क्या भारत में वास्तव में सती प्रथा थी? शास्त्रों की दृष्टि से 'सती' का अर्थ क्या है? क्यों स्त्री को पतिव्रता होना चाहिए?
यदि आप 10वी कक्षा से अधिक पढ़े हुए है तो सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध, राजा राममोहन राय इत्यादि विषयों में अवश्य ही पढ़ा होगा. हमारे दुर्भाग्य से (वैसे तो हमारे सदभाग्य से) हमको जो इतिहास पढाया जाता है वह इतनी बुरी पद्धति से सिखाया जाता है की कोई भी उसे याद न रख पाए. परंतु ये सती प्रथा हमको बार बार, लगातार इतिनी याद कराइ जाती है की हम ये भूल नहीं पाते की हमारे पूर्वज कितने पिशाची थे की जो अपनी बहुओं को जबरन जला देते थे.
यहाँ ध्यानाकर्षक बात यह है की सती की इस प्रक्रिया को "प्रथा" का नाम दिया गया. किसी प्रक्रिया का प्रथा होनेका नियम यह है की समाज द्वारा वह व्यापक रूपसे आचरण में होनी चाहिए. इसका अर्थ यह हुआ की समाज की प्रत्येक विधवा को अपने पति की चितामें होम दिया जाता था. क्या यह मानने योग्य बात है? यदि ऐसा होता तो किसीके कुल में कोई जीवित विधवा स्त्री होनी ही नहीं चाहिए थी. और प्रत्येक कुल में कमसे कम 15-20 सतियाँ होनी चाहिए थी, क्योंकि ये प्रथा तो वर्षों से चली आ रही थी! क्या ऐसा वास्तवमें है? यदि नहीं है तो हमें यह प्रश्न क्यों नहीं होता?
मैंने बहोत कम परिवार देखे है जिसमें कोई सती हुई हो. परंतु मेरे सदभाग्य से मेरे ही कुल में एक सती हुई है. सात पीढ़ी पहले उस भगवती देवी ने अपने पति के पीछे अपने प्राणों की आहुति दी थी. वे अत्यंत पतिव्रता, वात्सल्ययुक्त, धार्मिक और नीतिवान स्त्री थी. वे साक्षात् लक्ष्मी की अवतार थी. उनके पति की मृत्यु के पश्चात उनके परिवारजनों ने उन्हें बहोत समजाय था, पर उनका पति के पीछे प्राण त्याग करनेका निर्णय अडिग था. पति की चिता पर बैठने से पहले उन्होंने पुरे परिवार को अनेक आशीर्वाद दिए, पुरे कुल की सदैव रक्षा करते रहेनेका वचन दिया, कुमकुम पग किये और निर्भयता से पति के साथ स्वर्गलोक की यात्रा प्रारंभ की. उनके स्वसुर पक्ष और पीहर पक्ष में दोनों तरफ सात पीढ़ी में वे एक ही सती हुई है, और दोनों ही कुल उनको आज भी पूज रहे है. हमारे घरमें आज भी बहार निकालते समय "जय सती माँ" बोला जाता है.
परंतु हमारे इतिहास के पाठ्यपुस्तकों में इस पूरी प्रक्रिया को कैसे सिखाया जाता है? यहाँ यह बात इंगित करने योग्य है की राजा राममोहन राय और उनके जैसे अनेक जीतने भी तथाकथित समाज सुधारक हुए, वे सब वास्तवमें अंग्रेजों के पालतू कुत्ते थे. इस कठोर भाषा के लिए क्षमाप्रार्थी हूं, परंतु उन लोगों के लिए यह यथार्थ तुलना है. उन्हें हिन्दू समाज के साथ स्नान-सूतक का भी संबंध नहीं था, और ना ही कोई समज.
यह बात तो हुई की कैसे सती अपना देह त्याग करती है, परंतु उसका जीवन कैसा होता है? उनके मूल्य, उनके सिद्धांत कैसे होते है? इन प्रश्नों के उत्तर शास्त्र देते है.
चेतावनी: यदि आप एक आधुनिक नारीवादी है तो इस लेख को यहीं से पढना बंध कर दें ये आपके रक्तचाप और मधुप्रमेह के हितमें है. यहाँ से आगे अपने जोखिम पर ही पढ़ें.
शास्त्रों की दृष्टि से 'सती' के लक्षण कैसे होते है?
यदि एक शब्द में ही इस प्रश्न का उत्तर देना हो तो कह सकते है की सती का अर्थ है "पतिव्रता" स्त्री. सनातन शास्त्रों में एक बात में स्पष्टता है की स्त्री का एकमात्र धर्म पतिव्रता होना है. स्त्रियों को कठोर तपश्चर्या, सन्यास, वेदपाठ इत्यादि करनेसे मुक्ति मिली है. उनका मार्ग सुगम करने के लिए उन्हें केवल मात्र पतिव्रता होनेको ही कहा गया है.
पतिव्रता अर्थात क्या?
एक विवाहिता स्त्री के लिए पति ही उसका भगवान्, उसका सबकुछ होता है. इसी लिए पति को 'पति परमेश्वर' कहा जाता है. जैसा समर्पण अपने इष्टदेव के लिए किया जाता है, ऐसा ही समर्पण और ऐसी ही भक्ति पति की भी होनी चाहिए. पति, अपने संतान, अपना परिवार यह सब एक पतिव्रता स्त्री के लिए सर्वोपरि है. अपने पति के सुख में ही अपना सुख मानना, मनमें भी कोई परपुरुष का विचार भी नहीं करना, और अपने शील का रक्षण करना, यह एक पतिव्रता स्त्री का धर्म है. और स्त्रियों के लिए यह एकमात्र धर्मादेश दिया गया है. इसके उपरांत कोई अन्य आदेश नहीं है.
हमारे शास्त्रों में आनेवाली लगभग प्रत्येक स्त्री की कथा यह सूचित करती है की स्त्री वही उत्तम है जो पतिव्रता है. यहाँ इस विषय के उपर रामायण में आनेवाला सती अनसूया और सती सीता माता का संवाद प्रस्तुत करता हु. मेरा आग्रह है की समय निकाल कर 6 मिनिट का यह छोटा वीडियो अवश्य देखें.
अर्थात: अहल्या, द्रौपदी, कुन्द्ती, तारा (वानरराज बाली की पत्नी) और मंदोदरी, यह पांच महान सतियाँ है की जिनका स्मरण करनेसे महापाप का नाश होता है..
यहाँ उपरोक्त पंचों स्त्रियों के जीवनमें एक समानता है. यह पंचों स्त्रियों के जीवन में एक से अधिक परुषों का सहवास हुआ था. फिरभी इन सब सतियों की पतिनिष्ठा किसी भी अन्य सती से कम नहीं है. उन्होंने उनके जीवन की घटनों को अपना प्रारब्ध समजकर स्वीकार किया और पति समर्पण में सम्पूर्ण रत रही.
इस प्रकार, जीवनकी निष्फलताओं, दुर्घटनाओं इत्यादि को भी स्वीकार करके, पति के छोटे-मोटे दोषों, अवगुणों और कमियों को दुर्लक्षित करते हुए, उसीको अपना परमेश्वर समजकर, पति के सुख दुःख को अपना सुख दुःख समजकर जीना, यही एक उत्तम पतिव्रता होनेका लक्षण है.
यदि स्त्री को पतिव्रता होनेका आदेश है तो पुरुष के लिए क्या आदेश है?
यदि संक्षेप में कहूँ तो एक तरफ स्त्रियों के लिए आदर्श सीता माता है, तो पुरुषों के लिए आदर्श प्रभु श्री राम है. एकपत्नी व्रतधारी श्री राम, सर्वगुण संपन्न और सर्व विद्याओं के ज्ञाता थे. कई अर्धज्ञानी मानते है की सनातन धर्म में पुरुषों को अनेक पत्नी रखनेका अधिकार दिया गया है. पर ऐसा नहीं है. इस विषय में अधिक जानकारी के लिए मेरा यह लेख पढ़ें.
पुरुष घर का मुखिया होता है. परिवार नीतिवान और धर्ममय जीवन जिये यह सुनिश्चित करने के लिए सर्वप्रथम तो परुष को स्वयं धर्म का पूर्ण ज्ञान लेना आवश्यक है. ब्रह्मचर्याश्रम में प्रत्येक विद्याओं और आध्यात्मिक शास्त्रों का गहन अभ्यास करनेके उपरांत ही गृहस्थाश्रम में प्रवेश करें, और परिवार में सभी सदस्यों का जीवन सात्विक और धर्ममय हो ऐसा प्रयत्न करें. दैनिक त्रिकाल संध्या करें, यज्ञों, अनुष्ठानों करना, अपने कुल की परम्पराओं को आगे बढ़ाना, इत्यादि दायित्वों को पति को ही निभाना होता है. इसके उपरांत अपने और अपने वंश के कल्याण के लिए अष्टांग योग का यथाशक्ति आचरण करना.
अष्टांग योग पर अधिक जानकारी के लिए यह 10 मिनिट का वीडियो देखें.
इतना कुछ करने के उपरांत भी पति का धर्म यहीं समाप्त नहीं होता. पत्नी अपने पति को इश्वर मानती है, इसलिए इश्वर का यह कर्तव्य भी है की अपनी पत्नी को लौकिक और परलौकिक, दोनों ही विद्याओं का यथाशक्ति ज्ञान प्रदान करे.
स्पष्ट है की एक आदर्श स्त्री से अधिक एक आदर्श पुरुष का जीवन जीना अधिक कठिन है.
स्त्रिओं को 'सती' अथवा 'पतिव्रता' क्यों होना चाहिए?
उन लोगों के लिए जीवन अत्यंत कष्टदायी होता है जो अज्ञानी होते है. अल्प समय के लिए वे लौकिक वैभव-विलास का सेवन कर सकते है, परंतु विषयों का उपभोग कभी तृप्ति देने वाला नहीं होता. विषयभोग से तो मात्र वासनाएँ बढती है. घटती नहीं. यह अमूल्य मनुष्य जीवन पाप में पड़कर व्यर्थ करना मुर्खता है. इस विषयमें मेंरा एक अन्य लेख यहाँ पर पढ़ा जा सकता है. यदि किसी स्त्री को अपने और अपने संतानों का कल्याण करना है तो उसे पतिव्रता होना आवश्यक है.
यहाँ एक महाभारत की कथा प्रस्तुत करता हूं.
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व्याध गीता की कथा:
महाभारतमें मिथिला नगरी का एक प्रसंग आता है जिसमें एक सामान्य ब्राह्मण युवक सिद्धियाँ प्राप्त करनेके लिए जंगलमें तप कर रहा होता है. धीरे धीरे उसका तपोबल बढ़ने लगता है. एक दिन वो वृक्ष के निचे बैठकर तप कर रहा था तभी एक पक्षीने उसके ऊपर लाद कर दी. उसका तप भंग हो गया और उसने क्रोध से ऊपर की ओर बैठे पक्षी पर द्रष्टि डाली. पक्षी इस क्रोध की अग्नि से जलकर भस्म हो गया. यह देखकर वह ब्राह्मण अत्यंत हर्षित हो उठा और अपनी शक्ति पर अभिमान करने लगा.
उसके बाद वह भिक्षा मांगने गाँव में गया. वहां एक साधारण घर की अतिसाधारण स्त्री के घर भिक्षा मांगी. परंतु वह स्त्री अपने पति को भोजन करा रही थी इसलिए उसने अपने पति को छोड़कर उठकर भिक्षा देने के लिए जाना अनुचित समजा. ब्राह्मण भिक्षा मांगता रहा और स्त्री अपने पति को पुरे धैर्य के साथ भोजन कराती रही. वह सतत ब्राह्मण को रुकने के लिए कहती रही. यह देख ब्राह्मण को क्रोध आ गया. जब वह स्त्री अपने पति को सुखपूर्वक भोजन कराकर ब्राह्मण के लिए भिक्षा ला रही थी तब ब्राह्मण उसे भस्म करने के लिए उसकी ओर क्रोध से देख रहा था. परंतु उसकी सिद्धि का कोई असर उस स्त्री पर नहीं हो रहा था. अब ब्राह्मण विस्मित हो गया और सोचने लगा. यह देख स्त्री ने हसकर कहा, हे ब्राह्मण देव, आपकी इस भस्म करने वाली विद्या का मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा!
यह सुन ब्राह्मण आश्चर्य चकित हो गया. वह समज नहीं पाया की एक गंवार स्त्री के पास इतनी सिद्धि कैसे आ गई की वह मेरे मन की बात जान गई, और मेरी सिद्धियों का निषेध भी कर दिया! स्त्री यह सब समज गई और उसने उत्तर दिया की उसके पास यह सिद्धि मात्र पतिव्रता होने से आई है. इसके उपरांत उसने अपने गुरु का पता भी उस ब्राह्मण को दिया और वहां उसे जाने के लिए कहा.
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इस कथा से यह समजमें आता है की केवल पतिव्रता स्त्री होने से ही स्त्रियों को अनेक प्रकार की सिद्धियाँ और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त हो जाती है. वैसे भी, स्त्रियों के लिए समर्पण भाव, कुटुंबप्रेम, पतिप्रेम, संतान प्रेम इत्यादि स्वाभाविक ही होते है.
एक और कथा पुराणों में दी गई है जो की एक आदर्श स्त्री का वर्णन करती है. किसी स्त्री को "सती सावित्री" की उपमा देना एक सर्वोच्च बहुमान माना जाता है. तो चलिए देखते है की यह सती सावित्री कैसी थी...
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सती सावित्री की कथा:
सावित्री एक चक्रवर्ती सम्राट की पुत्री थी. उसके पिता बहोत लंबे समय तक किसी संतान के न होने से दुखी थे. उन्होंने एक यज्ञ किया जिसमें सूर्य भगवन को प्रसन्न किया. सूर्य भगवान् ने प्रसन्न होकर अपने ही तेज स्वरुप एक बेटी राजा को भेंट में दी. सूर्य शक्ति से तेजोमय होनेके कारण उसका नाम सावित्री रखा गया. राजा को इसके अतिरिक्त और कोई संतान नहीं थी.
विवाह योग्य आयु होने पर राजा ने सावित्री को अपना पति स्वयं चुनने को कहा. सावित्री को अपने योग्य कोई कुंवर न मिलनेसे वह एक अगाध जंगल में गई. वहां अपने शत्रु द्वारा देशनिकाल पाए हुए एक राजा और उसका एक महातपस्वी और ज्ञानी राजकुमार - सत्यवान - रहते थे. सावित्री को वह कुंवर अपने योग्य लगनेसे उसने अपने पिता को यह बात कही. उसी समय नारद मुनि भी वहीँ उपस्थित थे. नारद मुनिने कहा की यह कुंवर तो अति उच्च गुणों वाला है, परंतु उसका आयुष्य मात्र एक वर्ष का ही शेष रहा है. इसलिए सावित्री को उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए.
सवित्रिने यह कहकर नारदजी की बात नहीं मानी की वह सत्यवान को मन से अपना पति मान चुकी है. इसलिए अब उसके लिए किसी और पुरुष से विवाह करना संभव नहीं है. अब उसका भाग्य सत्यवान के साथ ही जुड़ा हुआ है. उसके बाद दोनों का विवाह होता है और दोनों सुखरूप जंगल में रहने लगते है. जब एक वर्ष की अवधि का अंत निकट आ गया तो सावित्रीने महादेव् की कठोर तपस्या करके यह वरदान मांग लिया की जब मृत्यु की घडी आये तो उस समय वह यमराज को देख पाए.
उसके बाद जब सत्यवान की मृत्यु आई तो यमराज को आते हुए सवित्रिने देखा. यमराज जब सत्यवान का जिव लेकर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे पीछे गई और अपने पति को मुक्त करने के लिए विनती करने लगी.
यमराज भी उसकी तपस्या के आधीन हो गए और पति के जीवन के अतिरिक्त कोई और वरदान मांगनेको कहा. सवित्रिने अपने ससुरजी का राज्य वापस लौटाने का वरदान माँगा. यमराजने तुरंत ही स्वीकार किया. उसके बाद भी पीछा नहीं छोड़ने के कारण यमराज ने दूसरा वरदान मांगने को कहा. इसबार सावित्रीने अपने पिता के लिए (जिनकी सावित्री के अतिरिक्त और कोई संतान नहीं थी) अनेक तेजस्वी पुत्रों की मांग की. इसपर भी यमराज ने "तथास्तु" कहा.
इसके बाद भी सावित्रीने यमराज का पीछा नहीं छोड़ा और अपने तपोबल से उनके साथ यमलोक जाने लगी. इस समय यमराजने थककर उसे तीसरा और अंतिम वरदान मांगने को कहा. तब सवित्रिने अपने लिए अनेक औरस पुत्र (अपने पति से ही हुए पुत्रों को "औरस" कहते है) मांग लिए. यमराज अपने वचन से बाध्य थे और सावित्री के पति प्रेम से अत्यंत प्रसन्न भी थे. और वरदान पूर्ण करने के लिए उन्हें सत्यवान को छोड़ना आवश्यक भी था. इसलिए यमराज ने सत्यवान को फिरसे जीवित कर दिया और सावित्री को आशीर्वाद भी दिए.
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यहाँ एक बात विशेष ध्यानाकर्षक है की सावित्रीने सर्वप्रथम अपने स्वसुर - अर्थात अपने घर - के लिए वरदान माँगा. उसके बाद अपने पिता के लिए. और अंत में अपने लिए वरदान माँगा. एक आदर्श विवाहिता के लिए यह एक उच्चतम उदहारण है. इससे बड़ा आदर्श कोई हो ही नहीं सकता.
ऐसी तो अनेक कथाएँ शास्त्रों में वर्णित है और सभी कथाओं का सन्देश एक ही होता है. स्त्रियों के जीवन का एक मात्र आदर्श 'पतिव्रता' होना ही है.
तो क्या इसीलिए बालिकाएं अच्छा पति मिलने के लिए व्रत करती है? यदि बालिकाएं व्रत करती है तो बालक क्यों अच्छी पत्नी के लिए व्रत नहीं करते?
हां. कन्याओं को पतिपरायाणता के संस्कार मिले इसी लिए उसे बाल्यकाल से ही व्रत कराए जाते है. बालक अच्छी पत्नी पाने के लिए व्रत नहीं करते है क्योकि पत्नी का पतिव्रता होना स्वाभाविक ही मान लिया गया है. एक स्त्री में यह गुण निहित ही होते है. और फिर पति का दायित्व कहीं अधिक होता है. पत्नी को धार्मिक, आध्यात्मिक और औद्योगिक ज्ञान देनेका काम भी पति का ही है. इसलिए बालक ब्रह्मचारी बनकर कठोर परिश्रम से प्रत्येक विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करे ऐसी अपेक्षा है.
परंतु क्या स्त्री सन्यासिनी बनकर अपनी आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकती? विवाह करके पतिव्रता होना आवश्यक है?
हां. नियम यही है की स्त्रियों को सन्यासी नहीं होना चाहिए. स्त्रियों की समाजमें अनेक मर्यादाएं होती है. इसलिए स्त्रियों को सन्यासी बनना उपयुक्त नहीं है. इस विषय को लेकर गौतम बुद्ध की एक कथा उल्लेखनीय है.
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गौतम बुद्ध और उनकी पत्नी की कथा:
सिद्धार्थ नामक राजकुमारने जीवन का सत्य मिल जाने पर सन्यास लेनेका निर्णय लिया. अपना नाम गौतम बुद्ध रखकर उसने सन्यास तो लिया, परंतु अपने संसार का मोह नहीं छोड़ पाए, इसलिए अपनी पत्नी यशोधरा और अपने पुत्र को साथ रखकर सन्यास लिया. पत्नी यशोधरा स्वयं भी एक भिक्षुणी बन गई, फिरभी वे बुद्ध के साथ आश्रम में ही रहती थी. बहोत समय बीतने के बाद, एक गहरा ज्ञान पाने के बाद गौतम बुद्ध को पश्चाताप हुआ की उन्होंने केवल अपने संसार-मोह के वश अपनी पत्नी को साथ रखा. उन्होंने अपने शिष्य से कहा की उनकी इस एक भूल के कारण उन्हें जो सन्देश देना है उसका आयुष्य एक सहत्र वर्ष कम हो गया.
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गौतम बुद्धने ऐसा क्यों कहा? इसलिए क्योंकि वे जानते थे की उनके शिष्य भी अब आश्रममें भिक्षुणियों को रखनेसे बचेंगे नहीं, और समयांतर में व्यभिचार भी हो कर रहेगा. लोग साधुओं को शंका की दृष्टि से देखेंगे. उनके संप्रदाय को दोष लगेगा. और अंतमें उनका सन्देश लंबे समय तक नहीं टिकेगा.
इसी कारण से स्त्रियों को सन्यास लेनेका विधान सनातन शास्त्रों में नहीं है.
परंतु इतिहास में ऐसे प्रसंग आते है जिसमें स्त्रियोंने अपने पति को त्याग करके आध्यात्मिक उन्नति की हो?
जी हां. ऐसे प्रसंग है. परंतु अपवाद मात्र है. अपवादों को नियम मानना योग्य नहीं है. जो सन्यासी स्त्रियाँ थी वे अत्यंत विचक्षण और तपस्विनी थी. उनके उस जीवनमें आने से पहले वे एक उच्च आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त कर चुकी थी. उदहारण के लिए साध्वी मीराबाई. बाल्यकाल से ही मीराबाईने श्री कृष के लिए अदम्य प्रेम और भक्ति किये. यह संस्कार उनके जन्म जन्मान्तर के थे. और फिर उन्होंने बचपन से ही श्री कृष्ण को ही अपना पति माना था. इसलिए अपवादों को बिना समजे उन्हें नियम समजकर धर्म के विरुद्ध कार्य करना योग्य नहीं है.
परंतु यदि पति ही पापी और गुणहिन् हो तो पतिव्रता होना कितना योग्य है?
भारतियों की एक बड़ी समस्या यह है की वे प्रत्येक धार्मिक बातों में कोई न कोई अपवाद ढूंढ़कर निरर्थक विवाद करते है. ऐसे तर्क वितर्क में जो मूल कार्य करनेको कहा गया है वो नहीं कर पाते. क्या इस विश्व के सारे पति पापी और गुणहिन् ही है? और जीतने पापी पति है उनमेंसे कितनों की पत्नियाँ ऐसी है जो आध्यात्मिक उन्नति करना चाहती है? और ऐसे भी कितने पति है जो अपनी ख़राब पत्नी के कारण ही स्वयं ख़राब बन गए है? कितने पति है जिनकी पत्नियों ने उसे सुधारने के लिए प्रयत्न किया हो?
हमें ये सोचना चाहिए की हमारी स्वयं की पत्नी या पति में अच्छे गुण कौन कौन से है! कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं होता. अवतारी पुरुष भी नहीं. तो फिर हम तो सामान्य मनुष्य है. हमें वही जीवनसाथी मिला है जो हमें अपने कर्मो के आधार पर मिलना चाहिए.
इसलिए शास्त्र तो स्पष्ट रूपसे यही कहते है की पति के अवगुण देखे बिना उसे ही परमेश्वर मानना, यही एक स्त्री के लिए कल्याणकारी मार्ग है. इस विषयमें दो उदहारण देखते है.
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जालंधर की कथा:
जलंधर भगवान शिव के अंश से एक महापराक्रमी अंशावतार था. उसका उपद्रव बढ़ जाने के कारण उसका संहार करना आवश्यक बन गया था. शिव का ही अंश होनेके कारण वे वैसे ही अजेय था. और फिर उसकी वृंदा नामक पत्नी थी जो की एक अनन्य पतिव्रता और तपस्विनी स्त्री थी. पतिव्रत के कारण उसमें प्रकृति की प्रत्येक शक्तियां समाहित थी. वह सतत अपने पति की विजय के लिए तपस्या करती थी. इसी कारण जालंधर किसी अन्य देव तो क्या, स्वयं ब्रह्मा, विशु, महेश के लिए भी अजेय बन गया था. इस समस्या का समाधान लाने के लिए विष्णु भगवन ने वृंदा का सतीत्व भंग करने के लिए लीला की. इसके बाद जालंधर की शक्ति कम हुई और फिर शिवजी ने जालंधर का वध किया.
अपने साथ छल होनेसे कोपित वृंदा के ऊपर कृपा करके विष्णु भगवानने उसे अपनी पत्नी का स्थान दिया और पृथ्वी लोक पर तुलसी के रूपमें उसका अवतरण किया. इसी घटना के अनुलाक्ष्यमें तुलसी विवाह किये जाते है.
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उपरोक्त कथा से दो बातें स्पष्ट होती है. एक तो ये की एक सती का तेज इतना होता है की उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों मिलकर भी परास्त नहीं कर सकते. और दूसरी बात यह की वृंदा जानती थी की उसका पति उपद्रवी है और दैवी शक्तियों का नाश करने वाला है. फिरभी जालंधर उसका पति होनेके कारण वो उसे ही समर्पित रही और अंत में उसका स्वयं का कल्याण हुआ. इस प्रकार एक उपद्रवी की पत्नी होनेके उपरांत भी वह पाप की सहभागी नहीं हुई और उसे सर्वोच्च स्थान मिला.
अब हम मंदोदरी की कथा देखते है.
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मंदोदरी की कथा:
मंदोदरी एक अत्यंत ही सुन्दर तरुणी थी. उसके पिता एक महाबली राक्षस 'मायासुर' थे. राक्षसों के राजा रावणने एकबार मायासुर के घर मंदोदरी को देखा और मोहित हो गया. उसने मायासुर को धमकी देकर जबरन मंदोदरी के साथ विवाह किया. मंदोदरी एक अत्यंत सुशिल और धार्मिक स्त्री थी. वह जानती थी की उसका पति एक राक्षसी प्रवृति वाला व्यक्ति है, वह उसे समजाति भी थी. फिरभी वह सुधर नहीं रहा था. इसके उपरांत भी मंदोदरी एक महान पतिव्रता बनी रही और अंत में उसे प्रभु श्री राम के आशीर्वाद मिले और उसकी सदगति हुई.
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उपरोक्त दोनों उदहारण यह सूचित करते है की पति के अवगुण भी स्वीकार कर यदि पत्नी अखंड पतिव्रता बनी रहे तो उसका अंत में कल्याण ही होता है. पति के किये पाप पत्नी को नहीं लगते. यदि तर्क वितर्क में पड़ा जाए तो कोई पूज्य नहीं बच जाता. और फिर प्रत्येक पति रावण भी तो नहीं होता. इसलिए बिना तर्क वितर्क किये पत्नी को चाहिए की पति को समर्पित रहे.
परंतु ऐसी परंपरा से तो पति अपनी पत्नी को पांव की जुती ही समजेगा, ऐसा नहीं हो सकता?
इस प्रश्न को उसके गौण होने के कारण नहीं, अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण होनेके कारण अंतमें रखा गया है. जो पुरुष केवल अपने पति होने के कारण ही अपनी पत्नी से अपनेको पुजवाने की वृत्ति रखता है वह महा अधम व्यक्ति है. शास्त्रों में पत्नी से अनेक गुना नियम पति के लिए दिए गए है. पति को सदैव स्मरण रखना चाहिए की जिस घरमें स्त्रियाँ पूज्य होती है उसी घरमें देवताओं का वास होता है.
घर की समृद्धि घरकी लक्ष्मी के कारण ही होती है. स्त्री चाहे कैसी भी हो, उसका कल्याण करनेका, उसे प्रसन्न रखनेका और उसकी लौकिक व् परलौकिक उन्नति करनेका दायित्व पुरुष का ही होता है. सती अनसूयाने भी सीताजी को इसी प्रकार कहा है. इसलिए यह लेख पढ़कर पतियों को हर्षित होनेके वरन अपने कर्तव्य समजने चाहिए. अन्यथा आपकी पत्नियाँ तो सरलता से उन्नति प्राप्त कर लेगी, आप रह जाओगे ज्यों के त्यों!
अब हम फिरसे स्मरण करते है की इस लेख का मूल विषय क्या था! इस लेख का विषय था 'सती प्रथा'! हमने देखा की भारतीय संस्कृति में सती शब्द का कितना व्यापक अर्थ है. और हमें पढाया जाता है उसके बिलकुल विपरीत. यदि सती शब्द की वास्तविक व्याख्या पढाई जाती होती तो क्या आज के समाज की यह परिस्थिति होती? विचारणीय है.
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