हिन्दुओं की घटती जनसँख्या का उपाय यदि कानून या सामाजिक जागृति से नहीं हो सकता, तो कैसे हो सकता है? - भाग 1
क्या जनसँख्या नियंत्रण कानून हिन्दुओं की घटती हुई जनसँख्या का उपाय हो सकता है? कल एक समूहमें इसी विषय को लेकर चर्चा हुई. इस विषय के बहोत से पहलु है इसलिए इसके ऊपर एक विस्तृत लेख लिखना ही मैंने उचित समजा.
हिन्दुओं की घटती जनसँख्या का विषय कुछ देर के लिए हम बाजूमें रखकर यह देखते है की सर्वप्रथम तो, क्या हमारे देशमें जनसँख्या नियंत्रण करनेकी कोई आवश्यकता है भी या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर मैं इस लेख में दूंगा, और फिर हिन्दुओं की जनसँख्या बढ़ाने के उपाय मैं अगले लेख, भाग 2 में दूंगा.
सर्वप्रथम तो, देश की जनसँख्या, देश का भार कभी नहीं होती. वे देश के संसाधन होते है. इसी लिए उन्हें अर्थशास्त्र की भाषामें "मानव संसाधन" कहा जाता है. तो स्वाभाविक ही है की संसाधन कभी समस्या नहीं होते. जितने अधिक संसाधन उतने अधिक अवसर. समस्या उनके सही उपयोग की, सही शिक्षण की, और सही अवसर प्रदान करनेकी ही होती है. यदि एक देश अपनी प्रजा को यह सब प्रदान कर सकता है तो उसके लिए अधिक जनसँख्या समस्या नहीं, एक वरदान है.
चलिए देखते है कुछ देशों के उदहारण...
अमरीका खंड के दक्षिण भाग में आया हुआ देश, वेनेज़ुएला एक प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर देश है. दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के भंडार इस देशमें भरे पड़े है. उनकी जनसँख्या उनके देश के अनुपातमें कम है. उदहारण के लिए, भारतमें प्रति वर्ग-किलोमीटर 394.5 लोग रहते है. जबकि वेनेज़ुएला में प्रति वर्ग-किलोमीटर केवल 84.7 लोग ही रहते है. इसका अर्थ है की अत्यधिक प्राकृतिक संसाधन और उसे उपभोग करने वाले लोग बहोत कम. तो आदर्श स्थितिमें तो इसका अर्थ यह होना चाहिए की वेनेज़ुएला के लोग बहुत पैसे वाले और वैभवशाली जीवन जीने वाले लोग होंगे. परंतु क्या ऐसा है? जी नहीं! अभी कुछ ही समय पूर्व वह देश दिवालिया हो गया था, और लोगों के पास खाने के लिए अनाज तक नहीं था. कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रसाशनने इतना भयंकर साशन किया की उस प्रजा को दाने दाने के लिए तरसना पड़ गया.
पूरा अफ्रीका खंड प्राकृतिक संपदाओं से लथपत है. उपजाऊ जमीन, खनिज के भंडार, हीरों की खाने.... क्या नहीं है उनके पास. और फिर अफ़्रीकी देशोंमें जनसँख्या भी इतनी घनी नहीं है. फिरभी किसीभी अफ़्रीकी देश की गणना प्रगतिशील देशोंमें नहीं होती. अधिकतर यह देश अपराध और नरसंहार के लिए ही जाने जाते है.
अब दूसरी ओर देखिए. चीन, जापान और सिंगापोर विश्वमें विकसित देशों की गिनती में आते है. इनमेसे किसी देश के पास कोई असाधारण प्राकृतिक संपदाएँ नहीं है. तीनों देश अपने खाद्यान्न के लिए भी अन्य देशों पर निर्भर है. जापान और सिंगापोरमें तो कृषि के लिए भूमि ही नहीं है. चीन, जापान और सिंगापोर की प्रति वर्ग-किलोमीटर जनसँख्या क्रमानुसार 943, 2900 और 8337 है (यह आंकड़े एरेब्ल भूमि के हिसाब से लिए गए है). जैसा मैंने पहले कहा, भारतमें प्रति वर्ग-किलोमीटर 334 लोग रहते है, और एरेब्ल भूमि के हिसाब से 753 लोग रहते है. भारत के पास इन तीनों देशों से अधिक प्राकृतिक संपदाएँ है. फिरभी यह तीनों देशों की गणना भारतसे अधिक विकसित देशोंमें होती है.
इसका अर्थ स्पष्ट है की अधिक जनसँख्या कभी समस्या नहीं होती. समस्या होती है उनके लिए पर्याप्त अवसर उत्पन्न करनेकी.
पर क्या कम जनसँख्या होना एक समस्या हो सकती है? बिलकुल हो सकती है. और इस समस्या से देशके बहोत सरे विकसित देश आज जुज रहे है. आइये देखते है की कम जनसँख्या वाले देशोंकी क्या परिस्थिति है.
केनेडा, अमरीका, ओस्ट्रेलिया, यूरोपीय देश और रशिया ऐसे देश है जिनकी प्रशासनिक व्यवस्था ठीक है, उनके पास उनकी प्रजा को देनेके लिए अनेक अवसर है, उनके पास (यूरोपीय देशों को छोड़कर) अत्यधिक प्राकृतिक संपदाएँ भी है. यदि उनके पास कुछ नहीं है, तो वो है जनसँख्या! यही कारण है की उन्हें अपने देश की प्रगति के इंजन को गतिशील रखने के लिए सतत विदेशी लोगों को अपने देशमें "आयात" करना पड़ता है. केनेडा और ओस्ट्रेलिया जैसे देशों की कर निति ही ऐसी है की बहार से आये लोग श्रम कर करके सरकार को टेक्स जमा करें, और इस पैसे से वे अपने मूल नागरिकों को अच्छी सुविधाएँ मुफ्त में उपलब्ध करवाएं. यह देश जानबुजकर अन्य देशों से गैर क़ानूनी रूपसे लोगों को आने देते है जिससे की उनके नागरिकों को सस्तेमें श्रमिक उपलब्ध हो जाएं, जिससे की वे दुनिया के अधिक जनसँख्या वाले देशों के साथ स्पर्धा कर सकें.
पर इनकी विडम्बना इन युक्तिओं से दूर नहीं होती, अपितु बढ़ जाती है. जैसे जैसे वे विदेशी लोगोंको अपने देशमें बुलाते है, वैसे वैसे उनके देशमें विदेशी मूल के नागरिक भी बढ़ते जाते है. फिर आगे चलकर लोकशाही होनेके कारण विदेशी मूल के लोगों का वर्चस्व बढ़ता गया और अब ऐसा समय आ गया है की आने वाले २० सालों में इन देशोंमें वहां की मूल प्रजा ही अल्पसंख्यक बन जाएगी. यही कारण है की यूरोप और रशियामें अधिक बच्चे पैदा करनेके लिए सरकार वित्तीय सहाय करती है, प्रोत्साहित करती है, पर इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ रहा. उनकी जनसँख्या सतत घट रही है. अब उनकी समस्या यह है की आगे चलकर एशियाई देश, की जिनकी जनसँख्या अधिक है, वे स्वयं भी विकसित हो रहे है, और वहांके लोग उनके अपने देशमें बहुल हो रहे है. इसका अर्थ है की जो उन्होंने दशकों तक इस पृथ्वी पर राज किया, उस राज का अंत अब निकट है. भविष्यमें वही देश दुनिया पर साशन करेंगे जिनकी जनसँख्या अधिक है. विश्वके महान युद्धों का भी यही निष्कर्ष है की जो देश अधिक आहुति दे सकता है वही अंतमें जीतता है. आहुति देने के लिए सर्प्रथम तो देशमें जनसंपदा होना आवश्यक है.
सऊदी अरब भी एक बहोत कम जनसँख्या वाला, और अत्यधिक प्राकृतिक सम्पदा वाला देश है. वह एक राजाशाही देश है. वहां लोकशाही का कोई चक्कर ही नहीं है. इसलिए वे जैसा चाहे वैसा कानून ला सकते है. इसका लाभ उठाकर उन्होंने ऐसा नियम लाया की किसीभी विदेशी को सऊदी का नागरिकत्व नहीं मिलेगा, कोई विदेशी सऊदी में स्थावर संपत्ति नहीं खरीद सकता, कोई विदेशी किसी सऊदी कन्या से विवाह नहीं कर सकता. सऊदी राजाने यह काम बहोत ही दूरदर्शिता से किया है. इससे उन्होंने यह सुनिश्चित किया की विदेशियों के श्रम का लाभ तो उठाया जाए, परंतु उन्हें कभी नागरिकत्व का लाभ ना दिया जाए. फिरभी जनसँख्या कम होनेके दुष्परिणामों से वह भाग नहीं सके. आज उनके पास अपनी कही जा सके ऐसी कोई सेना ही नहीं है. इतनी समृद्धि और वैभव को छोड़कर सेना में भला कौन भारती होगा? यही कारण है की आज सऊदी की सेनामें पाकिस्तानी, बंगलादेशी इत्यादि सैनिक ही है, और शत्रुओं से अपनी रक्षा के लिए वे अमरीका के द्वारा दिए गए संरक्षण पर निर्भर है. यह ऐसी बात है की आपने अपनी तिजोरी की सुरक्षा चोरों को ही दे रखी है. जबतक सब ठीक चल रहा है, तब तक चल रहा है, जब ये लोग बिगड़ गए तो... जय रामजी की...
तो हमने देखा की कम जनसँख्या होनेका वास्तविक अर्थ है, कालांतर में देशके अस्तित्व को ही दांव पर लगा देना.
अब आते है भारत की बात पर. भारतमें भी हम देख सकते है की जो विकसित राज्य है वहांपर श्रमिकों की अत्यधिक मांग है, और सतत यह मांग बढती ही जा रही है. समस्या केवल अल्पविकसित प्रदेशोंमें ही है. यदि भारतमें जनसँख्या और उनकी आपूर्ति की कोई समस्या होती, तो बांग्लादेशसे दैनंदिन सेंकडो के हिसाब से लोग भारतमें घुसपेठ नहीं कर रहे होत्ते. यह एक बहोत बड़ी सीख है की यदि भारतमें जनसँख्या, और खास करके हिन्दू जनसँख्या घट गई तो फिर हमारे पडोसी देशों से घुसपेठ कोई रोक नहीं पाएगा, क्योंकि फिर वो एक अनिवार्य आवश्यकता बन जाएगी.
घटती जनसँख्या का एक सिमित उपाय यह है की उत्पादन कार्य को अधिक से अधिक यांत्रिक किया जाए - अर्थात ऑटोमेशन. पर इसकी भी एक सीमा है. विकसित देशोंने यह पहलेसे कर रखा है और फिरभी घटती हुई जनसँख्या से उत्पन्न समस्याओं से उनका कोई छुटकारा नहीं है. इसलिए किसीभी द्रष्टिकोण से देखा जाए, तो भी, अधिक जनसँख्या कोई समस्या नहीं है, अपितु कम जनसँख्या अवश्य ही एक बहोत बड़ी समस्या है.
अब हम इस श्रेणी के अगले लेखमें (भाग 2 में) देखेंगे की क्यों हिन्दुओं की जनसँख्या कम हो रही है, क्यों उसे बढानी चाहिए और बढाने के लिए क्या उपाय किये जा सकते है.
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