वेद मानवनिर्मित नहीं, अपौरुषेय और नित्य हैं: एक तार्किक विवेचन

ऐसे बहुतसे हिन्दू विचारक है जो की इस बातसे बहुत भ्रमित रहते है की वास्तवमें हिन्दू है कौन? और कौन हिन्दू नहीं है? ऐसे तथाकथित विचारकोंने कभी हिन्दू शास्त्रोंका गंभीरतासे अभ्यास नहीं किया है. यदि किया होता तो वे जानते की हिन्दू वही है जो वेदों को सर्वोच्च, सार्वभौम, दिव्य और अपौरुषेय मानते है। जो ऐसा नहीं मानते, वे हिन्दू हैं ही नहीं। 

पौरुषेय का अर्थ होता है जिसको किसी पुरुषने -अर्थात मनुष्यने - बनाया हो. वेद अपौरुषेय है. और वेदों के परिपेक्ष्यमें पुरुषका अर्थ केवल मनुष्य ही नहीं, कोई भी जीवात्मा, अर्थात देवता भी होता है. इसलिए अपौरुषेय का अर्थ है जिसे किसे देवताने भी नहीं बनाया, अर्थात वे स्वयंभू है। 

शास्त्रों के अनुसार सृष्टि के उदय के साथ ही, अर्थात भ्रह्मा के साथ ही, वेदों का उदय होता है, और लय के साथ उनका लय हो जाता है. इस बिच, सृष्टि के प्रारम्भमें ऋषिगण वेदों के मन्त्रों का दर्शन करते है और उनको संकलित करते है। इसलिए उन्हें मन्त्रद्रष्टा कहा जाता है। 

अब ये तो हो गई परंपरागत विचारों की बात. पर इस विचारको चुनौती देने वाले तथाकथित हिन्दू विचारक भी है। उनका कहना है की:

१ . वेदों की रचना किसी निश्चित काल में मनुष्योंने की 

२ . वेदों की रचना क्रमिक हुई, जिसमें सर्वप्रथम ऋग्वेद है

३ . मंत्रों को बोलनेकी भाषा शैली के कारण, कालान्तरमें समान मंत्रों से अलग अलग वेद बने

आइए एक एक करके प्रत्येक निराधार मान्यताओंका तर्कसंगत उत्तर ढूंढते है। 

वेद अपौरुषेय, नित्य और अलौकिक है

वेद पूर्णतः अलौकिक विषयों से सम्बन्धित हैं। वेद उन सभी बातों के प्रमाण है जिन्हें और किसी माध्यमसे जाना नहीं जा सकता। इन्हें एक व्यक्ति की रचना मानना असम्भव है, क्योंकि इतना विशाल और सुसंगत संग्रह एक व्यक्ति नहीं लिख सकता, जबकि ये विषय लौकिक है ही नहीं। अनेक व्यक्तियों की रचना मानने पर यह समझना कठिन है कि भिन्न-भिन्न मनों से रचित इतना बड़ा कोष शैलियों, प्रतिमानों में इतना सुसंगत कैसे है और कहीं कोई विरोध क्यों नहीं। 

यदि किसी बड़े समूह ने मिलकर रचा, तो ऐसे षड्यन्त्र का प्रमाण कहाँ है जिसने ऐसी कविताएँ रचीं जिनका लौकिक जीवन से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं? किसलिए और किसे धोखा देने के लिए? यज्ञों को स्वयं करने वाले दीक्षित अधिकतर वैश्य-वर्ण के लोग थे। क्या वे स्वयं को या अपनी सन्तान को धोखा देते? यज्ञ किसी सामान्य दृष्टि से देखें तो हास्यास्पद लगते हैं—लंबे उपवास, लकड़ी के विभिन्न चम्मच, अग्न्याधान से अग्नि की रक्षा, दूध-दही-घी की आहुति, घंटों तक विशिष्ट मन्त्रों का पाठ, कभी-कभी पशु-बलि। फिर भी समाज के विभिन्न वर्ग इसमें लगे रहे।

यह दो स्थितियों में सम्भव है

 १ . या तो उन्हें इन कर्मों के फलों का अलौकिक अनुभव था, 

 २ . या वे पूर्वजों से चली आ रही परम्परा का पालन कर रहे थे। 

दूसरी स्थिति में भी यज्ञ का कोई आदि-कर्ता नहीं मिलता। यही हमारा पक्ष है, कि वेद अनादि है। 

इस संक्षिप्त विश्लेषण से एकमात्र तार्किक निष्कर्ष निकलता है कि वेदों की कोई रचना या उत्पत्ति नहीं है। वे नित्य हैं (जैसे सभी शब्द नित्य हैं) और अपौरुषेय भी। अतः वे प्रमाण हैं। 

वेदों में जो कुछ लिखा है, उसका ज्ञान वेदों के अतिरिक्त किसी अन्य स्रोत से नहीं हो सकता। चाहे कोई वेद को प्रमाण माने या न माने, यह बात स्वीकार करनी पड़ती है।

वेदों की रचना किसी निश्चित कालमें हुई है और भाषांतर से नए वेद बने

जो लोग वेदों को किसी काल में रचा गया मानते हैं, वे अक्सर यह कल्पना करते हैं कि ऋग्वेद सबसे पहले बना, फिर यजुर्वेद और सामवेद। परन्तु ऋग्वेद में ही यज्ञों का स्पष्ट उल्लेख है। प्रश्न यह उठता है कि यजुर्वेद और सामवेद के बिना वे यज्ञ कैसे सम्पन्न हो रहे थे? विशेषकर अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञों की बात करें तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। ऐसे यज्ञों के लिए यजुर्वेद और सामवेद का ज्ञान अनिवार्य है। यदि ऋग्वेद अकेला पहले अस्तित्व में था, तो साम-यजु-रहित यज्ञ-विधि कहाँ से आई? कोई ऐसी प्राचीन विधि उपलब्ध नहीं है जो अन्य वेदों से पूर्व की हो।

ऋग्वेद के भीतर भी मण्डलों को अलग-अलग समय का माना जाता है। किन्तु उन तथाकथित प्राचीन मण्डलों में भी सोम यज्ञ का उल्लेख मिलता है। सोम का अभिषव आदि कार्य अध्वर्यु करते हैं, जो कर्मकाण्ड के विशेषज्ञ होते हैं। सोम यज्ञों में तो चारों वेदों के जानकार आवश्यक होते हैं—अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा सभी। होतृ की विधियाँ ऐतरेय ब्राह्मण में दी गई हैं, जहाँ अन्य वेदों की आवश्यकता स्पष्ट रूप से बताई गई है। 

ऐसी कोई यज्ञ-विधि उपलब्ध नहीं जो अन्य वेदों से पहले की हो। अतः वेदों की सापेक्ष काल-निर्धारण की सारी कल्पनाएँ निराधार सिद्ध होती हैं।

भाषाशास्त्र भी कोई ठोस प्रमाण नहीं देता। अलग-अलग स्थानों पर बोलने की शैलियाँ भिन्न होती हैं। ऋक्, यजुष् और साम की प्रकृति ही भिन्न है—वे अपने प्रयोग और स्वरूप के आधार पर विभाजित हैं। 

यदि यह माना जाए कि भाषा कालक्रम से ऋक् से यजुष् की ओर बदली, तो इन मन्त्रों की पूर्णतः भिन्न संरचना कैसे समझें? भाषा बदल सकती है, परन्तु सभी ऋचाएँ एक विशेष पद्य-प्रणाली में क्यों हैं और यजुष् पूर्णतः अलग क्यों है? क्या रचनाकारों ने अचानक उस पद्य-शैली को छोड़ दिया? ऋक् और यजुष् का अन्तर काल का नहीं, बल्कि शैली और प्रयोग का है।

मंत्र और ब्राह्मण ग्रंथों के बिचका सम्बन्ध

मंत्र और ब्राह्मण का भेद भी महत्वपूर्ण है। यह स्वीकार किया जाता है कि ब्राह्मण मन्त्रों से पहले नहीं हो सकते, क्योंकि वे मन्त्रों का उल्लेख करते हैं। परन्तु उलटा भी सत्य है। मन्त्र का उपयोग बिना दिशा-निर्देश के क्या अर्थ? क्या कोई हजारों वर्षों तक मन्त्र लिखकर रखेगा और फिर जब भाषा बदल चुकी हो, तब कोई ब्राह्मण लिखेगा कि इनका प्रयोग कैसे करें? 

मन्त्रों का प्रयोग पहले कैसे होता था? 

यदि पहले विविध विधियाँ थीं, तो उनका प्रमाण कहाँ है? 

ब्राह्मणों में विधियों का कोई विरोध नहीं मिलता। यदि ब्राह्मणों से पहले विविधता थी, तो वह कैसे समाप्त हो गई और अन्य परम्पराएँ कहाँ गईं? 

प्रमाण के अभाव में स्वीकार करना पड़ता है कि विधियों में कोई विविधता नहीं रही। यह तभी सम्भव है जब मन्त्रों के प्रयोग की विधि, अर्थात् ब्राह्मण, संहिताओं के साथ सह-अस्तित्व में रहे हों।

वेदोंमें उल्लेखित देवता, ऋषि, नदी और भूमि के नाम

वेदों में ऋषि, देवता, भूमि और नदियों के नाम आते हैं। पहले तो वेद में किसी व्यक्ति की ऐतिहासिकता मानने का कोई कारण नहीं। यदि माने भी, तो वैदिक सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न कल्पों में आवर्ती चरित्रों के रूप में। 

स्थानों और नदियों के नाम लोगों द्वारा पूर्व-ज्ञात वैदिक नामों के आधार पर रखे जा सकते हैं। जैसे रामपुर नाम उन लोगों ने रखा होगा जिनके बीच राम का नाम प्रचलित था। 

भूमि को निवासियों के लक्षणों के आधार पर भी नाम दिए जाते हैं—जैसे किकट को कृपण का पर्याय कहा गया। ये रूढ़ियाँ बाद में नाम बन जाती हैं।

वेदों के शब्दों के अर्थ समजनेकी सही पद्धति

वेदों के शब्द संस्कृत भाषा में और कई अन्य भाषाओं में प्रचलित हैं। उनका अर्थ उन भाषाओं में समझे गए अर्थ के अनुसार लेना चाहिए। जहाँ एक शब्द के भिन्न अर्थ हों, वहाँ आर्यों की वैदिक परम्परा में रूढ़ अर्थ को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि आर्यों में कोई रूढ़ अर्थ न हो, तो उन म्लेच्छ भाषाओं का सहारा लिया जा सकता है जो इतिहास में आर्यों के सम्पर्क में रही हों। 

भाषा मुख्यतः रूढ़ि से सीखी जाती है। व्याकरण के नियमों से योगार्थ भी निकाला जा सकता है, परन्तु उसकी प्रामाणिकता रूढ़ार्थ से कम होती है। वाक्यों के साथ भी यही लागू होता है। गूढ़ अर्थ अक्सर अध्येताओं की रूढ़ि में सुरक्षित रहते हैं। 

जो लोग इन सब बातों की अवहेलना कर अपनी कल्पनाओं और पूर्वाग्रहों से अर्थ गढ़ते हैं, उन्हें अनदेखा करना ही उचित है।

इस प्रकार वेदों की अपौरुषेयता और नित्यता का समर्थन न केवल श्रद्धा से, बल्कि तर्क और उपलब्ध प्रमाणों के अभाव से भी होता है।

X प्लेटफार्म से श्रीमान @Kul_Mimansaka से साभार

Link : https://x.com/Kul_Mimansaka/status/2114153867827134684 

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इसीके साथ यह भी प्रस्थापित होता है की यदि वेद अपौरुषेय है तो संस्कृत भाषा भी अपौरुषेय और प्रथम भाषा होनी चाहिए। परन्तु कुछ आधुनिक भाषाविद इससे सहमत नहीं है. मेरे अन्य लेखमें उनके तर्कों का भी खंडन किया गया है। पढ़िए भाषा की उत्पत्ति : क्या मनुष्य ने भाषा बनाई या भाषा मनुष्य को देवताओं से मिली?

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