भाषा की उत्पत्ति : क्या मनुष्य ने भाषा बनाई या भाषा मनुष्य को देवताओं से मिली?

हम यह मानते है की वेद अपौरुषेय है, अर्थात मनुष्यनिर्मित नहीं है, वे सृष्टि के साथ स्वयं उदित होते है और श्रिष्टि के साथ ही लय हो जाते है. इस सिद्धांत को बड़ी सरलतासे सिद्ध किया जा सकता है (पढ़िए वेद मानवनिर्मित नहीं, अपौरुषेय और नित्य हैं: एक तार्किक विवेचन)। परन्तु इसके साथ ही साथ संस्कृत भाषा भी अपौरुषेय बन जाती है क्योंकि वेद संस्कृत भाषा में ही बने है. हम तो वैसे भी संस्कृत को "देव भाषा" ही मानते है। ऐसी भाषा जो देवता बोलते है। तो इसको मनुष्यके द्वारा निर्मित होनेका तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। फिरभी, आधुनिक भाषाविदों का मत इससे बिलकुल उल्टा है. आइए देखते है की आधुनिक भाषाविद क्या कहते है। 

१. सारी भाषाओँ का मूल संस्कृत नहीं है
२. सारी भाषाएं मनुष्यों द्वारा क्रमशः, समयके साथ विकसित होकर बनती गई (evolution of languages)
३. कुछ भाषाविद मानते है की पशु पक्षिओं की ध्वनि सुनकर मनुष्योंने प्रथम अक्षर बनाए

उपरोक्त सारे विचार निराधार और मनघडंत तो है ही, वैज्ञानिक द्रष्टिकोणसे असंभव भी है. 

इस सारे विषय पर स्वामी करपात्री महाराजने एक अतिउत्तम शोध लेख लिखा है। उस लेख का संक्षिप्त स्वरुप मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूं।   

स्वामी करपात्री जी महाराज के भाषा-विज्ञान संबंधी विचारों का एक विश्लेषण

मनुष्य और पशुओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर केवल शारीरिक बनावट या बुद्धि का नहीं, बल्कि भाषा का भी है। मनुष्य अपने विचारों को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर सकता है, ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचा सकता है और जटिल विषयों पर चिंतन कर सकता है। लेकिन एक मूल प्रश्न आज भी विचारणीय है—आखिर भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या मनुष्य ने धीरे-धीरे पशुओं की आवाजों, प्राकृतिक ध्वनियों और इशारों से भाषा विकसित की, या भाषा का ज्ञान मनुष्य को सृष्टि के आरंभ से ही प्राप्त था?

स्वामी करपात्री जी महाराज ने अपने ग्रंथ 'मार्क्सवाद और रामराज्य' के 'विकासवाद' अध्याय में 'भाषा-विज्ञान' शीर्षक के अंतर्गत इस प्रश्न पर गहराई से विचार किया है। उन्होंने भारतीय दर्शन के मीमांसा और न्याय शास्त्र के आधार पर भाषा की उत्पत्ति से जुड़े प्रचलित सिद्धांतों पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।

उनके अनुसार भाषा कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसे कुछ मनुष्यों ने बैठकर आपसी सहमति से अचानक बना लिया हो। भाषा का संबंध मानव चेतना, ज्ञान और विचार से इतना गहरा है कि इन तीनों को एक-दूसरे से अलग करके समझना संभव नहीं है।

1. क्या भाषा के बिना विचार संभव है?

स्वामी करपात्री जी के विचारों का सबसे महत्वपूर्ण आधार यह है कि स्पष्ट विचार और भाषा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

हम सामान्यतः मानते हैं कि पहले मनुष्य के मन में कोई विचार आता है और फिर वह उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है। लेकिन करपात्री जी इस धारणा पर प्रश्न उठाते हैं। उनका कहना है कि जब हम किसी विषय पर स्पष्ट रूप से सोचते हैं, तब हमारे विचारों में किसी न किसी रूप में शब्द भी मौजूद होते हैं। इसे शास्त्रीय भाषा में 'शब्द-अनुविद्ध' कहा गया है।

उदाहरण के लिए, जब हम मन में किसी वस्तु के बारे में सोचते हैं, तो उस वस्तु का कोई नाम या उससे जुड़ा भाषाई बोध भी हमारे विचार के साथ रहता है।

इस दृष्टिकोण से प्रश्न उठता है कि यदि आदि मनुष्य के पास भाषा बिल्कुल नहीं थी, तो उसके मन में जटिल विचार कैसे उत्पन्न हुए? और यदि उसके पास जटिल विचार थे, तो उन विचारों को व्यक्त करने वाली भाषा का अभाव कैसे था?

करपात्री जी के अनुसार विचार और भाषा का संबंध इतना मूलभूत है कि भाषा से पूरी तरह रहित विचार की कल्पना करना कठिन है।

2. क्या पशुओं की आवाजों से भाषा विकसित हुई?

भाषा की उत्पत्ति के संबंध में एक लोकप्रिय सिद्धांत है, जिसे 'बो-वाउ सिद्धांत' (Bow-wow Theory) कहा जाता है। इसके अनुसार आदि मनुष्य ने पशु-पक्षियों और प्रकृति की आवाजों की नकल करके शब्द बनाना शुरू किया।

जैसे कोयल की आवाज से 'कुहू', कौए की आवाज से 'काँव-काँव' और मुर्गे की आवाज से 'कुकड़ू-कूँ' जैसे शब्द बने होंगे।

पहली नजर में यह विचार सरल और स्वाभाविक लगता है, लेकिन करपात्री जी इसके पीछे एक महत्वपूर्ण तार्किक समस्या बताते हैं।

प्राकृतिक ध्वनियाँ लगातार बहने वाली आवाजें होती हैं। उनमें मनुष्य की भाषा की तरह अलग-अलग अक्षर और व्यंजन पहले से मौजूद नहीं होते। इसके विपरीत, भाषा में 'क', 'ख', 'ग' जैसे स्पष्ट वर्ण होते हैं।

किसी प्राकृतिक आवाज को सुनकर उसे अलग-अलग वर्णों में बाँटने के लिए पहले से उन वर्णों का ज्ञान होना आवश्यक है।

इसका एक रोचक उदाहरण मुर्गे की आवाज है। हिंदी बोलने वाला व्यक्ति मुर्गे की आवाज को 'कुकड़ू-कूँ' के रूप में सुनता है, जबकि अंग्रेजी बोलने वाला उसे 'कॉक-अ-डूडल-डू' के रूप में व्यक्त करता है। गाय की आवाज को भारतीय भाषा में "भों. ..ओ ओ ओ" बोला जाता है, जबकि अंग्रेजीमें Moo Moo कहा जाता है. घोड़े की आवाज हिंदी में "ह्रीं.. ह्रीं... ह्रीं..." कही जाती है, जबकि अंग्रेजीमें Neigh... Neigh... कही जाती है. सुवर की आवाज को अंग्रेजीमें Oink Oink कहा जाता है, जबकि हिंदीभाषियोंके लिए ये सोचना भी कठिन है। 

आवाज एक ही है, लेकिन उसकी भाषाई अभिव्यक्ति अलग-अलग है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य प्राकृतिक ध्वनि को भी अपनी पहले से सीखी हुई भाषा के आधार पर समझता और व्यक्त करता है।

इसलिए करपात्री जी के अनुसार केवल नकल के आधार पर भाषा की उत्पत्ति को पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता।

3. इतिहास के प्रयोग क्या बताते हैं?

करपात्री जी अपने विचारों के समर्थन में इतिहास में किए गए कुछ प्रयोगों का भी उल्लेख करते हैं।

मिस्र के राजा सैमेटिकस, जर्मनी के सम्राट फ्रेडरिक द्वितीय, स्कॉटलैंड के राजा जेम्स चतुर्थ और मुगल सम्राट अकबर से जुड़े ऐसे प्रयोगों का उल्लेख मिलता है, जिनमें छोटे बच्चों को मानवीय भाषा सुनने से दूर रखकर बड़ा करने का प्रयास किया गया था।

इन प्रयोगों का उद्देश्य यह जानना था कि यदि किसी बच्चे को जन्म से कोई भाषा न सिखाई जाए, तो वह स्वयं कौन-सी भाषा बोलेगा।

करपात्री जी द्वारा प्रस्तुत विवरण के अनुसार, ऐसे बच्चे व्यवस्थित भाषा विकसित नहीं कर पाए। वे केवल सामान्य स्वर जैसी ध्वनियाँ निकाल सके, लेकिन 'क', 'ख', 'ग' जैसे स्पष्ट व्यंजन और व्यवस्थित वाक्य नहीं बना सके।

इसी प्रकार पशुओं के बीच पले बच्चों के उदाहरण भी दिए जाते हैं। वे मनुष्यों की तरह भाषा बोलने के बजाय पशुओं जैसी आवाजें निकालते थे।

बधिर (बहरे) व्यक्तियों के उदाहरण से भी वे यह समझाने का प्रयास करते हैं कि केवल जीभ, होंठ, दाँत और गले की शारीरिक क्षमता होना पर्याप्त नहीं है। स्पष्ट भाषा सीखने के लिए सुनना, अभ्यास करना और दूसरों से शिक्षा प्राप्त करना भी आवश्यक है।

इन उदाहरणों के माध्यम से उनका निष्कर्ष है कि भाषा केवल शारीरिक क्षमता से अपने आप विकसित नहीं होती, बल्कि उसके लिए शिक्षा और परंपरा की आवश्यकता होती है।

4. भाषा और ज्ञान का दिव्य संबंध

भारतीय वैदिक परंपरा में भाषा की उत्पत्ति को केवल जैविक या सामाजिक प्रक्रिया नहीं माना गया है। इसके पीछे एक आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण भी है।

स्वामी करपात्री जी श्वेताश्वतरोपनिषद के छठे अध्याय के अठारहवें मंत्र का उल्लेख करते हैं।

इस मंत्र में कहा गया है कि परमात्मा ने सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा को उत्पन्न किया और उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान किया।

इस दृष्टिकोण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में मनुष्य को ज्ञान और भाषा का बोध अलग-अलग समय पर प्राप्त नहीं हुआ, बल्कि दोनों का संबंध मूल रूप से एक साथ था।

करपात्री जी इसकी तुलना नींद से जागने की प्रक्रिया से करते हैं। जब कोई व्यक्ति सोकर जागता है, तो वह भाषा को दोबारा बनाना शुरू नहीं करता, बल्कि पहले से ज्ञात भाषा का प्रयोग करने लगता है।

इसी प्रकार वैदिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक नई सृष्टि के आरंभ में ऋषि पहले से विद्यमान ज्ञान और शब्दों का साक्षात्कार करते हैं। वे भाषा के आविष्कारक नहीं, बल्कि मंत्रों के दृष्टा अर्थात् 'मंत्रद्रष्टा' होते हैं। और वह दिव्य ज्ञान कोई और नहीं परन्तु स्वयं वेद हैं. 

५. संस्कृत भाषा और व्याकरण का महत्व

जो लोग संस्कृत भाषाकी महिमा जानते है वे समज़ते है की ऐसी उत्कृष्ट भाषा कोई मनुष्य निर्माण नहीं कर सकता, क्योंकि संस्कृत के अतिरिक्त जितनी भी भाषाएं है वे संस्कृत की तुलनामें अत्यंत निकृष्ट है. ऐसा तभी होता है जब क्रमशः संस्कृतका घिसाव होता चला गया हो. 

संस्कृत में धातु, प्रत्यय, संधि, तीन वचन, तीन लिंग और आठ विभक्तियों की व्यवस्थित व्यवस्था मिलती है।

यह व्यवस्था केवल शब्दों को बोलने का तरीका नहीं बताती, बल्कि उनके अर्थ और आपसी संबंधों को भी स्पष्ट करती है।

समय के साथ अनेक भाषाओं में यह व्याकरणिक समृद्धि कम होती गई है। उदाहरण के लिए, संस्कृत में एकवचन और बहुवचन के साथ द्विवचन भी है, जो दो व्यक्तियों या वस्तुओं के लिए अलग रूप प्रदान करता है। आधुनिक हिंदी और अंग्रेजी में द्विवचन की यह व्यवस्था नहीं मिलती।

इसी प्रकार संस्कृत में तीन लिंगों की व्यवस्था है, जबकि हिंदी में दो लिंग हैं और अंग्रेजी की सामान्य संज्ञाओं में व्याकरणिक लिंग की व्यवस्था बहुत सीमित है।

करपात्री जी इन परिवर्तनों को भाषा के विकास के बजाय उसके मूल स्वरूप में आई कमी अथवा 'अपभ्रंश' के रूप में देखते हैं।

६. क्या भाषाएँ समय के साथ विकसित होती हैं या उनका मूल स्वरूप घटता जाता है?

आधुनिक विकासवादी दृष्टिकोण सामान्यतः यह मानता है कि भाषा समय के साथ सरल ध्वनियों और संकेतों से विकसित होकर अधिक जटिल बनी। इसके विपरीत, करपात्री जी का मत है कि भाषा का मूल स्वरूप अधिक समृद्ध और व्यवस्थित था, जो समय के साथ उच्चारण, क्षेत्रीय प्रभाव और व्याकरणिक बदलावों के कारण सरल होता गया।

वे इस प्रक्रिया को 'अपभ्रंश' या 'ह्रास' कहते हैं।

व्यवहार जगतमें भी हम यह देखते है की प्रत्येक भाषाओँमें अशुद्धि हमारे देखते ही देखते आ जाती है। तो फिर ऐसा कैसे मान लिया जाए की भाषाओँका विकास क्रमशः और जटिल होता गया? यह तो उल्टी गंगा हो गई!

(विषयांतर: यही कारण है की मैं डार्विन के जैविक उत्क्रांतिवाद - theory of evolution - को नहीं मानता। क्योंकि हमारे शास्त्र कहते है की मनुष्यों की गुणवत्ता युगपरिवर्तन के साथ कम होती है जो की हम देख रहे है, जबकि डार्विन के अनुसार वर्तमान मनुष्य इतिहासका सबसे उत्कृष्ट मनुष्य है)

७. क्या संस्कृत ही सारि भाषाओँ की जननी है?

विश्वकी प्रत्येक भाषाओँमें आपको बहुत बड़ी मात्रामें ऐसे शब्द मिल जायेंगे जिनका मूल संस्कृत से है. ऐसे अनेको लेख लिखे गए है जिसमें विविध भाषाओँके शब्दों का मूल संस्कृत दिखाया गया हो, इसलिए इस लेखमें ऐसे उदहारण देना आवश्यक नहीं है. परन्तु जैसा की पहले प्रस्थापित किया गया, कुछ मनुष्य मिलकर बिलकुल शून्य से कोई भाषा बना ले यह असंभव है। अर्थात आजकी जो भी भाषाएं है, उनका कोई एक मूल तो है ही जो की मनुष्यनिर्मित नहीं है, और वह भाषा स्वाभाविक रूपसे संस्कृत ही है. 

निष्कर्ष : भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, ज्ञान की आधारशिला है

भाषा पशुओं की आवाजों, भावनात्मक चीत्कारों या आपसी समझौते से अपने आप उत्पन्न नहीं हो सकती। इसके लिए पहले से विद्यमान भाषाई ज्ञान, शिक्षा और परंपरा आवश्यक है। और वो भाषा देवताओं द्वारा, ऋषियों को माध्यम बनाते हुए, मनुष्यों को दी गई संस्कृत भाषा ही है। और संस्कृत भाषा से ही जगतकी सभी भाषा अपभ्रंशित होकर बनी है, और सभी भाषा संस्कृतका एक निकृष्ट संस्करण मात्र है। 

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