भारतीय शिक्षण प्रणालीका इतिहास और उसका अंग्रेजों द्वारा किया गया निकंदन - भाग 5

भाग 5

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अब आर्थिक रूपसे क्षीण हुए, और शैक्षणिक रूपसे दरिद्र हुए भारतियों को केवल पश्चिमी रंगसे रंगनेका काम शेष रह गया था. सन 1836 में जब मेकोले ने कई अंग्रेजी स्कूलों की स्थापना कर दी थी तो वह अपने कार्य के प्रति बहोत उत्साहित था और उसे यह काम बहोत सरल लग रहा था. वो उसी वर्ष अपने पिता को एक पत्रमें लिखता है की....

“हमारी अंग्रेजी स्कूलें धूमधाम से बढ़ रही है; हमें सबको पर्याप्त प्रशिक्षण देना भी कठिन हो रहा है. हिन्दुओं पर हमारे शिक्षण का प्रभाव अत्यंत गहरा हो रहा है. ऐसा कोई हिन्दू नहीं है जो अंग्रेजी शिक्षण लेनेके बाद सही अर्थ में अपने धर्म से जुड़ा रहता है. में यह स्पष्ट रूपसे मानता हु की यदि शिक्षण की हमारी योजनाओं को ठिकसे प्रोत्साहन दिया गया तो आजसे 30 वर्ष बाद एक भी मूर्तिपूजक (हिन्दू) नहीं रहेगा. और यह सब उन्हें इसाई बनानेका कष्ट उठाए बिना ही हो जाएगा; मैं उस दिनके विचार मात्र से अति-उत्साहित हो उठता हूँ.”

इस आत्मविश्वास के साथ हिन्दुओ को हिंदुत्व से पृथक करनेका अभियान मेकोले ने आरम्भ किया था. परंतु क्या यह इतना सरल था? क्या 30 वर्षोमें हिन्दू अपना धर्म त्याग देने वाले थे?

नहीं! हिन्दुओं के धर्म और उनकी परंपराओं के सामने अंग्रेजों की संस्कृति और इसाई मजहब अत्यंत ही तुच्छ थे. क्या किसीको मिटटी देकर उससे उसका सोना ले लेना सरल काम है? हिन्दुओं को हिंदुत्व से पृथक करना इससे भी कठिन काम था. सबसे बड़ी समस्या यह थी की अंग्रेजों की बर्बर संस्कृति के पास ऐसा कुछ भी विशेष नहीं था की जिसका वे हिन्दुओं के समक्ष महात्म्य कर सके. इसी कारण यदि स्वयं की रेखा दूसरों से बड़ी नहीं हो सकती तो सामने वाले की रेखा ही छोटी कर देनेका षडयंत्र रचा गया. हिन्दुओं को, उनके विज्ञानं को, उनकी परंपराओं को अंग्रेजी संस्कृति से अधम दिखानेकी योजना बनाई गई. इसी अभियान के भाग स्वरुप मेकोले ने कहा की....

“भारतमें शिक्षण केवल अंग्रेजी भाषामें ही होना चाहिए क्योंकि भारतीय भाषाओँमें (खास करके संस्कृतमें) अब तक लिखे गए सारे ग्रंथोको भी मिला दिया जाए तो इतना ज्ञान भी नहीं मिलता जितना की अंग्रेजीमें पढ़ रहे तीसरी कक्षा का छात्र ज्ञान रखता है”.

स्पष्ट है की हिन्दुओं को हिन्दू ग्रंथों के प्रति तिरस्कार जगानेका प्रयास किया जा रहा था. इस कार्य को और प्रशश्त करने के लिए मेकोले ने एक जर्मन साहित्यकार “फ्रेडरिक मैक्स मुलर” को भारतमें नौकरी पर रखा. मेक्स मुलर इसाई मिशनरिओं का दूत था इसलिए वह अपना काम विषैले और बैरभाव से कर रहा था. उसने संस्कृत का अभ्यास किया और सारे भारतीय ग्रंथो का अंग्रेजी में अनुवाद करना प्रारंभ किया. मेक्स मुलर के अपने शब्द थे...

“रुग्वेद भारतीय अध्यात्म का मूल है, इसलिए उन्हें मूल परिस्थिति (पिछड़ापन) बताने के लिए पिछेले सहत्रों वर्षोसे जो इस मुलसे उत्पादित हुआ है उसे उखाड़ फैंकना होगा”.

मेक्स मुलर दो वर्षों के पश्चात यह भी कहता है की...

“भारत का पौराणिक धर्म डूब चूका है, इसलिए यदि उसका स्थान इसाई संप्रदाय ना ले ले तो दोष किसका होगा?”

स्पष्ट है की मेक्स मुलर का काम एक ही था, वेद-पूरण इत्यादि ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद करके उसका विकृत अर्थघटन करना जिससे की देश से हिंदुत्व मिट जाए. मेक्स मुलर ने यह काम बड़े ही चाव से किया और भारतीय ग्रंथों के विकृत अर्थघटन वाले पुस्तक देश और विदेशमें धूम-धाम से बिकने लगे. किन्तु इससे वास्तवमें भारतीय संस्कृति से जुड़े हिन्दुओं को अधिकांश रूपसे कोई अंतर नहीं पड़ रहा था क्योंकि हिन्दू संस्कृति परंपराओं से चलती है, धर्मग्रंथों से नहीं!

1857 का विप्लव समाप्त हो चूका था, देशमें ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर अंग्रेजी सेना का शाशन प्रस्थापित हो चूका था. विदेशी प्रशाशन को 50 वर्षों से अधिक समय बिट चूका था परंतु अभी भी भारतीय जनसमुदाय मानसिक रूपसे “अंग्रेज” नहीं हुए थे. अब तक यह बात सिद्ध हो गई थी की मेकोले हिन्दू संस्कृति की सुद्रढ़ता और बहुआयामी श्रेष्ठता को समजनेमें बहोत छोटा सिद्ध हुआ था. वर्षो तक अथाग प्रयास करनेके उपरांत भी उनकी मंशा परिपूर्ण नहीं हो रही थी और हिन्दू अपना हिंदुत्व छोड़ नहीं रहे थे.

उस समय ब्राम्हण ज्ञाति समाज को दिशादर्शन और नैतिक शिक्षण देती थी और सामान्य जन उन्हीकी दी गई धार्मिक शिक्षा वंश परंपराओं के रूपमें पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेषित हो रही थी. इसलिए अंग्रेजों ने ब्राम्हणों का ही मानसपरिवर्तन करनेका प्रयास किया. किन्तु उनके प्रयास वर्षो तक सफल नहीं हुए. ब्राम्हण विदेशी शिक्षण तो सीख गए किन्तु अपना धर्म भूलनेको तैयार नहीं थे.

वर्षो तक किया गया श्रम व्यर्थ हो रहा था. मेकोले का 1859 में देहांत भी हो गया था. अंग्रेजी स्कूलें खोलनेको 60 वर्ष बीत चुके थे किन्तु समाज के दिशादर्शक ब्राम्हण अपने धर्मसे विमुख नहीं हो रहे थे. इसलिए 1866 में इसाई मिशनरियों की भारतमें एक चिंतन शिविर हुई.

इस शिविर में यह निर्णय किया गया की ब्राम्हणों को परिवर्तित करना अत्यंत कठिन है. इसलिए इनको जो बाकि का हिन्दू समाज अपना मार्गदर्शक मानता है, ऐसे समाज को ब्राम्हणों के प्रति भड़काया जाए की जिससे वे ब्राम्हणों की शिक्षा ना लेते हुए, हमारी शिक्षा ले.

क्या अंग्रेजोंकी यह नयी व्यूहरचना कारगर सिद्ध होनेवाली थी? देखेंगे भाग 6 में...

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