सौगंध राम की खाते है.. - Saugandh Ram Ki Khate Hai

-- जय श्री राम --

आज मैं फिर वही १० साल का बालक बन गया हूं। वही बालक जो की भिडमें अपने पिता के साथ खड़ा है, बाएं हाथमें मशाल है, और दांया हाथ मशाल के ऊपर रखा है, और उच्च व् दृढ स्वरमें बोल रहा है "सौगंध राम की खाते है, हम मंदिर वहीं बनाएँगे"

इतने साल यह सौगंधको साथ लेकर चला हूं, और जब न्यायलय का यह निर्णय आता है तब यह सोचनेपर विवश हो जाता हूं की क्या यह वही जीत है जिसकी हमने सौगंध ली थी? उत्तर हां या ना में नहीं दिया जा सकता. इसलिए मैं अंतिम निर्णय पाठकों पर छोडूंगा। मैं केवल विविध पहलु प्रस्तुत करूँगा।

माननीय उच्चतम न्यायलयका निर्णय यह आया है की रामजन्मभूमि वाली 2.67 एकर भूमि सरकारको मंदिर बनाने के लिए मिलेगी और सुन्नी पक्ष को अयोध्यामें ही 5 एकर भूमि मस्जिद बनाने के लिए मिलेगी। अब इस निर्णयकी समीक्षा करेंगे।

यह लेख मेरे लिए बहोत खास है. इसलिए इस लेख को एक सामान्य लेख की भांति ना लिखते हुए, इसे मेरे और श्री राम के बिच के संवाद के रूपमें लिखूंगा। आशा है की पाठक इसे पसंद करेंगे। मेरी सौगंध बिलकुल सच्ची है, पर कहनेकी आवश्यकता नहीं की प्रभु श्री राम के साथ मेरा ये संवाद एक काल्पनिक संवाद है :))

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बालक: हे तात! आज निर्णय आ ही गया। क्या आप इस निर्णय से संतुष्ट है?

श्री राम: मैं तो स्वयं पूर्णता स्वरुप हूं बालक! मुझे संतोष या असंतोष नहीं होता। तुम कहो बालक, क्या तुम संतुष्ट हो?

बालक: बिलकुल नहीं प्रभु! सर्वप्रथम तो यह मुद्दा न्यायलय के अधिकार के अंतर्गत ही नहीं आता. यह झगड़ा 500 साल से चल रहा है, और न्यायलय सैद्धांतिक रूपसे यही मानकर चलता है की भारत देश बना ही 1947 में है. न्यायालय यह भी मानकर चल रहा है की यह एक भूमि के आधिपत्य का विवाद है. जबकी वास्तवमें यह दो सभ्यताओं के बिचका विवाद है। तो जब इस अभियोग की मुलभुत अवधारणा ही वास्तविकता से बिलकुल अलग है, तो इस निर्णय का भी क्या महत्त्व रह जाता है? और फिर यह अभियोग 134 वर्षोंसे चल रहा है. 134 वर्ष! और फिर अपने निर्णयमें माननीय न्यायाधीश कहते है की बाबरी ढांचा हिन्दुओं द्वारा गिराया जाना एक अपराध था। तो क्या उस समय १०० वर्षों तक इस मुक़दमे को लटकाए रखने के लिए स्वयं न्यायलय अपराधी नहीं था? बाबरी ध्वंस होता ही नहीं यदि समय पर निर्णय आ गया होता।

श्री राम: दुखी ना हो वत्स! यदि तुम ऐसा सोचते हो की यह तुम्हारा आस्था का विषय है, तो न्यायलय द्वारा तुम्हारी आस्था को नगण्य करके अभियोग चलाना तुम्हारा अपमान माना जा सकता है, परंतु फिर यदि ध्यानसे देखा जाए तो यह जीत भी तुम्हारी आस्था की ही हुई है। कोई भी राजनैतिक दृष्टि रखने वाला व्यक्ति यह स्पष्ट रूपसे समझता है की यह निर्णय इसी लिए आया है क्योंकि केन्द्रमें एक हिंदुत्व समर्थित सरकार थी। अन्यथा अगले 100 वर्षो तक भी इसका निर्णय नहीं आने वाला था। निर्णय पक्षमें आनेकी तो बात ही छोड़ दो। इसलिए न्यायलय के अधिकार क्षेत्र की चिंता ना करते हुए तुम यह क्यों नहीं सोचते की वह तुम्हारी हिन्दू निष्ठा ही थी जिसने आज यह निर्णय आनेपर विवश कर दिया?

बालक: वो तो ठीक है प्रभु! परन्तु क्या हम कल्पना कर सकते है की मक्का, मदीना, जेरूसलम, वेटिकन सिटी इत्यादि पवित्र स्थान कोई गिरा दे, और वहांके आस्तिक लोग न्यायालयमें जाकर 132 वर्षों तक मुकदमा लड़ते रहे? और ऐसा मुकदमा की जिसमें यह निर्णय किया जाता हो की वहांके भगवान असलमें थे या नहीं, क्या भगवान को न्यायलय जीवित व्यक्ति समझकर उनके ऊपर क़ानूनी करवाई कर सकते है या नहीं, क्या उस भूमि पर स्वयं भगवान का कब्ज़ा था या नहीं.. सुननेमें ही हास्यास्पद लगता है ना प्रभु? यही ड्रामा चल रहा था 132 वर्षोंसे!

इतिहास साक्षी है की जब जब किसी सभ्यताने अपना खोया हुआ आधिपत्य पुनः प्राप्त किया है, तब तब उन्होंने आक्रांताओं के बनाए गए चिन्हों को गिराकर अपने मानचिन्ह पुनः प्रस्थापित किये है। हम यदि विदेश की बात ना भी करें तो भारतमें ही जब अंग्रेजी साशन समाप्त हुआ तब कांग्रेसके राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओंने - नेहरू के विरोध के बावजूत - वायसरॉय के सारे पुतले गिरा दिए थे क्योंकि वे उनको आँखमें चुभते थे।

आप तो जानते ही है की सीरिया को अमरिकाने खंडहर क्यों बना दिया! क्योंकि सीरिया ईसाईयों की पवित्र भूमि थी और ऑटोमन आक्रांताओंने उस पुरे क्षेत्रका मतपरिवर्तन करके मुस्लिम बना दिया था।

मैं यह नहीं कह रहा हु की हम सभ्यताकी लड़ाई हिंसात्मक रूपसे लड़ते रहें, परन्तु जो भी लड़ाई हम न्यायलय के माध्यमसे लड़ रहे है उसमें श्रद्धा और सभ्यता के दृष्टिकोणसेनिर्णय होना चाहिए, ना की एक भूमि विवाद के रूपमें। यह अपमान है हिन्दू सभ्यता का और आपका।

श्री राम: वत्स, मेरे मान और अपमान की बात छोड़ दो। मैं समझता हूं की यह तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है, और होना भी चाइए, परन्तु मेरे लिए मान अपमान महत्वपूर्ण नहीं। और जहातक उस पवित्र भूमि का प्रश्न है, तो तुम ये क्यों नहीं सोचते की सभ्यताकी लड़ाई उस 2.67 एकर के लिए ही थी। मीर बांकीने वह मंदिर इसी लिए तोडा था क्योंकि वे तुम्हारी आस्था को आहत कर सके। वो मस्जिद तो कहीं और भी बना सकता था। पर उसने बनाई उस मंदिर को तोड़कर ही। इसके उत्तरमें तुमने भी हिंसक और अहिंसक, दोनों प्रकारसे अपनी लड़ाई लड़ी। कुल 76 युद्ध किए। और फिर एकदिन शांतिपूर्ण ढंगसे यह निर्णय आता है की वह पूरी 2.67 एकर भूमि हिन्दुओं को दी जाती है. अब मंदिर तो बनेगा ही। अति भव्य मंदिर बनेगा! फिर तुम्हारी समस्या क्या है?

बालक: प्रभु! मेरी समस्या यह है की 134 वर्षों के बाद निर्णय के रूपमें हमें क्या मिलता है? एक समझौता? न्यायलय एक तरफ तो इसे भूमि विवाद के रूपमें देखकर निर्णय देते है, और दूसरी तरफ मुस्लिमों कीआस्था का ध्यान रखते हुए (सेक्शन 142 का उपयोग करके) उन्हें 5 एकर भूमि देनेका आदेश देते है. तो या तो वे आस्था के आधार पर निर्णय दे दें, या तो भूमि विवाद के आधार पर!

निर्णयमें हिन्दुओं को 2.67 एकर भूमि मिली है और मस्जिद के लिए 5 एकर। और फिर 5 एकर ही क्यों? क्यों 5 बीघा नहीं? क्यों 5 वर्ग किलोमीटर नहीं? इसका कोई स्पष्टीकरण माननीय न्यायाधीश नहीं करते। मुलभुत मस्जिद तो केवल एक एकरमें  ही थी। स्पष्ट है की न्यायाधीश अपनी ही मरजीसे निर्णय दे रहे है।

श्री राम: (हस्ते हुए) अयोध्यामें पहलेसे 55 मस्जिदें है। एक और सही!

बालक: प्रभु, पर मैं इस निर्णय को ऐसे कैसे देख लूँ? स्वाभाविक रूपसे ही मैं इस प्रश्न को एक सभ्यता की लड़ाई के रूपसे देखता हूं, इसलिए यही सोचूंगा की क्या इसी लिए 135 वर्ष तक हमने संयम बरतते हुए माननीय न्यायलय से आस लगाए राखी थी? जबकि बहुसंख्यक हिन्दू कभी भी वहां मंदिर बना सकते थे। वह हिन्दुओंका शांतिप्रिय स्वाभाव ही था जिसने अभीतक मंदिर निर्माण रोक रखा था। तो अभी हमें बदलेमें क्या मिल रहा है? क्या मैं ठगा नहीं गया प्रभु?

श्री राम: बालक! तुम्हारी समस्या यही है की तुम इसे एक सभ्यताकी लड़ाई के रूपमें देखते हो। जब तुम्हारा संविधान ही सेक्युलर है, जब तुम्हे ऐसा सोचनेका अधिकार ही नहीं मिला, फिर तुम क्यों दुखी होते हो की न्यायलयने एक समझौते के रूपमें यह निर्णय दिया है? तुम जब इसीको स्वीकार कर चुके हो तो फिर तुम क्यों किसीको दोष दे रहे हो? या तो वास्तविकता स्वीकार करो, या तो तुम्हारे देशको हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए मांग करो! दुखी होनेसे कुछ नहीं मिलेगा वत्स। जो छोटी विजय तुम्हें आज मिली है उससे प्रसन्न होना सीखो, और अपने उज्जवल और सन्मानपूर्ण भविष्य के लिए कमर कसो। तथास्तु!

इतना कहते ही प्रभु श्री राम अलोप हो गए। बालक उन्हें ढूंढता रह गया। अभी तो कितने ही प्रश्न थे पूछने के लिए, परन्तु प्रभु तो चल दिए! तभी बालक को कुछ याद आया और मन ही मन श्री राम का स्मरण करके बोला:

बालक: हे राम! वार्तालापमें इतना रत हो गया की जो कहने आया था वो भी नहीं कह पाया। 

हे राम! मैं आपकी सौगंध हरपल साथ लेकर ही जिया हूं। आप जानते है की मैं पूरी श्रद्धा और निष्ठासे यथाशक्ति जितना हो सकता था, उतना इस सौगंध को जिया हूं। आज मेरी, और मेरे जैसे लाखों भक्तोंकी सौगंध पूर्ण हुई है, वह भी आपकी ही कृपा है। मैं आपकी सेवामें मैं एक गिलहरी भी नहीं हु, (गिलहरी की कहानी)अपितु उसके तन पर लगी रेणु मात्र हूं। मेरा समर्पण स्वीकार करें प्रभु... स्वीकार करें __/\__

-- जय श्री राम --

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