गरबा नृत्य की उत्पति और रहस्य

नवरात्री पर्व के अवसर पर सभी को जय अंबे 🙏

गरबा तो लगभग सभी खेलते हैं, लेकिन इसकी उत्पत्ति के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। तो आइए देखें कि गरबे की उत्पत्ति कैसे हुई।

गरबा क्या है?

गरबा शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के "गर्भ दीप" शब्द से हुई है। हमारे शरीर में जीवात्मा रहती है जो विभिन्न इंद्रियों के द्वारा बाह्य जगत के लिए प्रकाशित होती है। उसी तरह गरबा एक अनेक छेदों वाली गोल मटकी होती है, जिसके अंदर दीया जलाया हुआ होता है। इस दीये का प्रकाश छेदों के द्वारा बाहर फैलता है। यदि ये छेद न हों तो प्रकाश बाहर नहीं फैलेगा, और यदि अंदर दीप प्रज्वलित न हो तो भी प्रकाश नहीं फैलेगा। इस प्रकार गरबा हमारे शरीर और अंतःकरण का प्रतीक है।

इस गरबे को लेकर माताजी के विग्रह के चारों ओर एक वृत्त में घूमकर नृत्य किया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अनेक जन्मों तक इस संसार में चक्कर लगाता रहता है, और इस संसार की धुरी, इसका केंद्रबिंदु, यही आद्यशक्ति अंबे माता हैं।

गरबा रात में ही क्यों खेला जाता है?

हमारी संस्कृति में कई ऐसे त्योहार हैं जो रात्रि-प्रधान हैं। जैसे शिवरात्रि, दिवाली, कृष्ण जन्माष्टमी और नवरात्री। इन दिनों में रात्रि का समय उपासना के लिए बहुत जागृत समय होता है। इन रातों में की गई उपासना अनेक गुना फल देने वाली होती है। इन रात्रियों में जागरण करना भी एक पुण्य का काम है। इसलिए ये सभी त्योहार रात में ही मनाए जाते हैं। लेकिन जो गंभीर उपासक हैं, उन्हें इस समय बहिर्मुख होने के बनस्पत अंतर्मुखी होकर अपने इष्ट की उपासना करनी चाहिए।

गरबा नृत्य की उत्पत्ति

आम तौर पर भारत के हर प्रांत में किसी-न-किसी प्रकार के लोकनृत्य की परंपरा रही ही है। जैसे हमारी संस्कृति सनातन है, उसका कोई उत्पत्तिकाल नहीं है, वैसे ही ये नृत्य भी अनादि काल से चले आ रहे हैं, इसलिए इनका कोई निश्चित उत्पत्तिकाल नहीं है। फिर भी गरबा नृत्य के विभिन्न स्वरूप किन-किन पौराणिक घटनाओं से जुड़े हैं, यह अवश्य कहा जा सकता है।

श्री कृष्ण और गोपियों की रासलीला से संबंध

गरबा नृत्यमें जब कोई एक नृत्यकर्ताओं की टुकड़ी वृत्ताकार में घूमकर किसी निश्चित शैली में नृत्य करती है, तब उसे एक "रास" किया गया कहा जाता है। जब टुकड़ी या शैली बदल जाती है तब दूसरा रास शुरू हो जाता है। क्या "रास" शब्द से कोई बात याद आई? हां। श्री कृष्ण और गोपियों ने जो नृत्य लीला की थी वह भी रास थी। इसलिए आज की गरबा शैली में गोपी-कृष्ण के रास की एक गहरी छाप देखने को मिलती है।

माता महिषासुरमर्दिनी से संबंध

नवरात्री शक्ति की आराधना का समय है। शक्ति के प्रतीक माता महिषासुरमर्दिनी की बहिर्मुखी उपासना के लिए महिषासुर के साथ हुए उस युद्ध का निरूपण करने वाला नृत्य करने की परंपरा बनी। पुरुष खड्ग और ढाल लेकर नृत्य करते हैं और स्त्रियां शस्त्रों के प्रतीक दांडिया (छोटी लकड़ी) से दो-दो की जोड़ी बनाकर मानो युद्ध करते हुए नृत्य करती हैं। इस प्रकार के नृत्य को हम दांडिया नृत्य कहते हैं।

शिव के तांडव और पार्वती माता के लास्य नृत्य से संबंध

शिवजी ने जब रौद्र स्वरूप धारण करके तांडव नृत्य किया तब सृष्टि में भय व्याप्त हो गया और आक्रंद होने लगा। इस समय सृष्टि को शांति और शीतलता देने के लिए माता पार्वती ने शिवजी को रिझाने के लिए "लास्य नृत्य" किया। यह नृत्य सुंदर अंगभंगिमाओं और आह्लादक छटा के साथ किया गया, जिससे शिवजी भी शांत हुए और पूरी सृष्टि को भी शांति मिली।

बाणासुर की पुत्री उषा ने इस नृत्य की कला माता पार्वती से प्राप्त की थी। जब उषा का विवाह श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ हुआ तब उषा देवी द्वारिका आईं। गुजरात में गरबा रास की परंपरा तो पहले से ही थी। ऐसी मान्यता है कि उषा देवी ने गुजरात की स्त्रियों को लास्य नृत्य भी सिखाया, इसलिए गरबे रास में लास्य नृत्य की सुंदर अंगभंगिमाओं का भी समावेश हुआ।

इस प्रकार पुरुषों द्वारा शिव के प्रतीक रूपी उग्र नृत्य और स्त्रियों द्वारा सुंदर लास्य नृत्य, दांडिया रास और इष्टदेव की आराधना का सुभग संगम हुआ। समय के साथ रास के प्रकारों में वृद्धि होती गई।

गरबे का आधुनिक स्वरूप

वर्तमान समय में गरबा रास का जो स्वरूप हम देख रहे हैं वह निर्लज्ज व्यवसायीकरण का परिणाम है। उच्छृंखलता, अंगप्रदर्शन और यौन वृत्ति नवरात्री की छाप बन गए हैं। गरबा रास एक वृत्त में बीच में अंबा माता को रखकर घूमने का नृत्य है। जबकि आज लोग अपने चप्पल और पानी की बोतल रखकर घूमते हैं। आज से मात्र 30 वर्ष पहले तक घर-घर में गरबा रखकर रोज दो समय माता के गरबा गीत गाने की प्रथा थी। आज डिस्को दांडिया में गरबा कहां पड़ा है, यह भी किसी को पता नहीं होता।

ऐसे समय में युवाओं के लिए गरबे का मूल स्वरूप और उसका प्रयोजन समझना बहुत आवश्यक है। आशा है कि इस लेख के द्वारा किसी-न-किसी को तो प्रेरणा मिलेगी और इस अत्यंत पवित्र समय का सदुपयोग करके अपना कल्याण करेंगे।

जय अंबे 🙏

Comments

Recent Posts

Popular posts from this blog

जवाहरलाल नेहरु के 26 गुनाह - 26 Crimes of Jawaharlal Nehru

रावण की असली लंका कहाँ है? श्रीलंका या सुमात्रा?