क्या भारतीय समाज बलात्कारी है? या स्वपीडनवृति से ग्रसित एक मनोरोगी है?

रक्षाबंधन का दिन था. Whatsapp पर भाई बहन के प्यार और संस्कृति के गुणगान गानेवाले मेसेज दिन को भावनात्मक बना रहे थे. और ऐसेमें एक मेसेज कुछ इस प्रकार आ गया...


यह केवल एक मेसेज नहीं था, ऐसे अनेक मेसेज दिनभर आते रहे जिसमें किस प्रकार भारत देशमें महिलाओं का निरंतर उत्पीडन हो रहा है इसके बारेमें हमें "जागृत" किया जा रहा था!

अब स्वाभाविक रूपसे यह प्रश्न होता है की क्या भारतीय समाज इतना नीच और पिशाची है की हमसे हमारे त्योहारों पर भी महिलाओं का सन्मान करने के लिए "जागृत" किये बिना रहा नहीं जाता? क्या हम रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहारों पर भी अपने आपको लज्जित किये बिना नहीं रह सकते?

हमारे इस व्यवहार के केवल दो ही कारण हो सकते है...

1. या तो हम एक निर्लज्ज बलात्कारी समाज है जिसे रोज रोज बलात्कार न करने के लिए समजाना पड़ रहा है.

2. या तो हमारा समाज स्वपीडनवृति से ग्रसित है इसलिए हमें स्व-आलोचना में ही आनंद आता है.

अब हम थोडा जमीनी वास्तविकता पर द्रश्तिपात करते है....

विविध देशों के अनेक विषयों के सर्वेक्षण और उनकी तुलना करने वाली एक आंतरराष्ट्रीय संस्थाने विश्व में हो रहे बलात्कारों के विषय पर एक सर्वेक्षण किया है जिसको आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते है

इस सर्वेक्षण के अनुसार प्रति व्यक्ति हो रहे बलात्कारों की संख्या में भारत 119 देशोंमें से  94वे क्रम पर है. यदि थोडा और निरिक्षण किया जाए तो 95 और 119 के बिच अधिकतर ऐसे देश है जहां बलात्कार की व्याख्या ही ऐसी है की बलात्कार का आरोप लगना ही अत्यंत दुष्कर है. यह स्पष्ट रूपसे दर्शाता है की भारत बलात्कारों के विषयमें तो विश्व के सर्वाधिक सुरक्षित देशोमें से एक है.

बात यहीं समाप्त नहीं होती, अपितु यहिंसे आरंभ होती है! हमें यह समजना चाहिए की भारत स्त्रिओं के लिए क्यों इतना सुरक्षित है...

अधिकांश यह देखा गया है की जब भी स्त्रिओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों की बात आती है तब नारीवादी संस्थाएं "स्त्रिओं के अधिकारों" का जंडा लेकर निकल पड़ती है और स्त्रिओं के लिए अधिक से अधिक "अधिकार" मांगती रहती है. परंतु यह लोग ये नहीं समजा पाते की विश्वमें सबसे अधिक अधिकार रखने वाली भारतीय नारियों के भी बलात्कार क्यों हो रहे है? जी हां, आप सही पढ़ रहे है. भारतकी स्त्रिओं के पास विश्वमें सबसे अधिक सशक्त अधिकार उपलब्ध है. तो फिर यह नारीवादी संस्थाएं और अधिक अधिकार मांगकर क्या करेगी?

अब थोडा हम इन दंभी नारीवादियों के द्वारा दिए जानेवाले तर्कों पर भी द्रश्तिपात करते है....

"हमें माता या बहन का सन्मान नहीं चाहिए, हमें केवल एक स्त्री होनेका अधिकार ही दे दो"

"हमें देवी बनाकर पुजनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, हमें केवल एक स्त्री बने रहने दो तो भी बहोत है"

इत्यादि...

यह लोग मूलतः भारतीय परंपरा में स्त्रिओं को दिए जाने वाले सन्मान को ठुकरा रहे है, और पश्चिमी देशों द्वारा निर्मित "अधिकार केंद्री समाज" की मांग कर रहे है. परंतु यह लोग इस बात का उत्तर नहीं दे पाते की यदि यह अधिकार केंद्री समाज स्त्रिओं के लिए इतना ही सुरक्षित है तो फिर क्यों वहांपर अत्यधिक बलात्कार हो रहे है? इस बात का उत्तर अंग्रेजीमें पढ़े लिखे यह लोग नहीं दे पायेंगे. इसलिए इसका उत्तर मैं देता हूं...

कोई भी अपराधी और विशेष रूपसे एक बलात्कारी जब बलात्कार करने जाता है तब स्त्रिओं के "अधिकारों" का विचार नहीं करता. उसके ऊपर काम सवार होता है. वो परिणाम की चिंता नहीं करता. संविधान चाहे कितना ही सशक्त क्यों ना हो, एक बलात्कारी को कभी नहीं रोक सकता. 

तो फिर इस समस्या का समाधान क्या है?

अरे भाई, समाधान हिन्दू समाजमें सहत्रों वर्षोंसे अंतर्गत है! समाधान यह है की पहलेसे समाजमें ऐसे संस्कार ही दिए जाएं की बड़ा होनेके बाद एक युवक सदैव स्त्रिओं के प्रति सन्मान की द्रष्टि से देखे, ना की एक उपभोग की वस्तु की दृष्टि से. काम वासना प्रत्येक मनुष्यमें होती है और इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है. परन्तु काम वासना की अंधतामें पुरुष कभी भी स्त्रिओं के शिल का हनन करनेकी कभी ना सोचे यह सुनिश्चित करने के लिए उसे ऐसे संस्कार देना आवश्यक है. यही कारण है की परनारी को माता या बहन की दृष्टि से देखनेके संस्कार दिए जाते है, स्त्रिओंमें देवियों के दर्शन किये जाते है. बालपन से यही सीखा हुआ व्यक्ति यदि परनारी में अपनी माता या बहन ना भी देखे, तो भी उसका बलात्कार करनेकी तो कभी नहीं सोचेगा.

आज हम देखते है की छोटी छोटी बालिकाओं के बलात्कारों के मामले दीन प्रतिदीन बढ़ रहे है. ऐसा क्यों हो रहा है? वो इसलिए हो रहा है क्योंकि हम कुमारिकाओं में देवी के दर्शन करना भूल गए है. उत्सवोमें कुमारिओं को जिमाना और उसकी पूजा करना, कुमरिओं के हाथोंसे ही सदैव शुभ कार्य का आरम्भ करना, कुमारिकाओं के आशीर्वादों को अत्यंत ही शुभ समजना... इत्यादि व्यवस्थाएं यही सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है जिससे की निर्बल और भोली कुमारिकाओं के ऊपर कुदृष्टि करनेसे वयस्क पुरुष बचे रहें. परन्तु पश्चिमी देशोमें यह व्यवस्था ना होनेके कारण वहाँपर अत्यधिक रूपसे कुमारिकाओं के बलात्कार हो रहे है, जिसका अनुकरण अब हमारा "पढ़ा-लिखा" समाज भी करने लगा है.

अब हम एक और द्रश्य देख लेते है...

वर्ष 2012 का है और पूरा भारत देश एक महीने तक थम गया है, सडको पर आ गया है. किसलिए? दिल्ली में हुई एक बलात्कार और हत्या की घटना के विरोध में (निर्भया काण्ड)! अब ऐसा तो नहीं है की अन्य देशोंमे बलात्कार नहीं होते. परंतु वहांपर तो कोई इस बात को लक्ष्य नहीं देता. ऐसा क्यों है?

इसका कारण यह है की पश्चिमी संस्कृति में स्त्रियाँ अपने अधिकार के लिए लडती है. और भारतीय स्त्रियाँ अपने सन्मान के लिए लडती है. इसलिए पश्चिमी पीडिता स्त्री बलात्कार को केवल उसके "अधिकार का हनन" समजकर दुसरे ही दिनसे अपने दैनिक कार्योंमें व्यस्त हो सकती है, परन्तु एक भारतीय स्त्री अपने ऊपर हुए बलात्कार को "शील हनन" और "सन्मान हनन" समजकर जीवनभर उस घाव से उभर नहीं पाती.

जहातक उत्तरदायित्व का प्रश्न है, पश्चिमी संस्कृति ने स्त्रियों की रक्षा का पूरा उत्तरदायित्व संविधान पर छोड़ रखा है. जबकि भारतीय संस्कृति में सहत्रों वर्षो से स्त्रिओं के सन्मान का दायित्व पुरुषों के कंधो पर है. किसी भी समाज में संविधान देश के नागरिकों के सहयोग के बिना कोई काम नहीं कर सकता. इसलिए यह बहोत ही महत्वपूर्ण है की देश के नागरिकों को बचपन से ही सही शिक्षा और संस्कार मिले. भारतीय पुरुषों को बचपन से ही स्त्रिओं की रक्षा करनेके संस्कार मिलते है, और यही संस्कार है जो हमें एक महीने तक निर्भया के समर्थन में सड़क पर खिंच कर ले जाते है.

परंतु प्रत्येक सिक्के के दो पहलु होते है. भारतीय समाज स्त्रिओं का सन्मान करनेके लिए प्रतिबद्ध होनेके कारण कभी कभी इन पश्चिमी वादियों की मीठी मीठी बातोमें आकर अपने आपको लज्जित करनेके लिए सदैव तत्पर हो जाता है. यही कारण है की हम देशमें हो रहे बलात्कारों के लिए अपने आपको लज्जित करनेका एक भी अवसर नहीं छोड़ते है. फिर चाहे वो दिवाली का त्यौहार हो या रक्षाबंधन, हमें अपने आपको यह बताना अनिवार्य हो जाता है की हमारा समाज एक बलात्कारी समाज है. यह जाग्रति नहीं है, यह स्वपीडनवृति है... यह एक मनोरोग है.

मेरे विचारसे हमें आवश्यकता पड्नेपर विरोध प्रदर्शित करना चाहिए पर साथ ही साथ ऐसी घटना बनने के मूल कारण को भी चिन्हित करना चाहिए. हमारी संस्कृतिसे गौरवान्वित होकर हमें अपनी भव्य धरोहर को आगे बढानेका काम करना चाहिए, और हमारी आने वाली पीढ़ीओं में सच्चे संस्कार का सिंचन करना चाहिए.

यदि इतना हम न कर पाएं तो मेरी इस लेख के सारे पाठकों से बिनती है की कमसे कम हिन्दू त्योहारों पर हिन्दुओं को अपमानित करना बंध करें. 

धन्यवाद.

*माननीय श्री एस गुरुमूर्तिजी के लेखों से प्रेरित 

Comments

Recent Posts

Popular posts from this blog

जवाहरलाल नेहरु के 26 गुनाह - 26 Crimes of Jawaharlal Nehru

रावण की असली लंका कहाँ है? श्रीलंका या सुमात्रा?