ही स्पष्ट प्रमाण देकर उच्च न्यायलयमें
यह निर्विवादित रूपसे सिद्ध कर दिया था की वह भूमि स्वयं श्री रामललाकी ही थी.
फिरभी कोर्ट है की वर्षोसे धीमी गति के समाचार बनी हुई है. वे निर्णय देनेके
बनस्पत, सभी पक्षकारों को कोर्ट के बाहर ही समजौता करनेकी बिनमांगी सलाह दे रहे
है. जबकि उनका कार्य स्पष्ट और निष्पक्ष निर्णय देने तक ही सिमित है. और फिर इस
केस में सभी न्यायालयोंने एक के बाद एक, विवादस्पद निर्णय दिए है. और यही कारण है की
यह अभियोग आज उच्चतम न्यायलय तक पंहुचा है. इसके उपरांत हाल ही में उच्चतम
न्यायलय द्वारा हिन्दू त्योहारों के ऊपर विवादस्पद निर्णय दिए गए है. इसलिए मंदिरके
पक्षकारों को चिंता हो रही है.
5. तथाकथित बुद्धिजीवी, वामपंथी और हिन्दू विचारधारा के विरोधियों का
प्रस्ताव है की रामजन्मभूमि के ऊपर मंदिर या मस्जिद बनाने के स्थान पर एक हॉस्पिटल
बनाना चाहिए जिससे की वह स्थान लोकोपयोगी बने.
मंदिरके पक्षकार: स्वाभाविक रूपसे ही मंदिर के पक्षकारों के लिए यह प्रस्ताव अस्वीकार्य
है. उनके मतानुसार इस देशमें केवल हिन्दू ही कबतक समजौता करते रहेंगे? जो जो
राजनैतिक पक्ष और लोग यह सुजाव दे रहे है उनके अपने पुरखों की समाधी हजारों एकरमें
बनी हुई है. यह भूमि अत्यंत ही मूल्यवान है. क्या वहापर वे लोग अस्पताल नहीं बना
सकते? क्या उनके पुरखों का स्थान महत्वपूर्ण है परन्तु हिन्दुओं के पूर्वजों से
जुडी सभी बाते ठुकराने लायक है? प्रभु श्री राम का जहाँपर जन्म हुआ था वहापर
अस्पताल बनानेका सुजाव तो आपने ठंडे कलेजे से दे दिया, परंतु क्या आप मक्का के
काबा के स्थान पर अस्पताल बनाने का सुजाव भूल से भी देने की हिम्मत रखते है?
6. केवल शिया ही नहीं, सुन्नी मुस्लिमों से भी चर्चा करके इस विवाद
का समाधान लाना चाहिए.
मंदिरके पक्षकार: बाबरी मस्जिद एक शिया मस्जिद थी. अभी केवल 40 साल पहले तक मस्जिद के
लिए केवल शिया वक्फ बोर्ड ही एक पक्षकार था. उसके बाद इस विवाद्में सुन्नी वक्फ
बोर्ड भी पक्षकार बन गया जिसका इस विषयमें कोई लेना देना नहीं है. इसलिए पिछेसे
आये इस पक्षकार के साथ मंदिर के पक्षकार कोई समाधान करनेको तैयार नहीं है. यह बात
उल्लेखनीय है की शिया वक्फ बोर्ड उसी स्थान पर राम मंदिर बनाने के लिए मोटे तौर पर
तैयार हो गया है ऐसे समाचार पहले ही आ चुके है.
कुल मिलकर मंदिर के पक्षकार
एक बातमें तो स्पष्ट ही है की राम मंदिर बनेगा और कोई भी समजौता किये बिना ही
बनेगा. उनके लिए यह एक निष्ठा का विषय है, गरिमा का मुद्दा है, आत्मसन्मान की लड़ाई
है. उनके लिए यह विषय इस देशमें रामराज्य का शंखनाद करनेके लिए एक चुनौती के समान
है. स्पष्ट है की उन्होंने यह चुनौती स्वीकार कर ली है, और उनके लिए इस विषयमें
कोई भी समजौता करना संभव नहीं है.

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