हिन्दुओं की घटती जनसँख्या का उपाय यदि कानून या सामाजिक जागृति से नहीं हो सकता, तो कैसे हो सकता है? - भाग 2
इस भागमें हम देखेंगे की हिन्दुओं की जनसँख्या की समस्या कितनी बड़ी है, क्यों यह समस्या है, और उसका उपाय क्या है.
हमने इस लेख श्रेणी के भाग 1 में देखा की अधिक जनसँख्या कोई समस्या नहीं है, परंतु कम जनसँख्या अवश्य ही एक बहोत बड़ी समस्या है. अब आप कल्पना करीए की यदि भारतमें ही हिन्दुओंकी संख्या कम हो गई तो परिणाम क्या हो सकता है!
क्यों हिन्दुओं के जन्मदर को बढ़ाना अतिआवश्यक है?
भारतमें वर्तमान स्थिति के अनुसार 8 राज्य और 5 केन्द्र्साषित प्रदेश पहलेसे हिन्दू अल्पसंख्यक है. 8 राज्योंमेंसे 4 ऐसे राज्य है जहाँपर हिन्दू अब 10% से भी कम रह गए है.
वर्ष 2011 में देशव्यापी जनगणना हुई. इस जनगणना के अनुसार हिन्दुओं का जन्मदर 2001 की तुलनामें 2.64 से घटकर 1.9 हो चूका है. इसका अर्थ है की एक हिन्दू जोड़ा उनके जीवनकालमें 2 से भी कम वच्चों को जन्म दे रहे है, इसका स्वाभाविक अर्थ है की हिन्दुओं की संख्या प्रतिदिन घट रही है. और यह तो 2011 की जनगणना के आंकड़े है, अब तक यह जन्मदर उससे भी कम हो चूका होगा ऐसा हम मानकर चल सकते है.
इससे विपरीत मुस्लिम और इसाई की जनसँख्या बढ़ रही है. मुस्लिमों का जन्मदर 2001 के 3.52 से थोडासा घटकर 3.14 हुआ है. अर्थात मुस्लिम जोड़े पहलेसे हिन्दुओंसे कही आगे थे और 10 सालमें उनकी सोचमें हिन्दुओं की तुलनामें कोई खास अंतर भी नहीं पड़ा. ईसाईयों का जन्मदर भी 2011 में प्रति जोड़ा 2.3 का रहा है. इसका अर्थ है की आनेवाले दशकोमें हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाने वाले है.
याद रहे, भारत देश कोई भूमि का टुकड़ा नहीं है, यह विश्वकी सबसे पुरानी और सबसे उच्च सभ्यता है. भारतने विश्वको बर्बरतायुक्त जीवन को छोड़कर सुसंस्कृत और अर्थपूर्ण जीवन जीना सिखाया है. और यह सब संभव हुआ है केवल और केवल हिन्दू संस्कृति के कारण. यदि हिन्दू नहीं रहेंगे तो यह देश भी नहीं रहेगा, यह बात हमको निःसंशय समज लेनी चाहिए.
हिन्दुओं के जन्मदर के ना बढ़ानेसे क्या परिणाम आ सकते है?
कुछ समय के लिए हम हिन्दू और अहिंदू के बिच सांस्कृतिक टकराव की बात भूल जाते है और यह सोचते है की वर्तमानमें घटे हुए जन्मदरके सामाजिक परिणाम क्या हो सकते है.
हम जानते है की आजकल केवल एक ही संतान उत्पन्न करनेकी जैसे फेशन चल पड़ी है. जिसे देखो, केवल एक ही संतान से प्रसन्न है. पर क्या कभी इस बात का विचार किया है की इस पागलपन के क्या परिणाम आ सकते है?
चलिए कल्पना करते है की आजसे तिन पीढ़ी तक सभी हिन्दू केवल एक ही संतान उत्पन्न करते है. तो आप कल्पना करीए की आजसे तिन पीढ़ी के बादका समाज कैसा होगा?
उस समाजमें न किसीका कोई भाई होगा, न बहन, न चाचा-चाची, न मामा-मामी, न फूफा-फूफी, न मासा-मौसी, न चचेरे-मौसेरे भाई बहन.... कौनसी बहन किस भाई को राखी बांधेगी? यदि किसीको अपने मानकी बात करनी है तो वो किसके साथ करेगा? दोस्तों के व्यवहार की अपनी एक सीमा होती है. ऐसे समयमें मानसिक रोग अनेक गुना बढ़ जाएँगे.
इतना ही नहीं, सभीकी एक ही संतान होनेके कारण प्रत्येक घरमें बुढ्ढे अधिक और युवा कम होंगे. पत्नी के मातापिता को रखनेका दायित्व भी पति के ऊपर ही रहेगा, क्योंकि वो भी तो उनकी एकमात्र संतान होंगी. और फिर वो दोनों पति-पत्नी के मातापिता भी तो अकेले ही संतान होंगे! उनके ऊपर भी अपने माता-पिता व् सास-ससुर को रखनेका दायित्व होगा. यदि यह मान लिया जाए की किसी एक घरमें 3 पीढ़ी रह रही है (जो की पुर्णतः संभव है) तो इस हिसाबसे एक घरमें एक युवा जोड़े के ऊपर 12 बुढ्ढे, एक उनकी, अपने संतान, और वे स्वयं 2 - अर्थात 15 व्यक्ति के पालन-पोषण का दायित्व आ जाएगा. इस परिस्थितिमें दोनों युवा जोड़े कभी व्यवसाय नहीं कर सकते. एक को घर संभालना ही पड़ेगा. इसका अर्थ है की केवल एक कमाने वाले के ऊपर 15 व्यक्तिओं का बोज़! और यदि उस एक व्यक्ति को कुछ हो गया तो सारा का सारा परिवार ही अनाथ हो जाएगा! कितनी भयंकर है यह कल्पना!
मेरे अनुसार तो ऐसे समाजमें अत्यधिक मानसिक रोग और आत्महत्याएँ होने लगेंगी. और फिर ऐसा समाज जब अपनी ही समस्याओं से ऊपर नहीं उठ पाएगा तो क्या वो देश, समाज और संस्कृति के लिए कुछ भी कर पाएगा?
और इससे विपरीत होगा अहिंदू समाज, जो की अपने घर परिवार के बल पर मानसिक-शारीरिक-आर्थिक रूपसे अधिक शक्तिशाली होगा. बड़े बड़े उद्योग-व्यवसाय ही वही कर पायेगा क्योंकि व्यवसाय करनेमें घरके विश्वासपात्र लोगोंका होना अतिआवश्यक है. और इस स्थिति में हिन्दू युवक-युवती बेचारे दिन-हिन् स्थितिमें उनके उद्योगोंमें परिचारक का काम करेंगे.
हिन्दुओं का जन्मदर क्यों घट रहा है?
इस प्रश्नके उत्तरमें लोग कई अलग अलग तर्क देते है. आइए इन सभी तर्कों की हम जाँच करते है.
महंगाई बढ़ गई है!
यह सर्वसामान्य तर्क है. पर क्या यह तर्क वास्तविकता के साथ मेल खाता है? जी नहीं. यदि यह तर्क सही होता तो दरिद्र लोगों के कम बच्चे होते और संपन्न परिवारों के अधिक. पर परिस्थिति बिलकुल विपरीत है. जिनके परिवार अतिसंपन्न है उनको भी केवल एक ही संतान होना अभी सर्वसामान्य बात हो चुकी है.
सच्चाई यह है की आजके युवा अपने सुखमय और विलासी जीवन के लिए एक से अधिक बच्चे करना नहीं चाहते.
एक से अधिक बच्चे संभालना कठिन है!
यह तर्क भी वास्तविकता से विपरीत है. बच्चा जब अकेला होता है तब उसे संभालना अधिक कठिन होता है, बनस्पत एक से अधिक बच्चे होनेके. बच्चे एकदूसरे को देखकर ही सीखते है. जब उनके आसपास दुसरे बच्चे सिखाने के लिए नहीं होते तब यह सारा भार बड़ों पर आ जाता है, और बच्चे बड़ों से इतनी सहजतासे नहीं सीखते जितना वे समायु बच्चों से सीखते है. वास्तवमें तो जितने अधिक बच्चे होते है उतना ही सरल होता है उन्हें बड़ा करना और घर संभालना.
अधिक बच्चे जनने से स्त्रियों का शारीर कमजोर पड़ जाता है!
यहां मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा की केवल एक बच्चा करनेके लिए विवश करनेका काम अधिकतर स्त्रियाँ ही करती है. उनके पास ढेर सरे बहनों की सूचि होती है, जिसमेसे यह एक मुख्य बहाना है (इस लेख की महिला पाठक इस विषयमें मुझसे विवाद करना चाहे तो कर सकती है).
यह तर्क उन स्त्रियों के लिए सही है जिनकी प्रसूति 30 वर्ष या उससे ऊपर होती है. यदि इससे कम आयु में प्रसूति हो जाए तो समस्याएँ नहीं होती.
तो जैसा हमने देखा, की उपरोक्त सभी तर्क केवल बहाने है. वास्तविक समस्या नहीं है. हिन्दुओं के जन्मदर के घटनेका कारण कुछ और है.
तो फिर जन्मदर घटनेका वस्तविक कारण क्या है?
हिन्दुओं के जन्मदर के घटनेका वास्तविक कारण है विवाह की आयु का बढ़ जाना, और एक विलासी विवाहित जीवन जीनेकी लालसा का बढ़ जाना. एक स्त्री का सर्वाधिक प्रजननक्षम समय होता है 18 वर्ष से 35 वर्ष की आयु. 35 वर्ष के बाद स्त्रियों को अनेक समस्याएँ होती है. अर्थात एक स्त्री के लिए उसके जीवन के केवल 17 वर्ष ही उपयुक्त होते है प्रजनन के लिए. हमारा समाज इसमेंसे कितने वर्ष का उपयोग करता है? अधिकतर केवल 5 से 7 वर्ष.
आजकल विवाह की आयु पुरुष के लिए 28 से 30 वर्ष की हो गई है, और कन्याओं के लिए 26 से 28. और फिर विवाह के उपरांत कुछ समय तक वैवाहिक जीवन का आनंद लेनेकी सबको कामना होती है, और वह स्वाभाविक भी है. पर इससे समस्या यह हो जाती है की स्त्री के पास केवल 3-4 वर्ष ही बच जाते है संतान प्राप्ति के लिए. अब ऐसी परिस्थितिमें घर घरमें एक ही संतान का होना स्वाभाविक ही है.
यही करण है की मुस्लिम प्रजा सदैव शीघ्रातिशीघ्र विवाह करनेका आग्रह रखती है.
तो फिर इस समस्या का उपाय क्या है?
प्रायः सरकार के द्वारा जनसँख्या नियंत्रण कानून लानेकी चर्चा हो रही है. तर्क यह दिया जा रहा है की यदि हिन्दुओं की जनसँख्या नहीं बढ़ती तो कमसे कम इस कानून से अहिंदुओं की संख्या नियंत्रणमें रहेगी. पर क्या ऐसा वास्तवमें होगा? जी नहीं!
भारतमें हमारा अनुभव रहा है की सारे नियम-कानून हिन्दुओं पर ही लागु होते है. इस कानून के लानेसे हिन्दुओं को एक और बहाना मिल जाएगा और वे सहर्ष इस नियम का पालन करेंगे, और जो हिन्दू 2 से अधिक बच्चे जन भी रहे है वे भी नहीं जनेंगे. पर अहिंदू प्रजा पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.
समस्या यह है की ऐसा कानून यदि आ भी जाता है तो अहिंदू प्रजा के ऊपर इसका पालन कौन करवाएगा? मस्जिदों पर लाऊड स्पीकर ना लगानेका आदेश स्वयं उच्चतम न्यायलय दे चूका है. फिरभी लाऊड स्पीकर तो चल ही रहे है ना? कुछ लोग कहते है की 2 से अधिक बच्चे वालों के मताधिकार छीन लेने चाहिए. परंतु भारतमें तो बंगलादेशी घुसपैठियों को भी मताधिकार मिल जाता है. तो इन अधिक बच्चे वालोंको कौन रोकेगा?
इसका अर्थ है की इस समस्या का समाधान नियम-कानून में नहीं है. किसी न किसी प्रकार से हिन्दुओं का जन्मदर ही बढ़ाना होगा. पर कैसे? हिन्दू समाज किसीके समजाने से समजने वाला समाज तो है नहीं. यदि होता, तो आज जो समस्याएँ हम जेल रहे है वो नहीं जेल रहे होते.
तो फिर समाधान क्या है?
इस समस्या का समाधान भारत की शिक्षण निति में छुपा हुआ है!
वर्तमान में विद्यार्थियों के विद्याभ्यास का ढांचा ऐसा है की यदि कुछ ठीकठाक पढना हो तो कमसे कम मास्टर डिग्री तो करनी ही पड़ती है. और मास्टर डिग्री कमसे कम 24 वर्ष की आयुमें ही प्राप्त हो सकती है. यदि इससे और आगे पढना चाहे तो और अधिक आयु बढ़ जाती है. इसके उपरांत पुरुष को अपनी कारकिर्दगी व् व्यवसाय का गठन करना होता है, जिसमें सहजतासे 5 वर्ष तक का समय और लग जाता है. कन्याएं भी 24 वर्ष तक पढ़कर सीधा विवाह करनेमें कोई समजदारी नहीं समजती. उसे भी अपनी पढाई के अनुसार जीवनमें कुछ प्राप्त करना होता है. तो अब इससे स्वाभाविक ही है की विवाह की आयु दोनों के लिए 30 वर्ष के आसपास ही आ जानी है.
इसका उपाय क्या है? इसका उपाय यह है की शिक्षा निति बदलकर ऐसा प्रावधान किया जाए की 21 वर्ष की आयु पर स्नातक होनेके बाद सीधा सीधा कोई अनुस्नातक होनेके लिए प्रवेश नहीं पा सकता. अनुस्नातक होने के लिए विद्यार्थी को कमसे कम 3 वर्ष का क्षेत्रीय अनुभव होना आवश्यक हो जाए. इससे लाभ यह होगा की युवक-युवती अपनी कारकिर्दगी का गठन 3 वर्ष पहले करने लगेंगे और यदि आवश्यक है तो ही अनुस्नातक के लिए प्रवेश लेंगे. और उनके पास विवाह के पश्चात भी अनुस्नातक होनेका विकल्प रहता है.
पर क्या इससे शिक्षण की हानी नहीं होगी?
जी नहीं. इससे शिक्षण का भी केवल लाभ ही होगा. आजके समयमें यदि उद्योगकारों से पूछा जाए की उनकी सबसे बड़ी समस्या क्या है, तो उनका कहना है की उन्हें विश्वविद्यालयों से जैसे कौशल वाले लोग चाहिए वैसे मिल ही नहीं रहे. उन्हें उनके ऊपर 2-3 वर्ष तक निवेश करना पड़ता है जिससे की वे उस क्षेत्रमें काम करने के योग्य बन पाएं. तो यदि अनुस्नातक बनकर भी 3 वर्ष क्षेत्रप्रशिक्षण (field experience) ही लेना है तो क्यों न स्नातक स्तर से ही लिया जाए? और जब एक विद्यार्थी क्षेत्रप्रशिक्षण लेकर अनुस्नातक की पढाई करेगा तो उसका पढनेका द्रष्टिकोण ही बदल गया होगा.
युवावस्था मनुष्य की श्रेष्ठ अवस्था होती है. इस श्रेष्ठ अवस्था का श्रेष्ठ उपयोग वास्तविक धरातल पर होना चाहिए, ना की अर्थहीन पुस्तकों पर.
विश्व की जितनी भी बड़ी सत्ताएँ है वे सदैव विद्यालयों से अधिक क्षेत्रीय अनुभव पर ही विशेष ध्यान केन्द्रित करती है. भारतके लिए भी यही उचित है की अपने विद्यार्थिओं को अपनी युवावस्था का श्रेष्ठतम उपयोग करनेके लिए अवसर दे जिससे की वे अपने वैवाहिक जीवन और कारकिर्दगी का उचित संतुलन बनाकर एक अर्थपूर्ण जीवन जी सकें.
धन्यवाद!
🙏🙏
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