मैथुन क्रिया के विषय में शास्त्रों का क्या मत है?
मैथुन क्रिया एक ऐसा विषय है की जिसके विषयमें लगभग प्रत्येक व्यक्तिका अपना कोई न कोई अभिप्राय अवश्य ही है, परंतु सभ्य समाजमें इसके विषयमें चर्चा करना अयोग्य और असंस्कृत माना जाता है. यद्यपि हमारे शास्त्रोनें इस विषयको कभी अस्पृश्य नहीं माना है. अस्पृश्य तो क्या, शास्त्रोनें तो मैथुन क्रिया को मानव जीवनके चार महाकर्मों मेंसे एक माना है. धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष, यह प्रत्येक मनुष्यके 4 ऐसे कर्म है जो की नीतिपूर्ण और शास्त्रोक्त विधि से किये जानेपर मनुष्य का कल्याण होता है. कामसूत्र के रचयिता ऋषि वात्स्यायन चारों वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे (आज के समयमें चारों वेदों के पंडित हो ऐसे विद्वान् पुरे देशमें पुरे 10 भी नहीं होंगे). वात्स्यायन ऋषि की रचना 'कामसूत्र' के विषयमें तो हम सब जानते है, पर यह बात बहोत कम लोग जानते है की वेदों के भाष्यकारों में भी वात्स्यायन ऋषि का नाम अतिआदर पूर्वक लिया जाता है.
उपरोक्त पूर्वभूमिका के द्वारा हम यह समज सकते है की काम वासना होना या इसकी तृप्ति के लिए रत होना, यह कोई अधार्मिक बात नहीं है. फिरभी, जीवन के अन्य अनेक विषयभोगों की ही भांति, इस विषयभोग के लिए भी शास्त्रोनें कुछ विधि-निषेध (DOs and DONTs) दिए हुए है, की जिसका अनुसरण करनेसे मनुष्यका कल्याण होता है, और अधःपतन होने से बच जाता है.
यह विधि-निषेध कौनसे है?
हमारे शास्त्रों में जीवनके प्रत्येक आयामों का समावेश करने वाली अनेक कथाएँ दी गई है. यह कथाएँ अत्यंत ही रोचक होनेके उपरांत एक अत्यंत मार्मिक संदेश देने वाली भी होती है. ऐसी ही एक कथा है, राजा ययाति की. ययाति राजा का मन भी हमारे जैसे सामान्य मनुष्यों की ही भांति वासनाओं में आसक्त था. अंतर केवल इतना था की वे एक धर्ममय जीवन जीने वाले व्यक्ति थे. उनकी कथा, हम सबकी कथा है. और उनका जीवन हम सब के लिए प्रेरणा स्वरुप है.
ययाति राजा पांडवों और कौरवों के पूर्वज थे, और अपनी धार्मिकता और नीतिमत्ता के लिए अत्यंत सुख्यात थे. एक अकस्मात् से उन्होंने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री, देवयानी को कुएं में से बहार निकालते समय उसका पाणिग्रहण (कुवारी कन्दाया का दाहिना हाथ पकड़ना) कर लिया था, और इसी कारणवश देवयानी की हठ से विवश होकर ययाति को उसके साथ विवाह करना पड़ा था. विवाह से पूर्व शुक्राचार्य ने ययाति को चेतावनी दी थी की यदि वह कभी भी देवयानी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री का गमन करेगा तो वे उसे भयंकर श्राप देंगे. विवाह के थोड़े समय उपरांत देवयानी की दासी, शर्मिष्ठा (जो की स्वयं एक राजकुमारी थी, परंतु दुर्भाग्य से देवयानी की दासी बनी थी) ने संतान प्राप्ति की कामना से ययाति के साथ सहवास करने के लिए बिनती की. ययाति को शर्मिष्ठा की सारी कहानी सुनकर उसपर दया आई, और उसके मादक रूप के ऊपर मोहित भी हो गए. इसी कारणवश उन्होंने शर्मिष्ठा के साथ सहवास करनेका निश्चय किया. परंतु कोई पराई स्त्री का सहवास करना यह एक महापाप है. इसलिए उसने शर्मिष्ठा को अपनी पत्नी के रूपमें स्विकार करते हुए उसके साथ विवाह किया. यद्यपि शुक्राचार्य की चेतावनी उन्हें भली भांति याद थी, इसलिए उन दोनों ने यह विवाह देवयानी से छिपाकर रखे. समय का चक्र चलता रहा और ययाति को देवयानी से 3 पुत्र हुए और शर्मिष्ठा से 2 पुत्र हुए. सारे पुत्र युवक बन गए और ब्रह्मचर्याश्रम सम्पूर्ण करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश के योग्य आयु के बन गए.
यहाँ एक बात का विशेष ध्यान दें के शर्मिष्ठा के रूप पर ययाति मोहित तो हुए थे, और सारी परिस्थिति अनुकूल थी, फिरभी उन्होंने परस्त्रीगमन को धर्म विरुद्ध समजते हुए पाप करनेसे बचते हुए शर्मिष्ठा को विधि पूर्वक अपनी पत्नी के रूपमें स्वीकार करनेके बाद ही उसका सहवास किया. हम भी अपने जीवन में कई बार आकर्षक स्त्री-परुष के संपर्क में आते है, कई बार परिस्थितियां अनुकूल भी होती है, अपितु इसका अर्थ यह नहीं की हम अनैतिकता और अधर्म का आचरण करें.
यद्दैयपि शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु थे, वे एक महान ऋषि भी थे. उन्होंने देवयानी के विवाह के समय ही भविष्य देख लिया था. और इसी लिए ययाति को चेतावनी दी थी. और अंततः वही हुआ जो होना था. एकबार संयोग ऐसे हुए की देवयानी को पता चल गया की ययाति की दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा है और उससे उसे 2 पुत्र भी हुए है. यह बात ज्ञात होते ही वह तुरंत ही शुक्राचार्य के पास रोते रोते हुए गई. पीछे पीछे ययाति भी गए. सारा वृतांत सुनते ही शुक्राचार्य को क्रोध आ गया और उन्होंने सामने ही खड़े हुए ययाति को श्राप दे दिया की उसका यौवन तुरंत ही चला जाए और वो दारुण वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाए (जिससे की वह किसी स्त्री का सहवास करनेमें सक्षम ना रहे). इतना कहते ही ययाति का पूर्ण युवान शारीर निर्बल और अतिवृद्ध हो गया. अचानक अपना ऐसा शरीर हुआ देख ययाति अत्यंत दुखी हो गया. उसको अपना यौवन अतिप्रिय था, और उसको अभी काम वासनाएँ भी बहोत थी. वह जानता था की विषयों की वासना की तृप्ति भी एक शक्तिशाली और निरोगी शारीर ही कर सकता है.
जिस शारीर की इन्द्रियां दुर्बल हो गई हो, वह शारीर भोग नहीं भोग सकता. और इस दुर्बलता के कारन मनुष्य और साधिक दुखी होता रहता है. इसी लिए शास्त्रोमें प्रत्येक आयु के अनुसार कर्म करनेकी आज्ञा दी गई है, की जिससे जीवन संतोषपूर्ण बना रहे. पर आज तो हम देख रहे है की युवकों में भी अनेक प्रकार की जातीय समस्याएँ हो रही है. और जो निरोगी भी है, वह भी अपना मन भरकर अधिक समय भोग नहीं भोग पाते.
क्यों आज के समय में युवक अपनी युवावस्था में भी विविध विषयों के भोगों को जी भरके और लंबे समय तक नहीं भोग सकते?
हमारे शरीर में 5 प्रकार के वायु होते है. 1. प्राण 2. अपान 3. उदान 4. व्यान 5. सामान. इसमें से अपान वायु शरीर में से त्याज्य वस्तुओं का नियमन करता है. त्याज्य वस्तुओं का अर्थ है मल, मूत्र, स्वेत (पसीना), वीर्य, रजस इत्यादि. इसका अर्थ है की संभोग की स्थिति और आनंद, यह शरीर के अपान वायु के आधीन है. शरीर में यह पांचों वायुओं का संतुलन बना रहे यह आवश्यक है. यदि संतुलन में गड़बड़ होती है तो नाना प्रकार के रोग और व्याधियां होती है. पेट से जुड़े रोग, मल-मूत्र के रोग, यह सब अपान वायु के असंतुलन के कारन होते है. परंतु आज के युग में हम ऐसे किसी संतुलन को सन्मान नहीं देते, शास्त्रों के नियमों के विरूद्ध आहार करते है, अनुषाशन हिन् दिनचर्या जीते है. यही कारण है की हम जी भरकर ना तो संभोग का सुख भोग सकते है, और ना ही एनी किसी इन्द्रियों के भोग भोग सकते है.
पुराने समय में ऋषि मुनि और अन्य सामान्य लोग भी अनुषाशन पूर्ण जीवन जीते थे और भरपूर इन्द्रिय भोग करते थे. शास्त्रों में ऐसे अनुषाशन पूर्ण जीवन को योगमय जीवन कहा गया है. यद्यपि योग स्वयं एक सागर जितना बड़ा विषय है, अपितु यहां हम संक्षेप में देखें तो योग 8 प्रकार के होते है. 1. यम 2. नियम 3. आसन 4. प्राणायाम 5. प्रत्याहार 6. धारणा 7. ध्यान 8. समाधि. यहां पर 'यम' और 'नियम' का अर्थ है शास्त्रोक्त विधि से दैनिक दिनचर्या का अनुसरण करना. 'आसन' और 'प्राणायाम' शारीर के विविध अंगों और 5 वायुओं को संतुलित करने के लिए किये जाते है. अब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक साधना करे, या ना करे, अपितु प्रथम 4 योग तो उसके भौतिक जीवन को अर्थपूर्ण और आनंदमय बनाने के लिए करने ही चाहिए. और फिर यदि आध्यात्मिक प्रगति करनी है तो तो यह प्रथम चार योग अनिवार्य बन जाते है. इससे यह बात सिद्ध होती है की केवल इन्द्रिय भोगों के लिए ही नहीं, आधात्मिक उन्नति के लिए भी एक स्वस्थ और सशक्त शरीर होना आवश्यक है. परंतु हम इस 8 में से एक भी योग का आचरण नहीं करते. और इसी लिए संभोग सुख से लेकर अन्य किसी भी भोग को हम तृप्त होकर नहीं भोग सकते है. उदहारण के लिए... आज से केवल 150-200 वर्ष पूर्व मनुष्यों का आहार वर्तमान समय के औसतन आहार से 5 गुना अधिक था. उनकी इन्द्रियां और अंग-उपांग इतने बड़े प्रमाण में भोग भोगने के लिए शक्तिमान थे. उनकी मैथुन क्षमता भी उतने ही प्रमाण में अधिक होगी ऐसा हम मान सकते है. इसका कारण यह था की उस समय में मनुष्यों का जीवन अधिकांश रूप से शास्त्रोक्त नियमों के अनुसार हुआ करता था. इसलिए 'यम' और 'नियम' का आचरण वह लोग भली भांति करते थे.
ययाति राजा भी एक सामान्य मनुष्य की ही भांति आध्यात्मिक प्रवृत्तियों से विमुख थे. फिरभी, वे प्रथम चार प्रकार के योगों का आचरण अवश्य करते थे. एक कुशल और प्रजा वत्सल राजा होने के साथ साथ, वे एक नीतिवान व्यक्ति भी थे. परंतु उन्हें विषयों से आसक्ति समाप्त नहीं हुई थी. अकाल ही अपनी युवास्था चली जाने से उनकी कामेच्छा अधूरी ही रह गई थी. इसलिए वे अत्यंत दुखी हो गए थे. उन्होंने द्रवित कंठ से शुक्राचार्य से क्षमा मांगी और याचना करी की कोई न कोई उपाय करके उनकी युवावस्था वापिस लायी जाए. अब देवयानी को भी अपने पति की यह दशा देखकर बहोत दया आई और उसने भी अपने पिता से कोई उपाय बताने के लिए कहा. इसपर शुक्राचार्य को भी दया आई और कहा की मेरा श्राप तो व्यर्थ नहीं जाएगा, अपितु यदि तुम्हे अपना यौवन वापिस चाहिए तो तुम तुम्हारे पांच पुत्रों में से किसी एक के साथ अपने वृद्धत्व का विनियोग करके उसकी युवावस्था ले सकते हो, और यह यौवनावस्था जितने समय तक वह इच्छा रखता है उतने समय तक रख सकता है. परंतु इसके बदले उसके पुत्र को तुरंत ही उसकी वृद्धावस्था लग जाएगी. इतना सुनते ही ययाति बहोत प्रसन्न हुआ. उसे विश्वास था की उसका कोई भी पुत्र उसके पिता की इच्छा पूरी करने के लिए ना नहीं कहेगा. उसने 1000 वर्ष के लिए अपने किसी एक पुत्र से उसका यौवन मांगने का निश्चय किया.
पिता ने एक के बाद एक, ऐसे पहले चार पुत्रों के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त की. परंतु हुआ उसके अनुमान से ठीक विपरीत! चारों पुत्रों ने पिता की इच्छा पूर्ति करने के लिए अपनी युवावस्था देने से स्पष्ट अस्वीकार कर दिया. उनका मानना था की अभी तो वे ब्रह्मचर्याश्रम में से गृहस्थाश्रम में प्रवेश भी नहीं कर पाए है. इतने वर्षो तक गुरुकुल में कठोर ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करने के उपरांत अंततः उन्हें विषय सुख भोगने का अवसर मिलने वाला है, और इसपर पिता कह रहे है की तुम युवावस्था के आनंद त्याग कर दो? वे ऐसा कैसे कर सकते है?
क्यों ब्रह्मचर्याश्रम में इन्द्रिय निग्रह किया जाता है?
ब्रह्मचर्य का वैसे तो व्यापक अर्थ बहुत ही बड़ा है. इसका शब्दार्थ है, ब्रह्म में चरायमान रहना, अर्थात सतत ब्रह्म प्राप्ति के लिए रत रहेना. परंतु यहांपर हम इस अवस्था का प्रचलित आयाम देखेंगे की जो है काम वासना का दमन. पुरुष के वीर्य और स्त्री के रजस में अपर शक्तियां होती है. उनका निग्रह और नियमन करनेसे बड़ी बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती है. इससे विपरीत, इन शक्तियों का व्यय करने से स्मृति निर्बल होती है, मन चंचल हो जाता है, आत्मबल निर्बल हो जाता है, और जीवात्मा का तेज निर्बल हो जाता है. मनुष्य की चेतना 12 से 21 वर्ष की आयु के बिच सबसे प्रबल होती है. और इस समय में यदि योग्य साधना करी जाए तो तुरंत ही कुण्डलिनी जागृत हो जाती है. परंतु इन्द्रिय निग्रह ना करने से तपस्या भंग हो जाती है, और जीवन का अमूल्य अवसर व्यर्थ हो जाता है. और यह बात केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए ही सम्बंधित नहीं है, अपितु किसी भी प्रकार की विद्या व् कौशल प्राप्त करने के लिए यह बात इतनी ही प्रस्तुत है. इसी कारण तरुणावस्था में विद्यार्थियों को कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए शास्त्रों द्वारा आदेश दिया गया है.
इसी अवस्था से अभी तो ययाति के पुत्र वापिस आ रहे थे. उनको यह भी सिखाया गया था कि गृहस्थाश्रम में वे जी भर के भोग भोग सकते है. और इसी पर पिता ने उनसे उनकी युवावस्था ही मांग ली. वह कैसे दी जाए? पिता निराश हुए. उन्होंने चारों पुत्रों को अपने से दूर मरुभूमि वाले प्रदेशों का राज्य दे दिया और उन्हें श्राप दिया की उनके द्वारा होने वाला वंश मलेच्छ (बर्बर जाती) बनेंगी (यह जातियां आगे चलकर यवन, यूनानी इत्यादि बर्बर जातियां हुई). अब ययाति राजा की एक मात्र आशा शर्मिष्ठा से उत्पन्न हुआ उसका पांचवा पुत्र पुरु था. पुरु ने पिता का यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार किया और उसको अपना सौभाग्य समजकर तुरंत ही अपना यौवन पिता को देने का संकल्प किया. यह संकल्प करते ही ययाति राजा युवान बन गए और पुरु वृद्ध! पिता ने पुत्र को अनेक आशीर्वाद दिए और भारत देश के सबसे उपजाऊ और पुण्यशाली प्रदेश का उसे राजा घोषित किया. ययाति राजा का यह यौवन अब पुरे 1000 वर्ष तक ऐसे ही रहने वाला था. वह अपनी काम वासना को संतुष्ट करके लंबे समय तक आनंद प्राप्त करने के लिए उत्सुक थे.




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