क्या अध्यात्म के विषय में विज्ञान को जबरन घुसाना ठीक है? क्या धार्मिक आस्थाएँ वैज्ञानिक होना अनिवार्य है?
प्रायः हम देखते है की हिन्दू प्रथाएँ और मान्यताओं के पीछे रहे विज्ञान को सिद्ध करनेकी जैसे की होड़ लगी हुई है. प्रत्येक क्रियामें कोई न कोई विज्ञान होना आवश्यक है.
ऐसे लोगों के लिए कुछ प्रश्न है.
- यदि कोई मान्यता या प्रथा में आपको वैज्ञानिक आधार नहीं मिलेगा तो क्या आप उसे मानने से नकार देंगे?
- यदि वैज्ञानिक आधार ही सबकुछ है तो उन क्रियाओं को आस्था से न जोड़कर केवल क्रिया के रूपमें कर लिया जाये तो क्या आपको चलेगा? उदहारण के लिए, कलावा बांधनेका आपको कोई वैज्ञानिक आधार मिल जाये तो क्या आप पूजा के पवित्र धागे को छोड़कर कोई बाजारू धागा बांध लेंगे तो चलेगा? विज्ञान तो इसमें कोई अंतर नहीं देखता?
- क्या आप यह मानते है की लाखों वर्षों से चले आ रहे हमारे पूर्वज अनपढ़ गवांर थे इसलिए उनसे धर्म के नामपर वैज्ञानिक कार्य करवाए जाते थे, और अब एक आप ही परम विज्ञानीक पैदा हो गए है जिन्होंने पूरी मानवजाति का तमस हरण करनेका बीड़ा उठाया हुआ है?
बात को अधिक न घुमाते हुए सीधा सीधा मूल बात पर आता हूं.
विज्ञान और अध्यात्म में मुलभुत अंतर है. विज्ञान बना है भौतिक वस्तुओं को समजने के लिए. और अध्यात्म (व् आस्था) बनी है आधिदैविक और आध्यात्मिक विषयों को समजने के लिए. अब आप भौतिक विज्ञान से आध्यात्मिक क्रियाओं को समजने का प्रयत्न करेंगे तो आप अध्यात्म और विज्ञान, दोनों से अन्याय कर रहे है. क्या आप भाषा के विषयों को, या समाज शास्त्र को विज्ञान के नियमों से समजने का प्रयत्न करते है? नहीं न? क्योंकि दोनों विषयों के आधार ही अलग है.
भौतिक विज्ञान सारे प्रश्नों का उत्तर बाह्य जगत में ढूंढता है और अध्यात्म परम सत्य की खोज अपने ही अंदर, अपने मन, जीवात्मा और बुद्धि में करता है। अब जब आप आस्था और अध्यात्म को वज्ञान से समजनेका प्रयत्न करोगे तो अपने आध्यात्मिक मार्ग से भटकोगे ही.
उपवासों का भी लोग वैज्ञानिक अर्थ निकालते है। पर उपवास का प्रयोजन अष्टांग योग के प्रथम दो चरण (यम, नियम) को जीवनमें सुदृढ़ करनेका होता है। ना कि "पेट साफ करनेका"। 😁😁
इसलिए भगवान में व शास्त्रों में श्रद्धा रखें और परंपरागत विधिविधान का अनुसरण करते हुए नैतिक जीवन जियें।
उदाहरण के लिए लोग हनुमान चालीसा में से सूर्य और पृथ्वी का अंतर ढूंढते है (जुग सहस्त्र जोजन पर भानु)। अब ये मूर्खता नहीं है तो क्या है?
हनुमान चालीसा का पाठ हनुमानजी जैसी भक्ति और सिद्धि प्राप्त करने के लिए बना है, मोक्ष प्राप्ति के लिए है -
"जो यह पढ़े हनुमान चालीसा होय सिद्धि सखी गौरीसा। और जो शत बार पाठ कर कोई छुटहि बंदी महासुख होइ"।
जब तुलसीदासजी ने हनुमानचालीसा का फल स्वयं ही बता दिया है तो क्यों लोग उसे सिद्ध करने के स्थान पर पृथ्वी से सूरज का अंतर ढूंढते है?
ऐसा ही वेद मंत्रों के उच्चारण का है। लोग व्यर्थ ही समय का नष्ट करते है इसमें विज्ञान ढूंढने में।
आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक स्तर पर ही लागू होता है। जबकि वैदिक विधि विधान आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक, ऐसे तीन स्तर पर काम करते है। और वैदिक नियम केवल पृथ्वीलोक पर लागू नहीं होते, समस्त लोकों पर लागू होते है। आध्यात्मिक विद्या एक जन्म के लिए नहीं होती, जन्मजन्मांतर के लिए होती है।
अब बताइए, जब विज्ञान का क्षेत्र केवल पृथ्वी और इस मनुष्य देह के इस जन्म तक ही सीमित है, तो क्यों उस विषय को मंत्रों और श्लोकों में ढूंढा जाए?
क्या कोई सोने की जाडू से कचरा साफ करता है भला? फिर इससे जाडू लगता है या नहीं ये जानने से क्या लाभ?
अब एक और प्रश्न:
परंतु हिन्दू विधि विधान में अनेक वैज्ञानिकता तो है यह बात सिद्ध है, तो क्यों इसके ऊपर लक्ष्य न दिया जाये?
एक उदहारण देता हु. आम खाने से विटामिन A मिलता है। तो क्या हम विटामिन A लेने के लिए आम खाते है? उसके लिए तो हम विटामिन की टेबलेट भी ले सकते है! आम खानेकी क्या आवश्यकता है?
हम आम इसलिए खाते है क्योंकि आम का आनंद केवल आम ही दे सकता है। कोई अन्य फल या टेबलेट नहीं।
इसी प्रकार मंत्रों, श्लोकों व स्तुतियों का प्रयोजन पारलौकिक होता है। इसमें विज्ञान घुसाना मूर्खता है।
इसी बात को आगे समजते हुए, विज्ञान केवल आम के अन्दर रहे विटामिन का नाप कह सकता है, परंतु उसमें रहे आनंद, और रसास्वाद का नहीं. आम का प्रयोजन रसास्वाद है, विटामिन मिलना तो एक अतिरिक्त लाभ मात्र है.
इसी प्रकार समजना चाहिए की अध्यात्म एक अनुभूति का विषय है जिसे समजाने के लिए भौतिक विज्ञान बना ही नहीं है. विज्ञानं भौतिक सीमाओं से बंधा हुआ है, और अध्यात्म सीमाओं को तोड़नेका काम करता है. अब बताइए की दोनों में कैसे मेल बैठेगा?
इसलिए अध्यात्म को विज्ञान से समजने का प्रयत्न ऐसा ही है जैसे आप गंगा नदी के बीचोबीच एक कुआँ खोदें और यह कहें की देखिए गंगा नदी कुआँ खोदने के लिए उपयुक्त है, क्योंकि कुँए से पानी निकल रहा है.
अस्तु.
_/\_ महादेव हर_/\_
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