भारतीय शिक्षण प्रणालीका इतिहास और उसका अंग्रेजों द्वारा किया गया निकंदन - भाग 6
भाग 6
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समय अंग्रेजों के पक्षमे चल
रहा था. 1830 के समय से जब मेकोले ने अपनी स्खुलें आरंभ की थी तब तक हिन्दूओं के
सारे वर्ण के लोग आर्थिक और सामजिक रूपसे संपन्न और सुखी थे. समाज में शौच के
प्रयोजन के कारण अस्पृश्यता का चलन अवश्य था किन्तु एकदूसरे की कोई इर्षा नहीं
करता था. सारे समाज अपने अपने परंपरागत व्यवसाय करते हुए एक-दुसरे के साथ सहजीवन
व्यतीत कर रहे थे. और जिन्हें अपना वर्ण बदलना था वे सहजतासे बदल लेते थे. परंतु
अब परिस्थिति बदलने वाली थी. 50 वर्ष के अंग्रेज साशनने देश को अत्यंत दरिद्र बना
दिया था. आर्थिक संपदाएं नाश हो रही थी. समाज में आर्थिक हितों के कारण आंतरकलह बढ़
रहा था. इस समय उत्तर भारत के ब्राम्हण समुदाय को मिला हुआ अंग्रेजी शिक्षण काम आ
रहा था. ब्राम्हणों को पद प्राप्त हो रहे थे और आर्थिक परिस्थिति भी सुधर रही थी.
आर्थिक सम्पन्नताके कारण अपने परंपरागत व्यवसाय के उपरांत अब वे प्रशाशनिक,
खेतीबाड़ी और अन्य आर्थिक प्रवृत्तियां भी करने लगे थे जीन व्यवसायों पर परंपरागत
रूपसे अन्य जातिओं का अधिकार था. अन्य वर्ग पिछड़ रहे थे. इसी परिस्थिति का लाभ
अंग्रेजोने उठाया.
अंग्रेजोने हिंदुत्व के
मूलाधार स्वरुप ब्राम्हणों के विरुद्ध अन्य समुदाय को भड्कानेके अभियानका आरंभ कर
दिया. हिन्दू धर्म को केवल ब्राम्हणों का धर्म बताया और कहा की कैसे ब्राम्हण बाकी
के तथाकथित "पिछड़े" वर्ग का शोषण कर रहे है, जब की वास्तविक शोषण
अंग्रेज कर रहे थे.इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने अपने इस अभियान को एक नया और अत्यंत
विषैला आयाम दिया. यह आयाम था साहित्य का आयाम.
समाज में पढ़े लिखे लोग
साहित्यकारों से अत्यंत प्रभावित होते है. इसी परिस्थिति का लाभ उठाकर अंग्रेजों
ने मुंशी प्रेमचंद, रविंद्रनाथ टागोर, मुल्कराज आनंद इत्यादि जैसे साहित्यकारों के
द्वारा, भारत किस प्रकार अत्यंत ही पिछड़ा हुआ है इस विषय में काल्पनिक साहित्य की
रचना करवाई. इनकी साहित्य रचनाओं में भारत का तथाकथित उच्च वर्ग कैसे अन्य वर्गों
से अमानवीय व्यवहार करता है, कैसे अत्याचार करता है, कैसे उनकी स्त्रिओं का शोषण
करता है, इन सब विषयों पर काल्पनिक परिकथा का निरूपण किया. इन साहित्यकारों को बड़े
बड़े अवार्ड दिलवाकर उनकी देशमें बहोत प्रशश्ति करी गई और जो मूल हिन्दू विचारक थे
उन्हें दबा दिया गया. कुछ ही समय के पश्चात यह भ्रान्ति फैलाई गई की साहित्य तो
समाज का दर्पण होता है, इसलिए उसमे जो लिखा है वह सत्य ही होना चाहिए (साहित्य के माध्यम से दुष्प्रचार प्रसारित करनेकी प्रणाली
आज भी उतनी ही प्रशस्त है. और अब उसमे फिल्मों का भी आयाम जुड़ गया है).
पढ़े लिखों का साहित्य के
माध्यम से मानस परिवर्तन हो रहा था तो दूसरी ओर राजा राममोहन राय जैसे अंग्रेजों के पिठ्ठूओंने सामान्य जन के मानस्परिवर्तन का भार संभाला. सती
प्रथा का और जाती व्यवस्था का जूठा निरूपण करके हिन्दुओं को अपने ही धर्म से घृणित
करना आरंभ कर दिया. इन जूठे साहित्यकारों और समाज सेवकों के नाम पर आज भी हिन्दू
सभ्यता को अपमानित किया जाता है और लोगों को भड़काया जाता है.
एक ओर हिन्दू सभ्यता को
कृत्रिम रूपसे कलंकित किया जा रहा था तो दूसरी ओर विदेशी सभ्यताओं का प्रशस्तीकरण
और महिमामंडन हो रहा था. इन विदेशी सभ्यताओं का नाम था इस्लाम, पारसी और ख्रिस्ती.
आगे भाग 7 में
देखेंगे की विदेशी सभ्यताओं की प्रशस्ति अंग्रेजों ने कैसे की...
(मुंशी प्रेमचन्द को बहोत समय बाद यह बात का आत्मबोध हुआ की वे अंग्रेजों के
हथियार बन गए है और यह करनेमें उन्होंने देश को बहोत बड़ी हानि पहोचाई है. तब
उन्होंने अंग्रेजों को उनके द्वारा दिए गए विषयों पर काल्पनिक कथाएँ लिखने से माना
कर दिया. तब अंग्रेजों ने उनसे अत्यंत ही क्रोधित होकर ऐसी परिस्थिति ला कर रख दी
की दरिद्रता और दुत्कार के कारण मुंशी को खाने के लिए एक दाना भी नहीं मिल पा रहा
था. अंत में 1936 में कई दिनों तक भोजन न मिलने के कारण उनकी भूख से मृत्यु हुई.)
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