क्या वास्तव में हिन्दुओं के इतिहास में बहुपत्नी प्रथा थी? क्या राजाओं की अनेक पत्नियां बहुपत्नी प्रथा के कारण थी?

प्रायः आपने हिन्दू विरोधी मानसिकता वाले लोगों को ऐसी टिपण्णी करते देखा होगा की यदि मुस्लिमो में चार-चार पत्नी करने का आदेश है, तो हिन्दुओं में भी पुरातन काल के प्रत्येक राजा एक से अधिक पत्नियां रखते ही थे. तो बहुपत्नी प्रथा तो हिन्दुओं में भी थी. तो किस मुँह से अन्य मजहबों की टिका कर रहे हो? बात सुनाने में तारिक और सच्ची लगती है, इसलिए हमारे पास कोई उत्तर नहीं होता। परंतु वास्तव में ऐसा है नहीं! हिन्दुओं में अकारण ही एक से अधिक पत्नी करना वर्जित है. कुछ अपवाद स्थिति में अनुमति है, पर उन अपवादों को हम आगे देखेंगे।

सर्वप्रथम तो मैं मुस्लिम बहुपत्नीत्व और हिन्दू विवाह व्यवस्था की तुलना की ही कठोर भर्तसना करता हु. क्या आप जानते है की 'शादी' एक मूल फ़ारसी शब्द है,और इसका अर्थ होता है 'विलास'. और सीधी सादी भाषा में कहें तो 'मौज'! और इस्लामी सभ्यता में शादी करनेका अर्थ है एक 'अनुबंध' (contract) करना। इसका अर्थ यह हुआ की शादी करनेका अर्थ है 'मौज करनेका कॉन्ट्रैक्ट' करना। इस्लाम में शादी की कल्पना केवल पुरुष के शारीरिक सुख के लिए ही की गई है, और यह अनुबंध कभी भी टूट सकता है. एक वर्ष में भी, और एक दिन में भी टूट सकता है! आज के इस आधुनिक युग में भी सीरिया, जॉर्डन, लेबनॉन, यमन इत्यादि देशो में युद्ध विस्थापित लोगों की बेटियों के साथ वहां के धनिक लोग एक-एक रात के लिए 'शादी' करते है. भारतीय, पाकिस्तानी, और बांग्लादेशी मुलिम अरबी शेखों को शादी करने के लिए अपनी छोटी-छोटी बेटियां बेचते है. और 'शादी' की कल्पना मात्र शारीरिक सुख के साथ ही जुडी होने के कारण मुस्लिमो में तलाक लेने की प्रक्रिया भी अत्यंत सरल है. केवल तीन बार 'तलाक' कहनेसे तलाक हो जाते है. तो ऐसा समाज भोग विलास के लिए एक से अधिक शादी का अनुमोदन करे, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

क्या यह जंगली प्रणाली की तुलना हिन्दू विवाह संस्था के साथ की जा सकती है? हिन्दुओं में तो विवाह केवल एक जन्म नहीं, अपितु जन्मजन्मांतर का संबंध है. हिन्दू शास्त्रों ने गृहस्थाश्रम में रहकर, स्त्री-पुरुष साथ मिलकर धर्ममय जीवन जी कर कैसे अपना और अपने साथी का कल्याण किया जाए, और मृत्यु के बाद भी उनकी ऊर्ध्वगति कैसे हो, इन विषयों पर बड़ी गहराई से उपदेश दिए है. हिन्दू विवाह दो स्त्री-पुरुष के शरीर के बिच नहीं, अपितु दो जोवात्माओं के बिच, दो परिवारों के बिच का सम्बन्ध है. इसलिए जो कोई व्यक्ति हिन्दू और मुस्लिम विवाह संस्थाओं की तुलना करता है वह एक महामूर्ख और घोर अज्ञानी व्यक्ति है.

उदहारण के लिए, समग्र मानवजाति का असली संविधान, जिसे हम मनुस्मृति के नाम से जानते है, उसमें मनु भगवान पति-पत्नि के सम्बन्ध के विषय में कुछ ऐसा कहते है.

अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिकः। एषः धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः॥ (9.101)    
 तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ। यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तौ इतरेतरम्॥ (102)

भावार्थ: (इस विषय में बहोत सी बाते बताने के बाद) संक्षेप में, पति और पत्नी का प्रमुख धर्म यही है की दोनों सदा ऐसा प्रयत्न करते रहें की दोनों ही जीवनपर्यन्त (एकदूसरे के प्रति) मर्यादा का उल्लंघन ना करें, और पार्थक्य (तलाक) ना हो.

इसके अतिरिक्त अथर्व वेद में पति-पत्नी के मधुर और अटूट सम्बन्ध बने रहें इसके लिए विस्तृत आदेश दिए है. किसी अन्य लेख द्वारा भविष्य मैं इस विषय पर विस्तार से लिखूंगा।

इतनी स्पष्टता करने के बाद मैं हिन्दू विवाह संस्था में बहुपत्नीत्व के विषय पर आता हुं. जैसा मैंने पहले कहा, हिन्दू धर्म में कुछ अपवादों की परिस्थिति में एक से अधिक पत्नी करनेकी अनुमति है. इसमेसे एक अपवाद है, संतान प्राप्ति के लिए एक से अधिक विवाह करना। क्यों इस अपवाद के लिए अनुमति दी गई है? इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान में है. हम यह बात विस्तार से देखेंगे।

  • प्रकृति के प्रत्येक पशु-पक्षियों में और जलचर प्राणियों में एक बात में बिलकुल समानता है. प्रत्येक प्रजाति में स्त्रीलिंग प्राणियों का प्रमाण पुलिंग प्राणियों से अधिक होता है. इसका कारण यह है की प्रकृति का चक्र प्रजनन के द्वारा चालू रखने के लिए स्त्रीलिंग ही सक्षम है. यद्यपि आज के समय में मनुष्यों में स्त्रीलिंग और पुलिंग के बिच का अनुपात पुलिंग के पक्ष में अधिक है, परंतु इसके अन्य कारण है की जिसमें मैं अभी जाना नहीं चाहता (केवल इतना कहूंगा की भ्रूण हत्या करने वाले माता-पिता महाभयंकर नर्क को प्राप्त होते है. और इसमें भी स्त्री भ्रूण की हत्या तो अत्यंत ही पतनकारी पाप है). अपितु,परापूर्व से मनुष्यों में भी प्रकृति का यही नियम लागु हो रहा है की स्त्रियों की संख्या पुरषों से अधिक ही होती है. यदि आपने निरिक्षण किया होगा तो जानते होंगे की जब गर्भवती स्त्री को गर्भावस्था के समय या प्रसव के समय कोई समस्या होती है, तो यदि स्त्री शिशु होगा तो उसके बचने की संभावना अधिक होगी बनस्पत पुरुष शिशु के. इसका कारण है की स्त्री शिशु की रक्षा प्रकृति कर रही होती है, जिससे की प्रकृति का अपना चक्र चालू रह सके. इसलिए पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या अधिक रहती है. अब स्वाभाविक ही है की यदि पुरुष को संतान प्राप्ति का अधिकार है तो स्त्री को भी संतान प्राप्ति का अधिकार है. इसलिए संतान प्राप्ति हेतु एक पुरुष एक से अधिक स्त्री के साथ विवाह कर सकता है.
  • सामान्यतः प्रजनन (बच्चा जनने की क्रिया) से जुडी समस्याओं में पुरुष से अधिक स्त्रियों के पक्ष में कमी होना अधिक मात्रा में देखा जाता है. इसका कारण यह है की तुलनात्मक दृष्टि से पुरुषों के जननांगों की रचना स्त्रियों के बनस्पत बहोत सरल और मर्यादित होती है. जब की स्त्रियों के अंगों की रचना अत्यंत जटिल और कोमल होती है. गर्भाधान से लेकर बच्चे को पोषण देने तक स्त्रियों के अंग मुख्य और अनिवार्य होते है. इन अंगों में से किसी एक में भी कमी आ जाने से प्रजनन क्रिया रुक जाती है. और फिर स्त्रियों की प्रजनन क्षमता उसके जीवनकाल के अनुपात में बहोत अल्प समय के लिए ही (17 से 38 की आयु के बिच) होती है. जब की पुरुष तरुणावस्था में प्रवेश के बाद लगभग आजीवन सक्षम होता है. इसी कारण संतान प्राप्ति एक स्त्री के द्वारा न होने के संयोग अधिक हो सकते है.

इस प्रकार संतान न होने पर, संतान प्राप्ति के लिए, और वंश वृद्धि के लिए किसी पुरुष के लिए एक से अधिक पत्नी करनेका अपवाद हिन्दू धर्म में स्वीकारा गया है. परन्तु एकबार विवाह होने के बाद हेतु केवल संतान प्राप्ति तक ही मर्यादित नहीं रहता। पति-पत्नि को गृहस्थाश्रम के प्रत्येक नियमों का पालन करके धर्ममय जीवन जीना आवश्यक बन पड़ता है. वेदों ने तो विवाह बंधन को तोडना असंभव बताया है. यद्यपि मनुस्मृति कुछएक संयोगो में पति और पत्नी को एकदूसरे का त्याग करने की अनुमति देता है.

और कौनसे अपवाद है?

दूसरा अपवाद है क्षत्रियों के लिए. राजाओं और उच्च स्थान प्राप्त अन्य क्षत्रियों के लिए एक से अधिक पत्नी करना प्रायः अनिवार्य होता है. लगभग प्रत्येक पौराणिक कथाओं में आपने देखा होगा की राजाओं की सदैव एक से अधिक रानियां होती है. इसके लिए निम्नलिखित कारण है.

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  • राजाओं के समय में वे विविध देशों के साथ संधि करने के लिए पुत्रियों के विवाह का व्यव्हार होता था. वर्तमान समय में दो देशों के बिच संधियां होती है. पर वह संधियां कभी भी टूट सकती है. चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ तो संधियों की कोई गंभीरता ही नहीं होती है. जब की हिन्दू परंपरा में, जैसे की पहले कहा, विवाह दो परिवारों के बिच का संबंध है. और राजा  के परिवार का अर्थ है उसका पूरा ही राज्य। इस प्रकार जब राजा की बेटी ब्याही जाती है तब दो राज्यों के बिच पक्के और लम्बे समय के लिए संबंध जुड़ जाते है. अब यदि राजा केवल एक ही ब्याह कर सकता है तो वह एक से अधिक राज्यों के साथ कैसे संबंध बना पाएगा? इसलिए वह एक से अधिक विवाह कर सकता है. ये तो बात हुई पौराणिक काल की. ई.पू. 350 में चाणक्य ऋषि ने चन्द्रगुप्त मौर्य का विवाह यूनान की (वर्तमान ग्रीस) की राजकुमारी हेलेना के साथ करके दोनों राज्यों के बिच सदा के लिए शांति स्थापित की थी. 14वि सदी से  17वि सदी के बिच महान विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने अनेक देशों के राजाओं की राजकुमारियों के साथ ब्याह करके चिरगामी शांतिपूर्ण संबंध प्रस्थापित किये थे (अब यह बात अलग है की मुस्लिम आक्रांताओं के समय में स्त्रियों को आनंद की वस्तु समझकर हारे हुए राजाओं से उनकी बहु बेटियां छीनकर उन्हें लज्जित करने पिशाचि आनंद सुल्तान उठाया करते थे. वे विवाह नहीं थे, वे 'शादियां' थी).
  • एक राजा के लिए अपने वंष को आगे बढ़ाना अत्यंत ही महत्वपूर्ण विषय होता है. जो राजा वंषहीन रहता है उसका राज्य अस्तव्यस्त हो जाता है और अफरातफरी व्यापित हो जाती है. इसलिए राज्य की सुरक्षा व् सुचारुता के लिए भी, राजाओं को संतान प्राप्ति के लिए एक पत्नी के ऊपर आधार रखना आपत्तिजनक हो सकता है. जैसा की मैंने पहले कहा, स्त्रियों की प्रजनन क्षमता अमुक आयु के लिए मर्यादित होती है. और प्रजोत्पत्ति के लिए असक्षम होने की सम्भावना स्त्रियों में अधिक होती है.
  • भारतीय राजा परपूर्व से ही प्रत्येक युद्ध में स्वयं अग्रेसर होकर लड़ते थे. यदि स्वयं नहीं लड़ते थे तो अपने राजकुमारों व् सेनापतियों को आगे रहकर लड़नेको कहा जाता था (अन्य किसी सभ्यता में राजा स्वयं कभी लड़ने जाता नहीं था. और जो लड़े है वे राजा नहीं थे, अपितु किसी कबीले के लुटेरे हुआ करते थे). स्वाभाविक ही है की युद्ध में मृत्यु होने की संभावना बड़ी होती है. उदहारण के लिए सगर राजा के 60 हजार पुत्र थे जो की पृथ्वी को खोदते खोदते मृत्यु को प्राप्त हुए थे (और जब उन खड्डों में पानी भरा गया तब उन्हें 'सागर' नाम दिया गया की जिसे हम समुद्र व् महासागर के नाम से जानते है). सत्यनारायण कथा में उल्लेखित तुंगध्वज राजा के 100 पुत्र थे, जो की युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए और तत्पश्चात सत्यनारायण भगवन की कृपा से पुनर्जीवित हुए थे. ऐसे तो सेंकडो पौराणिक और मध्ययुगीन उदहारण है. आधुनिक इतिहास में ही रानी लक्ष्मीबाई की संतान ना होने से अंग्रेजों ने उसका राज्य हड़पना चाहा था.

उपरोक्त कारणों से क्षत्रियों के लिए बहुपत्नीत्व का अपवाद स्वीकारा गया है. यहां भी मूल उद्देश्य संतानप्राप्ति और प्रजा कल्याण का ही है.

इसके अतिरिक्त इतने सैंकड़ों शात्रों में से कहीं भी, किसी भी पुरुष को एक से अधिक पत्नी होने का उल्लेख नहीं मिलेगा।

क्या आपने शास्त्रों में वर्णित किसी भी ऋषि, या सामान्य व्यक्ति को, एक से अधिक पत्नी होने का पढ़ा या सुना है? कभी नहीं सुना होगा! हां, एक प्रसंग अवश्य आता है की जिसमें दक्ष प्रजापति उनकी 60 पुत्रियों को 7 ऋषियों के साथ ब्याहते है. इसमें से कश्यप ऋषि को 13 पुत्रियां ब्याही जाती है. परंतु इसमें दक्ष प्रजापति का उद्देश्य सृष्टि की रचना करने का था. दक्ष प्रजापति इस समग्र मैथुनी सृष्टि के रचयिता है, उन्होंने सृष्टि का व्याप बढ़ाने के लिए अपनी 60 पुत्रियों को उत्तम 7 ऋषियों के साथ ब्याहा, की जिससे सृष्टि के लिए कल्याणकारी प्रजा की उत्पति हो. आज हमारे सबके गोत्र इन्ही ऋषियों के नाम से पड़े है.

तो यहांपर स्पष्ट होता है की कुछएक अपवादों को छोड़कर, हिन्दू धर्म बहुपत्नीत्व को मान्यता नहीं देता है. पुरे मानव समाज के आदर्श, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम भी क्षत्रिय थे, अपितु वे एक पत्नी ही करनेके व्रतधारी थे. श्री राम न केवल क्षत्रियों के आदर्श है, अपितु पूरी मनुष्य जाति के आदर्श है. श्री राम का जन्म ही समाज को आदर्श दिखाने के लिए हुआ था. इससे यह कहा जा सकता सनातन धर्म कुछ संयोगों में बहुपत्नीत्व की अनुमति तो देता है, किंतु उसका अनुमोदन (encouragement) नहीं करता। यहां पर अनुमति और अनुमोदन के बिच का अंतर बहोत स्पष्ट रूप से समझने की, याद रखने की, और उसे जीवन में उतरने की आवश्यकता है.

चलते चलते:

आजकल अत्यंत ही निकृष्ट विचारधारा वाले आधुनिक स्त्री वादी (feminists) लोग, जिन्हे प्रकृति और समाज की प्रत्येक व्यवस्था केप्रति कुछ न कुछ समस्या है, और जो एक पुरुषत्व विहीन स्त्री-प्रधान समाज की मांग करते रहते है, उन्हें ये समझने की आवश्यकता है की प्रकृति और विज्ञान स्त्री-प्रधान समाज का समर्थन नहीं करते। किसी भी समाज की व्यवस्था उसका भविष्य सुरक्षित रहे यह विशेष रूपसे ध्यानमें रखकर ही बनाई जाती है. और भविष्य सुरक्षित होता है बाहुबल की क्षमता के द्वारा और प्रजोत्पत्ति के द्वारा। इसलिए स्त्री अथवा पुरुष, दोनों में से जो लिंग उस समाज को अधिक बाहुबल और प्रजोत्पत्ति की अधिक क्षमता दे सकता है, वही लिंग उस समाज का प्रधान बनता है. अब वह लिंग कौनसा है ये तो खाली मस्तिष्क वाले स्त्री-वादी भी भली भांति समज सके इतना स्पष्ट है.


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