भारतीय शिक्षण प्रणालीका इतिहास और उसका अंग्रेजों द्वारा किया गया निकंदन - भाग 2
भारतके शैक्षणिक निकंदनकी इस कथा का आरम्भ होता
है 1835 से जब लार्ड मेकोले पुरे भारतका सर्वेक्षण करनेके पश्चात ब्रिटिश संसद में
अपना प्रस्ताव ले कर जाते है.
"मैंने भारत देश के प्रत्येक कोने कोने को छान मारा है और मैंने एक भी व्यक्ति
ऐसा नहीं देखा जो भिखारी हो या चोर हो. ऎसी सम्पति देखि है, ऐसे उच्च आदर्श देखे
है, ऐसे सक्षम लोग देखे है, की मुझे लगता है की हम कभी भी इस देश को जित नहीं
सकते. यदि जीतना है तो हमें उस सभ्यता की नीवमें रही उनकी आध्यात्मिक और
सांस्कृतिक धरोहर को तोडना होगा. इसलिए मैं यह प्रास्ताव रखता हूँ की उनकी
पारंपरिक शिक्षण प्रणाली और संस्कृति को इस प्रकार बदल दिया जाए जिससे वे सोचने
लगे की जो भी विदेशी या अंग्रेजी है वो उनसे स्वयं से उत्तम और महान है. वे लोग
अपना आत्मसन्मान खो बैठेंगे, अपनी पौराणिक संस्कृति भूल बैठेंगे, और अन्तमें वे
वही बन जाएंगे जो हम उन्हें बनाना चाहते है.... एक ऐसा राष्ट्र जिसपे हमारा
पूर्णतः प्रभुत्व होगा".
-- लार्ड थॉमस मेकोले,
ब्रिटिश संसद, 1835
ऊपर लिखा हुआ मेकोले का कथन क्या आपको आजकी
परिस्थिति से सुसंगत लगता है? यह कथन पढ़कर तो ऐसा ही लगता है की मेकोले एक महान
ज्योतिष या तो दूरदर्शी था, जो की 200 वर्ष बाद होने वाली घटनाओं को स्पष्ट रूपसे
देख पाता था! वास्तवमें मेकोले एक बहोत ही चतुर और स्पष्ट विचारक था. इसके उपरांत लक्ष्यको
प्राप्त करनेके लिए वो कितना ही निष्ठुर और कपटी बन सकता था.
ब्रिटिश सरकार ने मेकोले के प्रस्ताव का समर्थन
किया और वहिसे आरंभ हुआ भारतीय संस्कृति का निकंदन निकालनेका अभियान. वह संस्कृति
जो सहत्रो वर्षो पुरानी थी, जिसने पुरे विश्वको सामाजिकता और समरसता सिखाई,
विश्वको नैतिकता के उच्च मूल्य सिखाए, आध्यात्मिकता और पराविद्या के पाठ पढाए, जो
विश्वमें सबसे समृद्ध और संपन्न समाज था, उसे थोमस मेकोले गिरा कर पाताल में
पहोचानेके अभियान का आरम्भ कर चूका था.
इतने बड़े भारतवर्ष को एकसाथ अंग्रेजों का
शिक्षण देना असंभव था इसलिए एक छोटे समुदाय को शिक्षण देनेका निर्णय हुआ जो की
अंग्रेजों का भारतमें प्रतिनिधित्व करे. मेकोले के अपने शब्दों में कहा जाए तो...
“ऐसे लोगों का निर्माण करना चाहिए जो की रक्त
से भारतीय हो, किन्तु व्यक्तित्व, रूचि, विचार और नैतिकता से अंग्रेज हो”.
यह कार्य ना ही सरल था और ना ही कम समय का था.
यह कार्य केवल शिक्षण से ही हो सकता था और वो भी अनेक पीढ़ीओं के उत्तरोत्तर मानस परिवर्तन
से ही संभव था. इसका अर्थ यह था की यह अभियान दशकों तक नहीं, सदिओं तक चलने के बाद
ही अपने फल देने वाला था.
आगे मेकोले ने क्या किया? देखेंगे भाग 3 में.
Comments
Post a Comment