क्या भगवान का मनुष्य्करण योग्य है?
आपने कितने लोगों को ऐसा कहते सुना है की "राम और कृष्ण भगवान् नहीं, अपितु मनुष्य थे, समय के चलते उनको भगवान् बना दिया गया", या फिर "यदि राम और कृष्ण को समजना है तो उनको एक सामान्य व्यक्ति की द्रष्टि से देखा जाना चाहिए"?
बहुत लोगों को आपने ऐसा कहते हुए सुना है, नहीं? बड़े बड़े विचारक, अख़बारों में लिखने वाले लेखक, उपन्यास लेखक, समाज सुधारक, और कुछ तो तथाकथित धर्मात्मा भी ऐसा कहते रहते है. सुननेमें लगती यह तार्किक और सुहावनी बात क्या वास्तवमें सत्य है?
ऐसी बातें सच मानने में एक समस्या यह है की जब आप यह बात स्वीकार करते हो, तब आप यह भी स्वीकार करते हो की भारतके हजारों लाखो वर्ष के इतिहासमें हुए अगणित संत, महात्मा और धर्मात्मा सदंतर मुर्ख और अंधश्रद्धालु थे, क्योंकि वे भगवानों को भगवान् की भांति ही पूजते थे. क्या यह बात मानने योग्य है?
तो सत्य क्या है?
सौभाग्य से (वास्तवमें दुर्भाग्य से) हमारे पास एक ऐसे समाज का उदहारण है की जो राम-कृष्ण को अपने पूर्वज तो मानते है, उनके जीवन के प्रत्येक आख्यान को भी सच मानते है, परंतु उनको भगवान् के रूप में ना देखते हुए, एक ऐतिहासिक मनुष्य के रूपमें देखते है. यदि हम उस समाजकी दशा देखें तो हम अपने प्रश्न के समाधान पर आ सकते है.
तो कहाँ है ऐसा समज की जो हमारे भगवानों को मानते तो है, परन्तु ऐतिहासिक पुरुष के रूपमें, भगवान के रूपमें नहीं? यह समाज है, इंडोनेशिया द्वीप समूह!
यदि आप कभी इंडोनेशिया घुमने गए है तो आप बाली अवश्य गए होंगे. और यदि पर्यटन लंबा है तो अन्य कुछ द्वीप भी देखे होंगे. आजकल यह सामान्य ज्ञान की बात हो चुकी है की इंडोनेशिया एक मुस्लिम देश होनेके बनस्पत, वहां अनेक स्थानों पर विष्णु भगवान्, राम भगवान्, गरुड़ इत्यादि की बड़ी बड़ी प्रतिमाएं सार्वजनिक स्थानों पर रखी गई है. विश्व की सबसे बड़ी गरुड़ की प्रतिमा वहां पर है, उनकी एयरलाइन का नाम "गरुडा" है. बालि के एअरपोर्ट पर ही एक शैयासनी विष्णु भगवन की विशाल और मनमोहक प्रतिमा रखी हुई है. इतना ही नहीं, बाली और अन्य अनेक द्वीपों में प्रतिदिन रामलीला का मंचन होता है. कितना सुन्दर! कितना उत्तम! हम हिन्दू इस बात से बहुत ही गर्वान्वित होते है और फुले नहीं समाते!

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परंतु वास्तविकता क्या है? बाली टापू में हिन्दुओं की बहुत बड़ी जनसँख्या है. वे राम-कृष्ण-गरुड़-विष्णु को अपने भगवान् मानते है, इसलिए वहां के मंदिर सुचारू रूपसे पूजित है, और धर्म भी टिका हुआ है. किंतु बाली के अतिरिक्त किसीभी द्वीप में हिन्दुओं की जनसँख्या बहुत ही कम है. अधिकतर मुस्लिम ही रहते है. यद्यपि वहांपर भी हिन्दू मंदिर है, और वहां के लोग राम-कृष्ण को अपने पूर्वज भी मानते है, परंतु उन्हें अपने भगवान् नहीं मानते. मंदिर केवल एक पर्यटन स्थल है. परिणाम स्वरुप, वहां के मंदिरों में भगवान तो है, पर पूजता कोई नहीं, आरती या धूप दीप भी नहीं होते. लोग जूते पहनकर मंदिर के गर्भगृह में घूमते है, स्थानिक पथदर्शक स्वयं मंदिर में बीडी/सिगरेट फूंकते है, इधर उधर थुंकते है, मंदिर में विदेशी पर्यटक अंग्रेजी गालियाँ बोलते है, और मंदिर के संकुल में ना करने जैसे प्रत्येक काम करते है. अतः वे सब मंदिर अब मंदिर नहीं रहे, अपितु मंदिर के मृतदेह बन चुके है. परंतु इससे ठीक विपरीत, प्रत्येक मंदिर के प्रांगण में ही, मंदिर के निकट ही, एक छोटी मस्जिद अवश्य होती है की जहां वे जूते निकालकर, पूरी श्रद्धा से और स्वच्छता से दिनमें पांच बार नमाज़ पढ़ते है. इंडोनेशिया अतिशीघ्रता से एक आक्रामक जिहादी मानसिकता रखने वाला देश बन रहा है. और वहां के लोग एक अत्यंत ही कट्टरवादी जिहादी नेता - विडोड़ो - को अपने राष्ट्रप्रमुख के रूपमें चुनते है. ये वही लोग है जो हिन्दुओं के साथ "राम हमारी भूमि पर हुए थे, आपकी भूमि पर नहीं" ऐसा कहकर भारतियों के साथ लड़ने पर उतारू हो जाते है. है ना बड़े ही आश्चर्य की बात! अब प्रमुख विडोड़ो ने निश्चय किया है की हिन्दू जनसँख्या वाले बाली द्वीप का महत्त्व घटाकर, अन्य टापुओं पर प्रवासन बढ़ाया जाए, जिससे की आने वाले समयमें पुरे देशमें से हिन्दुओं के चिन्ह और हिन्दुओं को साफ़ किया जा सके.
तो इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है की जब भगवान को मनुष्य मानकर उनसे श्रद्धा, पवित्रता, समर्पण और भगवत्व निकाल दिया जाता है तब संस्कृति का नाश निश्चित हो जाता है. इसपर से यह भी कहा जा सकता है की यदि आप अपने भगवान् को भगवान् नहीं मानते तो आप हिन्दू है ही नहीं, अथवा तो बहुत लंबे समय तक हिन्दू रहने वाले नहीं है.
यह तो हुई संकृति की बात. आध्यात्मिक रूपसे भी यदि देखा जाए तो ऐसा कौनसा महापुरुष या संत महात्मा है की जिसने भगवान् को मनुष्य मानकर अपना कल्याण किया हो? कल्याण केवल भगवान ही कर सकते है, मनुष्य नहीं. क्या किसी महान वैज्ञानिक की जीवनकथा सुनकर कोई वैज्ञानिक बन सकता है? क्या किसी बड़े धावक की जीवनकथा पढ़कर कोई ओलंपिक में दौडनेका स्वर्णपदक जित सकता है? नहीं न? पर भगवान का स्मरण करके, भगवान् की भक्ति करके, भक्त स्वयं भी भगवत स्वरुप बन गया हो ऐसे हजारो संत हमारे समज में हो चुके है.
बहोतसे आधुनिक लेखक भगवानों का चित्रण मनुष्य के रूपमें करके बहोत नाम और पैसा कमा रहे है. और हमारी नयी पीढ़ी इन सबको पढ़कर प्रभावित हो रही है और उन्हें धर्म का ज्ञाता मानकर उनके कुतर्कों के मार्ग पर चल पड़ते है. इससे उनका पतन ही होना है. हमारे जितने भी धर्म ग्रंथ है, वे किसीने मानसिक व्यायाम या तर्क-कुतर्क करके नहीं लिखे, और ना ही उन्होंने प्रसिद्धि या पैसों की लालसा से लिखे है. वे सभी संतों ने स्वयं भगवान के दर्शन किये है, उनकी लीलाएँ अपने दिव्य चक्षुओं से देखि हुई है, और उसके बाद ही उनका वर्णन किया हुआ है. उदहारण के लिए, तुलसीदासजी को जब हनुमानजी, शिवजी और राम भगवान, सबके साक्षात् दर्शन हो गए, उनकी लीला भी अपने ही नेत्रों से देख चुके, तभी उन्होंने स्वयं महादेव की आज्ञा पाकर रामचरितमानस की रचना की थी. इसलिए रामचरितमानस कोई कवी की कल्पना, या लेखक का उपन्यास नहीं है, वह तो स्वयं प्रभु श्री राम द्वारा ही की गई लीला है.
पुनः, मनुष्यका कल्याण करनेका सामर्थ्य केवल भगवान् में ही होता है, कोई अन्य मनुष्यमें नहीं. इस सृष्टि में करोडो करोड़ों देवता विद्यमान है, और उनमेंसे प्रत्येक, किसीभी व्यक्ति का परम कल्याण करनेमें समर्थ है. योग्य उपासना करनेसे वे साक्षात् दर्शन भी देते है, और जन्म जन्मान्तर के पाप एक क्षण में नष्ट कर सकते है. इसलिए तथाकथित बुद्दिजीवियों की मुर्खता में पड़कर यह दुर्लभ मनुष्य देह का व्यय करने के बनस्पत, हमारे ऋषिमुनियों और संतों की वाणी में विश्वास रखकर अपना कल्याण करनेमें ही चतुराई है.
__/\__ जय श्री कृष्ण __/\__
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