मैथुन क्रिया के विषय में शास्त्रों का क्या मत है?

मैथुन क्रिया एक ऐसा विषय है की जिसके विषयमें लगभग प्रत्येक व्यक्तिका अपना कोई न कोई अभिप्राय अवश्य ही है, परंतु सभ्य समाजमें इसके विषयमें चर्चा करना अयोग्य और असंस्कृत माना जाता है. यद्यपि हमारे शास्त्रोनें इस विषयको कभी अस्पृश्य नहीं माना है. अस्पृश्य तो क्या, शास्त्रोनें तो मैथुन क्रिया को मानव जीवनके चार महाकर्मों मेंसे एक माना है. धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष, यह प्रत्येक मनुष्यके 4 ऐसे कर्म है जो की नीतिपूर्ण और शास्त्रोक्त विधि से किये जानेपर मनुष्य का कल्याण होता है. कामसूत्र के रचयिता ऋषि वात्स्यायन चारों वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे (आज के समयमें चारों वेदों के पंडित हो ऐसे विद्वान् पुरे देशमें पुरे 10 भी नहीं होंगे). वात्स्यायन ऋषि की रचना 'कामसूत्र' के विषयमें तो हम सब जानते है, पर यह बात बहोत कम लोग जानते है की वेदों के भाष्यकारों में भी वात्स्यायन ऋषि का नाम अतिआदर पूर्वक लिया जाता है.

उपरोक्त पूर्वभूमिका के द्वारा हम यह समज सकते है की काम वासना होना या इसकी तृप्ति के लिए रत होना, यह कोई अधार्मिक बात नहीं है. फिरभी, जीवन के अन्य अनेक विषयभोगों की ही भांति, इस विषयभोग के लिए भी शास्त्रोनें कुछ विधि-निषेध (DOs and DONTs) दिए हुए है, की जिसका अनुसरण करनेसे मनुष्यका कल्याण होता है, और अधःपतन होने से बच जाता है.

यह विधि-निषेध कौनसे है?

हमारे शास्त्रों में जीवनके प्रत्येक आयामों का समावेश करने वाली अनेक कथाएँ दी गई है. यह कथाएँ अत्यंत ही रोचक होनेके उपरांत एक अत्यंत मार्मिक संदेश देने वाली भी होती है. ऐसी ही एक कथा है, राजा ययाति की. ययाति राजा का मन भी हमारे जैसे सामान्य मनुष्यों की ही भांति वासनाओं में आसक्त था. अंतर केवल इतना था की वे एक धर्ममय जीवन जीने वाले व्यक्ति थे. उनकी कथा, हम सबकी कथा है. और उनका जीवन हम सब के लिए प्रेरणा स्वरुप है.

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ययाति राजा पांडवों और कौरवों के पूर्वज थे, और अपनी धार्मिकता और नीतिमत्ता के लिए अत्यंत सुख्यात थे. एक अकस्मात् से उन्होंने दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री, देवयानी को कुएं में से बहार निकालते समय उसका पाणिग्रहण (कुवारी कन्दाया का दाहिना हाथ पकड़ना) कर लिया था, और इसी कारणवश देवयानी की हठ से विवश होकर ययाति को उसके साथ विवाह करना पड़ा था. विवाह से पूर्व शुक्राचार्य ने ययाति को चेतावनी दी थी की यदि वह कभी भी देवयानी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री का गमन करेगा तो वे उसे भयंकर श्राप देंगे. विवाह के थोड़े समय उपरांत देवयानी की दासी, शर्मिष्ठा (जो की स्वयं एक राजकुमारी थी, परंतु दुर्भाग्य से देवयानी की दासी बनी थी) ने संतान प्राप्ति की कामना से ययाति के साथ सहवास करने के लिए बिनती की. ययाति को शर्मिष्ठा की सारी कहानी सुनकर उसपर दया आई, और उसके मादक रूप के ऊपर मोहित भी हो गए. इसी कारणवश उन्होंने शर्मिष्ठा के साथ सहवास करनेका निश्चय किया. परंतु कोई पराई स्त्री का सहवास करना यह एक महापाप है. इसलिए उसने शर्मिष्ठा को अपनी पत्नी के रूपमें स्विकार करते हुए उसके साथ विवाह किया. यद्यपि शुक्राचार्य की चेतावनी उन्हें भली भांति याद थी, इसलिए उन दोनों ने यह विवाह देवयानी से छिपाकर रखे. समय का चक्र चलता रहा और ययाति को देवयानी से 3 पुत्र हुए और शर्मिष्ठा से 2 पुत्र हुए. सारे पुत्र युवक बन गए और ब्रह्मचर्याश्रम सम्पूर्ण करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश के योग्य आयु के बन गए. 

यहाँ एक बात का विशेष ध्यान दें के शर्मिष्ठा के रूप पर ययाति मोहित तो हुए थे, और सारी परिस्थिति अनुकूल थी, फिरभी उन्होंने परस्त्रीगमन को धर्म विरुद्ध समजते हुए पाप करनेसे बचते हुए शर्मिष्ठा को विधि पूर्वक अपनी पत्नी के रूपमें स्वीकार करनेके बाद ही उसका सहवास किया. हम भी अपने जीवन में कई बार आकर्षक स्त्री-परुष के संपर्क में आते है, कई बार परिस्थितियां अनुकूल भी होती है, अपितु इसका अर्थ यह नहीं की हम अनैतिकता और अधर्म का आचरण करें.

यद्दैयपि शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु थे, वे एक महान ऋषि भी थे. उन्होंने देवयानी के विवाह के समय ही भविष्य देख लिया था. और इसी लिए ययाति को चेतावनी दी थी. और अंततः वही हुआ जो होना था. एकबार संयोग ऐसे हुए की देवयानी को पता चल गया की ययाति की दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा है और उससे उसे 2 पुत्र भी हुए है. यह बात ज्ञात होते ही वह तुरंत ही शुक्राचार्य के पास रोते रोते हुए गई. पीछे पीछे ययाति भी गए. सारा वृतांत सुनते ही शुक्राचार्य को क्रोध आ गया और उन्होंने सामने ही खड़े हुए ययाति को श्राप दे दिया की उसका यौवन तुरंत ही चला जाए और वो दारुण वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाए (जिससे की वह किसी स्त्री का सहवास करनेमें सक्षम ना रहे). इतना कहते ही ययाति का पूर्ण युवान शारीर निर्बल और अतिवृद्ध हो गया. अचानक अपना ऐसा शरीर हुआ देख ययाति अत्यंत दुखी हो गया. उसको अपना यौवन अतिप्रिय था, और उसको अभी काम वासनाएँ भी बहोत थी. वह जानता था की विषयों की वासना की तृप्ति भी एक शक्तिशाली और निरोगी शारीर ही कर सकता है.

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जिस शारीर की इन्द्रियां दुर्बल हो गई हो, वह शारीर भोग नहीं भोग सकता. और इस दुर्बलता के कारन मनुष्य और साधिक दुखी होता रहता है. इसी लिए शास्त्रोमें प्रत्येक आयु के अनुसार कर्म करनेकी आज्ञा दी गई है, की जिससे जीवन संतोषपूर्ण बना रहे. पर आज तो हम देख रहे है की युवकों में भी अनेक प्रकार की जातीय समस्याएँ हो रही है. और जो निरोगी भी है, वह भी अपना मन भरकर अधिक समय भोग नहीं भोग पाते. 

क्यों आज के समय में युवक अपनी युवावस्था में भी विविध विषयों के भोगों को जी भरके और लंबे समय तक नहीं भोग सकते?

हमारे शरीर में 5 प्रकार के वायु होते है. 1. प्राण 2. अपान 3. उदान 4. व्यान 5. सामान. इसमें से अपान वायु शरीर में से त्याज्य वस्तुओं का नियमन करता है. त्याज्य वस्तुओं का अर्थ है मल, मूत्र, स्वेत (पसीना), वीर्य, रजस इत्यादि. इसका अर्थ है की संभोग की स्थिति और आनंद, यह शरीर के अपान वायु के आधीन है. शरीर में यह पांचों वायुओं का संतुलन बना रहे यह आवश्यक है. यदि संतुलन में गड़बड़ होती है तो नाना प्रकार के रोग और व्याधियां होती है. पेट से जुड़े रोग, मल-मूत्र के रोग, यह सब अपान वायु के असंतुलन के कारन होते है. परंतु आज के युग में हम ऐसे किसी संतुलन को सन्मान नहीं देते, शास्त्रों के नियमों के विरूद्ध आहार करते है, अनुषाशन हिन् दिनचर्या जीते है. यही कारण है की हम जी भरकर ना तो संभोग का सुख भोग सकते है, और ना ही एनी किसी इन्द्रियों के भोग भोग सकते है.

पुराने समय में ऋषि मुनि और अन्य सामान्य लोग भी अनुषाशन पूर्ण जीवन जीते थे और भरपूर इन्द्रिय भोग करते थे. शास्त्रों में ऐसे अनुषाशन पूर्ण जीवन को योगमय जीवन कहा गया है. यद्यपि योग स्वयं एक सागर जितना बड़ा विषय है, अपितु यहां हम संक्षेप में  देखें तो योग 8 प्रकार के  होते है. 1. यम 2. नियम 3. आसन 4. प्राणायाम 5. प्रत्याहार 6. धारणा 7. ध्यान 8. समाधि. यहां पर 'यम' और 'नियम' का अर्थ है शास्त्रोक्त विधि से दैनिक दिनचर्या का अनुसरण करना. 'आसन' और 'प्राणायाम' शारीर के विविध अंगों और 5 वायुओं को संतुलित करने के लिए किये जाते है. अब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक साधना करे, या ना करे, अपितु प्रथम 4 योग तो उसके भौतिक जीवन को अर्थपूर्ण और आनंदमय बनाने के लिए करने ही चाहिए. और फिर यदि आध्यात्मिक प्रगति करनी है तो तो यह प्रथम चार योग अनिवार्य बन जाते है. इससे यह बात सिद्ध होती है की केवल इन्द्रिय भोगों के लिए ही नहीं, आधात्मिक उन्नति के लिए भी एक स्वस्थ और सशक्त शरीर होना आवश्यक है. परंतु हम इस 8 में से एक भी योग का आचरण नहीं करते. और इसी लिए संभोग सुख से लेकर अन्य किसी भी भोग को हम तृप्त होकर नहीं भोग सकते है. उदहारण के लिए... आज से केवल 150-200 वर्ष पूर्व मनुष्यों का आहार वर्तमान समय के औसतन आहार से 5 गुना अधिक था. उनकी इन्द्रियां और अंग-उपांग इतने बड़े प्रमाण में भोग भोगने के लिए शक्तिमान थे. उनकी मैथुन क्षमता भी उतने ही प्रमाण में अधिक होगी ऐसा हम मान सकते है. इसका कारण यह था की उस समय में मनुष्यों का जीवन अधिकांश रूप से शास्त्रोक्त नियमों के अनुसार हुआ करता था. इसलिए 'यम' और 'नियम' का आचरण वह लोग भली भांति करते थे.

ययाति राजा भी एक सामान्य मनुष्य की ही भांति आध्यात्मिक प्रवृत्तियों से विमुख थे. फिरभी, वे प्रथम चार प्रकार के योगों का आचरण अवश्य करते थे. एक कुशल और प्रजा वत्सल राजा होने के साथ साथ, वे एक नीतिवान व्यक्ति भी थे. परंतु उन्हें विषयों से आसक्ति समाप्त नहीं हुई थी. अकाल ही अपनी युवास्था चली जाने से उनकी कामेच्छा अधूरी ही रह गई थी. इसलिए वे अत्यंत दुखी हो गए थे. उन्होंने द्रवित कंठ से शुक्राचार्य से क्षमा मांगी और याचना करी की कोई न कोई उपाय करके उनकी युवावस्था वापिस लायी जाए. अब देवयानी को भी अपने पति की यह दशा देखकर बहोत दया आई और उसने भी अपने पिता से कोई उपाय बताने के लिए कहा. इसपर शुक्राचार्य को भी दया आई और कहा की मेरा श्राप तो व्यर्थ नहीं जाएगा, अपितु यदि तुम्हे अपना यौवन वापिस चाहिए तो तुम तुम्हारे पांच पुत्रों में से किसी एक के साथ अपने वृद्धत्व का विनियोग करके उसकी युवावस्था ले सकते हो, और यह यौवनावस्था जितने समय तक वह इच्छा रखता है उतने समय तक रख सकता है. परंतु इसके बदले उसके पुत्र को तुरंत ही उसकी वृद्धावस्था लग जाएगी. इतना सुनते ही ययाति बहोत प्रसन्न हुआ. उसे विश्वास था की उसका कोई भी पुत्र उसके पिता की इच्छा पूरी करने के लिए ना नहीं कहेगा. उसने 1000 वर्ष के लिए अपने किसी एक पुत्र से उसका यौवन मांगने का निश्चय किया.

पिता ने एक के बाद एक, ऐसे पहले चार पुत्रों के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त की. परंतु हुआ उसके अनुमान से ठीक विपरीत! चारों पुत्रों ने पिता की इच्छा पूर्ति करने के लिए अपनी युवावस्था देने से स्पष्ट अस्वीकार कर दिया. उनका मानना था की अभी तो वे ब्रह्मचर्याश्रम में से गृहस्थाश्रम में प्रवेश भी नहीं कर पाए है. इतने वर्षो तक गुरुकुल में कठोर ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करने के उपरांत अंततः उन्हें विषय सुख भोगने का अवसर मिलने वाला है, और इसपर पिता कह रहे है की तुम युवावस्था के आनंद त्याग कर दो? वे ऐसा कैसे कर सकते है?

क्यों ब्रह्मचर्याश्रम में इन्द्रिय निग्रह किया जाता है?

ब्रह्मचर्य का वैसे तो व्यापक अर्थ बहुत ही बड़ा है. इसका शब्दार्थ है, ब्रह्म में चरायमान रहना, अर्थात सतत ब्रह्म प्राप्ति के लिए रत रहेना. परंतु यहांपर हम इस अवस्था का प्रचलित आयाम देखेंगे की जो है काम वासना का दमन. पुरुष के वीर्य और स्त्री के रजस में अपर शक्तियां होती है. उनका निग्रह और नियमन करनेसे बड़ी बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती है. इससे विपरीत, इन शक्तियों का व्यय करने से स्मृति निर्बल होती है, मन चंचल हो जाता है, आत्मबल निर्बल हो जाता है, और जीवात्मा का तेज निर्बल हो जाता है. मनुष्य की चेतना 12 से 21 वर्ष की आयु के बिच सबसे प्रबल होती है. और इस समय में यदि योग्य साधना करी जाए तो तुरंत ही कुण्डलिनी जागृत हो जाती है. परंतु इन्द्रिय निग्रह ना करने से तपस्या भंग हो जाती है, और जीवन का अमूल्य अवसर व्यर्थ हो जाता है. और यह बात केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए ही सम्बंधित नहीं है, अपितु किसी भी प्रकार की विद्या व् कौशल प्राप्त करने के लिए यह बात इतनी ही प्रस्तुत है. इसी कारण तरुणावस्था में विद्यार्थियों को कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए शास्त्रों द्वारा आदेश दिया गया है.

इसी अवस्था से अभी तो ययाति के पुत्र वापिस आ रहे थे. उनको यह भी सिखाया गया था कि गृहस्थाश्रम में वे जी भर के भोग भोग सकते है. और इसी पर पिता ने उनसे उनकी युवावस्था ही मांग ली. वह कैसे दी जाए? पिता निराश हुए. उन्होंने चारों पुत्रों को अपने से दूर मरुभूमि वाले प्रदेशों का राज्य दे दिया और उन्हें श्राप दिया की उनके द्वारा होने वाला वंश मलेच्छ (बर्बर जाती) बनेंगी (यह जातियां आगे चलकर यवन, यूनानी इत्यादि बर्बर जातियां हुई). अब ययाति राजा की एक मात्र आशा शर्मिष्ठा से उत्पन्न हुआ उसका पांचवा पुत्र पुरु था. पुरु ने पिता का यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार किया और उसको अपना सौभाग्य समजकर तुरंत ही अपना यौवन पिता को देने का संकल्प किया. यह संकल्प करते ही ययाति राजा युवान बन गए और पुरु वृद्ध! पिता ने पुत्र को अनेक आशीर्वाद दिए और भारत देश के सबसे उपजाऊ और पुण्यशाली प्रदेश का उसे राजा घोषित किया. ययाति राजा का यह यौवन अब पुरे 1000 वर्ष तक ऐसे ही रहने वाला था. वह अपनी काम वासना को संतुष्ट करके लंबे समय तक आनंद प्राप्त करने के लिए उत्सुक थे.





आखिर ऐसा भी क्या है इस मैथुन क्रिया में की जिसके लिए मनुष्य इतना आसक्त हो जाता है, और क्यों मन को इस क्रिया में इतना आनंद आता है?

इस प्रश्न का उत्तर बहोत ही तात्विक है. थोड़े सावधान होकर पढ़िए. जीवात्मा का असल स्वरूप तो एक सीमा रहित, निर्गुण, निर्विकार और सर्वसमावेशी परब्रह्म का ही है. वह ब्रह्म पूर्ण है. उस से बाहर कुछ भी नहीं है. जो यह सारा ब्रह्माण्ड द्रष्टिगोचर हो रहा है, समग्र इतिहास, समग्र भविष्य, समग्र जिव और सचराचर जगत, यह सब इसी सीमा रहित परमात्मा (या तो परब्रह्म) में ही समाहित है. और फिर भी ब्रह्म इन सब से पर है. संक्षेप में, जो जीवात्मा होता है, वह इसी परब्रह्म का एक अंश होता है, और उसी का यह एक स्वरुप है. जीवात्मा (जो की शरीर में रहने वाला आत्मा है) का मूल स्वाभाव तो यही है की उसे किसी भी सीमाओं में बंधना पसंद नहीं है. उसे सतत अपने असली स्वरुप ऐसे अत्यंत विशाल और सर्वसमावेशी रूप की ही भांति सारी सीमाएं तोड़ने की उत्कंठा रहती है.

दूसरी तरफ देखें, तो जीवात्मा एक अत्यंत बद्ध अवस्था में कुंठित होकर एक शरीर के अंदर पड़ा है. वह शरीर से बंधा हुआ होने के कारण, जब भी उसे शरीर की इन्द्रियों द्वारा अपने शरीर के बाहर के विषयों के साथ एकात्मता साधने का अवसर मिलता है तब वह प्रसन्न होता है. अब जब मैथुन की क्रिया होती है तब कुछ क्षणों के लिए यह जीवात्मा शरीर से बंधे अपने कुंठित स्वरुप को उखाड़ फेंक कर दो शरीर का एकसाथ जुडाव अनुभव करता है. जीवात्मा का मुलभुत स्वाभाव अपना विस्तार बढ़ाने का होने के कारन उसे कुछ क्षणों के लिए अपना विस्तार दो शारीर जितना बढ़ा हुआ पाकर आनंद की अनुभूति करता है. परंतु शरीर का दुर्भाग्य यह है की इन्द्रियों की शक्तियाँ मर्यादित होती है, और वे यह अवस्था अधिक समय तक टिका नहीं पाती. इसलिए जीवात्मा फिरसे अपने मूल शारीर तक मर्यादित होकर कुंठित हो जाता है.

तो क्या मैथुन क्रिया के अतिरिक्त ऐसा कोई अन्य मार्ग है की जिससे इतना या इससे अधिक आनंद मिल सके? आनंद लंबे समय के लिए टिकाना को तो क्या किया जाए?

जैसे की हमने पहेल देखा, आत्मा का स्वाभाव होता है की वह अपना व्याप बढ़ाने के लिए सतत प्रयत्न करता है. और इसी लिए जब भी वह एक से दो शरीर में व्याप्त होता है तब उसे आनंद आता है. परंतु यह तो केवल दो ही शरीरों की बात हुई. आत्मा का मूल स्वरुप तो सर्वयापी और सर्वशक्तिमान है. यदि इस जीवात्मा को उसके मूल स्वरुप, परमात्मा के साथ ही जोड़ दिया जाए तो उसको कितना आनंद आएगा? तब तो 1-2-3 या करोडो शरीर नहीं, अपितु सम्पूर्ण सचराचर जगत, प्रत्येक देवता, भगवान और इश्वर के साथ ऐक्य का सुख एकसाथ मिल सकता है! कितना अद्भुत होगा यह सुख! इस सुख की दशा का नाम है 'समाधी', जो की अष्टांग योग का 8 वा चरण है. समाधि में साधक परब्रह्म के साथ ऐक्य प्राप्त करता है, और अनंत सुख की प्राप्ति करता है. मैथुन क्रिया की ही भांति समाधी अवस्था भी लंबे समय तक टिकानी अत्यंत ही कठिन है. इसी लिए इस स्थिति को टिकाने के लिए अष्टांग योग का ही सहारा लेना पड़ता है. जितनी प्रबल साधना, उतनी ही लंबी समाधी की स्थिति!

ખાસ નોંધ: અહીં ખાસ યાદ રાખો કે 'માર્કેટમાં' અત્યારે જેટલા યોગ ગુરુઓ છે એમાંથી મોટા ભાગના સમાધિ કરાવવાની વાતો કરે છે પણ એ વાસ્તવમાં સમાધિ હોતી નથી. તેઓ જેને સમાધિ કહે છે તે વાસ્તવમાં 'યોગ નિંદ્રા' છે. સાચી સમાધિ કારવાનાર ગુરુઓ આપણાં આ વ્યાવહારિક જગતમાં મળતા નથી.

विशेष संज्ञान: यहां एक बात विशेष रूपसे याद रखें की 'मार्किट' में अभी जितने भी योग गुरु है, उनमें से अधिकतर समाधी दिलाने की बात करते है. परंतु वह वास्तव में समाधि नहीं होती. वो जिसे समाधि कहते है वह वास्तव में 'योग निद्रा' होती है. असली समाधि दिलाने वाले गुरु हमारे इस व्यावहारिक जगत में नहीं मिलते.

ययाति राजा भी हमारी ही भांति अभी अध्यात्मिक साधना के मार्ग पर चढ़े नथी थे. उन्हें अभी इन्द्रिय भोग्य विषयों में ही आनंद आ रहा था. इसलिए पुत्र का यौवन मिलने से वे अत्यंत प्रसन्न होकर अपनी काम वासना संतुष्ट करने गले. उन्होंने अपना समग्र राज्य अपने पुत्रों को सोंप दिया था, इसलिए अब उसे भोग भोगने के अतिरिक्त और कोई काम नथी था.

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ययाति राजा विषय भोग के लिए आतुर तो थे, पर साथ साथ धर्म के ज्ञाता भी थे और संयमी व्यक्ति भी थे. उन्होंने अपनी पत्नियों के साथ 1000 वर्ष तक भोग भोगना आरम्भ तो किया, पर उसमें भी शास्त्रोक्त विधि-निषेध का पूरा ध्यान रखते हुए, एक मनुष्य के लिए जितने कर्म और कर्तव्यों का आदेश है, वह सभी कर्म करते करते, शात्रों में निषेध किये हुए दिनों में स्त्री के साथ सहवास ना करते हुए, अष्टांग योग के नियमों का पालन करते हुए भोग भोगना आरंभ किया.

तो कौन कौन सी परिस्थिति में मैथुन करने के लिए शास्त्रों ने निषेध किया है?

शास्त्रों ने इस प्रकार की परस्थितियों में स्त्री-पुरुष को सहवास करने से निषेध किया है.
अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्थी, अष्टमी, रविवार, संक्रांति काल, संधि काल, श्राद्ध पक्ष, नवरात्री, सावन मास, स्त्री का ऋतुकाल, गर्भवती स्त्री के साथ, दिन के समय (दिन के समय हुए सहवास से उत्पन्न संतान राक्षसी प्रवृत्ति की होती है), बीमार अवस्था में, दोनों में से किसी एक की इच्छा न होने पर, जब घर में शोक चल रहा हो, पवित्र वृक्ष के निचे, सार्वजानिक स्थल पर, चिकित्सालय, औषधालय, गुरु के निवासस्थान पर, ब्राह्मण के निवासस्थान पर, पराये स्त्री व् पुरुष के साथ, वानप्रस्थ आश्रम के पश्चात (अर्थात अधेड़ अवस्था और वृद्धावस्था में), और यदि गर्भ धारण करनेकी इच्छा है तो अमंगल मुहूर्त में संभोग नहीं करना चाहिए.

शात्रों में दिए गए विधि-निषेध का पालन करने से क्या लाभ होता है?

जैसा की पहले कहा गया, ब्रह्मचर्याश्रम में संभोग का सम्पूर्ण निषेध करने से व्यक्ति की क्षमताएँ अनेक गुना बढ़ जाती है. अपितु इसका अर्थ यह नहीं है की गृहस्थाश्रम में कोई विद्या, सिद्धि या कौशल नहीं प्राप्त किया जा सकता. यदि गृहस्थाश्रम में उपरोक्त विधि-निषेध का योग्य पालन करके स्त्री सहवास किया जाए तो उसे भी ब्रह्मचर्य के आचरण के समकक्ष ही माना गया है, और व्यक्ति प्रत्येक साधना सिद्धियाँ इन नियमों का पालन करके सरलता से प्राप्त कर सकते है. इन नियमों के साथ साथ दैनिक "त्रिकाल संध्या वंदन" जैसे नियम तो पालने ही है!

तदुपरांत इन नियमों का एक सबसे प्रकट और सबसे महत्वपूर्ण फल है, अच्छी और तेजस्वि संतानों का उत्पन्न होना!

यदि इन नियमों का पालन किया जाए तो व्यक्ति एक योगी के समकक्ष बन जाता है, और ना करने से व्यक्ति भोगी बन जाता है. और जब भोग का अतिरेक हो जाता है तब वह रोगी बन जाता है. और एकबार रोगी बनने के पश्चात कोई व्यक्ति भोग भी ठीक से नहीं कर सकता. इसलिए भोग भोगने के लिए भी (अष्टांग)योग अत्यंत आवश्यक है.

शास्त्रों के सभी आदेश राजा ययाति भली भांति जानते थे. इसी लिए वे सभी नियमों का पालन करते हुए भोग भोगते थे. लंबे समय तक ऐसे ही भोग भोगने के पश्चात उन्हें यह बात की अनुभूति हुई की इस प्रकार भोग भोगने का तो कोई अंत ही नहीं है. वे यदि 1000 वर्ष तक भी भोग भोगते रहेंगे तो भी उनकी कामाग्नि शांत नहीं होने वाली. तो फिर मनुष्य के जन्म का जो मूल उद्देश्य है, मोक्ष प्राप्ति, वह तो वे कब प्राप्त करेंगे? ययाति को यह समज में आया की विषयों के भोग की लालसा का उपाय उन्हें भोगने में नहीं है, अपितु उन्हें त्यागने में, उनके दमन करने में है. अनेक बार दमन करने के पश्चात भोग वासनाएँ मनुष्य को त्राहित नहीं करती. मनुष्य का मन प्रफुल्लित रहता है, और इश्वर प्राप्ति की क्रिया में रत होता है.

યયાતિ રાજાને હવે તેમની આ 1000 વર્ષની યુવાવસ્થા બિલકુલ નકામી લાગવા માંડી. તેમને પોતાના પુત્રની યુવાની છીનવી લેવાનો પણ ભારે પસ્તાવો થયો. તેમણે પોતાની કામતુરતા ત્યજીને પોતાનું મન ઈશ્વર પ્રાપ્તિમાં લગાવવાનો નિશ્ચય કર્યો. તેઓ પોતાના પુત્ર પૂરુ પાસે ગયા અને સંકલ્પ કરીને તેમની બાકી બચેલી યુવાવસ્થા પોતાના પુત્રને આપી દીધી અને પોતે ફરીથી વૃદ્ધ થઈને, વનમાં જઈને તપ કરવા લાગ્યા.

ययाति राजा को अब उनकी यह 1000 वर्ष की युवावस्था सर्वथा निरर्थक लगने लगी. उन्हें अपने पुत्र का यौवन छिननेका भी बहोत पश्चाताप हुआ. उन्होंने अपनी कामातुरता का त्याग करके अपना मन इस्वर प्राप्ति में लगाने का निश्चय किया. वे अपने पुत्र के पास गए और संकल्प करके उनकी बची हुई युवावस्था अपने पुत्र पुरु को देकर वह फिरसे वृद्ध होकर, वन में जाकर तपस्या करने लगे.

याद रहे, ययाति को यह सारी प्रेरणा भी इसी लिए हुई, क्योंकि वे धर्ममय जीवन जी कर भोग भोगते थे. जो लोग विधि-निषेध की अवज्ञा करके सतत भोग भोगते रहते है, वे अभागी लोग चाहे कितना ही भोग क्यों ना भोग लें, उन्हें यह कल्याणकारी प्रेरणा नहीं होती.

अनेक वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात मृत्यु के पश्चात ययाति राजा को अनेक प्रकार के स्वर्गों की प्राप्ति हुई. उसके बाद उन्हें वैकुण्ठ लोक में विष्णु भगवान के निकट रहेंने का भी अवसर मिला. लाखों वर्षों तक उच्च परलोक में रहने के पश्चात एक बार इंद्र के साथ चर्चा करते समय उनका अहंकार प्रकाशित हो गया, और इसलिए उन्हें स्वर्ग में से निष्कासित किया गया, और वह स्वर्ग में से निचे पृथ्वी पर गिर पड़े.



यह प्रसंग यह सूचित करता है की भोग विलास से विमुख होकर कठोर तपश्चर्या करने के पश्चात भी मनुष्य अपने तेज के अहंकार के कारण अपना पतन कर लेता है. इसलिए साधना के अंतर्गत साधक ये विशेष रूप से ध्यान रखे की तपस्चर्या तो की जाए, पर उसका अभिमान मन में ना आने पाए.

अंत में, ययाति राजा ने पृथ्वी के ऊपर पड़ने के बाद भी अपने साथ एनी 5 राजाओं को ज्ञान देकर उनका भी उद्धार किया, और तत्पश्चात सभी एक साथ दिव्य रथों में परलोक के लिए सिधार गए, और पृथ्वी के ऊपर अनंत काल के लिए उनकी कीर्ति प्रस्थापित कर गए.

बोध पाठ: ययाति राजा की कथा हम सब की कथा है. हम सब भी ययाति की ही भांति भौतिक और इन्द्रियगम्य विषयो में लिप्त रहते है. अपितु हमारे और ययाति राजा में अंतर इतना है की हम शत्रोक्त विधि-निषेधों का पालन करके धर्ममय जीवन नहीं जीते. और इसी लिए हम सदैव दुखी रहते है, और वासनाएँ अधूरी ही रह जाती है. वरन हमारे, ययाति राजा एक अत्यंत प्रमाणिक व्यक्ति थे. वे धर्म का पालन तो करते ही थे, अपितु उन्हें अपनी स्थिति का भी पूरा पूरा संज्ञान था, और वे अपनी स्थिति के अनुसार प्रत्येक परिस्थिति में पूरी प्रमाणिकता से निर्णय लेते थे.

ययाति राजा हमें दैनिक गृहस्थ जीवन में कैसे जिया जाए या सिखाते है. वे यह समजाते है की योगमय जीवन के द्वारा ही भोग भोगे जा सकते है. और योगमय जीवन के द्वारा ही इश्वर प्राप्ति संभव है. अन्यथा व्यक्ति रोगमय जीवन जीता है और जन्मजन्मान्तर पर्यंत भटकता रहता है.

और अंत में, जीवन के किसी भी भोग अथवा विषय का अंत इश्वर की प्राप्ति की प्रेरणा के साथ ही होना चाहिए. जीवन की सार्थकता इसी में है की व्यक्ति संभोग द्वारा भी समाधी का मार्ग खोज निकाले. मनुष्य जीवन का अंतिम सत्य और एकमात्र उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति ही होता है. इसके लिए शास्त्रों का सहारा लेकर यदि धर्ममय जीवन जिया जाए तो यह जन्म धन्य हो जाता है.

__/\__ श्री क्रिश्नार्पणमस्तु  __/\__

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