भूत, प्रेत, पिशाच का रहस्य - भाग २ - क्या मृत व्यक्तियों (प्रेतों) की पूजा करनी चाहिए?

आज के समय में हिंदुओं में यदि सबसे अधिक ग्रसित करने वाला रोग

आज के समय में हिंदुओं में यदि सबसे बड़ा आध्यात्मिक रोग व्याप्त हो गया हो तो वह है प्रेत पूजा। वो चाहे आपके माता-पिता हों, चाहे गुरु हों, चाहे घरके कोई मृत सदस्य हों, या तो कोई बहुत बड़े संत हों। है तो सब प्रेत ही। 

जहां देखो किसी न किसी मृतक व्यक्ति का मंदिर है, मजार है। कुछ तो बहुत ही बड़े नाम है। "हारे के सहारे" इन प्रेतों के चक्कर में पड़कर हिंदू अपनी दुर्गति कर रहे है। यह सब प्रेत योनि में जाने के रस्ते है जिसपर हिन्दू चल रहे है। गीता में भगवान कहते है कि मनुष्य जिसको पूजता है, मरनेके बाद उसी योनि में जाता है। यदि ईश्वर को पूजता है तो वैकुंठ, कैलाश लोक, साकेत लोक, गो लोक इत्यादि में जाता है। और यदि प्रेतों को पूजेगा तो प्रेत ही बन जाएगा।

आजकल पितृदोष और प्रेतजनित पीडामें इतनी वृद्धि क्यों देखनेको मिल रही है?

और प्रेतों की संख्या भी बहुत बढ़ रही है। इसके साथ ही प्रेतों के द्वारा दी जा रही पीड़ा भी बढ़ रही है। और क्यों न बढ़े? जब आप अपने पितरों को श्रद्ध नहीं दोगे, उनको नियमित पानी भी नहीं दोगे तो वो बेचारे कहां जाएंगे अपनी तृष्णा को तृप्त करनेके लिए। फिर वो आपके शरीर में घुसेंगे और भोग प्राप्त करेंगे। और यदि आपके पूर्वज इतने पिशाची प्रवृत्ति के न हों, तो वे आपको पितृदोष देकर याद दिलाते रहेंगे कि आपके पितृ अतृप्त हैं, और उनके लिए कुछ करो। जब तीव्र पितृदोष होता है, तब पितृ किसी न किसी के माध्यम से आपको कहलवाते हैं कि आप पितृओं की शांति के लिए श्राद्ध-तर्पण करो। ऐसे सुझावों को कभी टालना नहीं चाहिए।

यहां एक बात स्पष्ट कर दूं कि हर मरने वाले को प्रेत योनि नहीं मिलती। पर आजकल देहात्मवाद के प्रभाव के कारण यह संख्या बढ़ रही है। और यदि आपके पितृ की अन्यत्र सदगति हो भी गई है तो भी आपका दिया हुआ श्राद्ध तर्पण उनको उनके स्थान पर पहुंच ही जाता है।

यहां मेरा इन बड़े मंदिरों वाले तथाकथित "भगवानों" (जो की पहले मनुष्य थे, और उनके मृत्युके बाद उनको मंदिरमें बिठाकर भगवान् बना दिया गया) का अपमान करनेका कोई आशय नहीं है। वे सब अपने मनुष्य जीवनकाल में एक विर और ज्ञानी व्यक्ति रहे होंगे। उनका पूरा पूरा सम्मान है। पर जब वे मर चुके तब उनको बांधकर रखना उचित नहीं है। उनको अपने कर्मों का भोग स्वर्ग में करने देना चाहिए। यहां उनके लिए स्वर्ग बनानेका प्रयत्न नहीं करना चाहिए।

मेरा कहना केवल इतना है की कृपया अपने और अपने बच्चों के ऊपर कृपा करके अपने पितरों को श्रद्ध अर्पण करें, और पूजा केवल और केवल शास्त्रीय भगवानों की ही करें।

बात का सार:

१. मरे हुए व्यक्तियों की पूजा न करें

2. पितरों को नियमित श्राद्ध तर्पण दें

3. केवल और केवल शास्त्रीय भगवानों और देवताओं की ही पूजा करें।

मनुष्य के मरनेके बाद प्रेत क्यों और कैसे बनते है?

देखिए ये विषय इतना गहन है कि यदि ठीक ठीक लिखने बैठा तो पूरी एक पुस्तक ही लिखी जाएगी। इसमें मृत्युभोज और अन्य विषय भी आ जाएंगे। इसलिए जितना हो सके संक्षेप में ही लिखूंगा।

मृत्यु के पश्चात लगभग सभी जीवात्मा 13 दिनों तक प्रेत योनि में ही रहती है। मृत्यु के पहले 3 दिनों में प्रेत केवल इस विमर्श में रहता है कि उसके साथ क्या हुआ। अगले 12 दिनों में मृतात्मा को पिंडदान देने से उसका सूक्ष्म शरीर विकसित होता है और वह यमदूतों के साथ अन्य लोक की यात्रा के लिए तैयार होता है। प्रेत योनि का एक दिन मनुष्यों का एक महीना होता है। और जीवात्मा की प्रेत योनि छोड़कर अन्य लोक या योनि में जानेका सफर 12 दिन का होता है। अर्थात हमारा एक वर्ष। इसीलिए मृतात्मा के लिए तेरहवीं और बरसी मनाई जाती है।

परन्तु कुछ दुर्भागी जीव होते है जो प्रेत योनि में ही रह जाते है। इसके विविध कारण है जिसमेंसे कुछ नीचे लिख रहा हूं। 👇

प्रेत बनने का कारण 1 - अकस्मात से मृत्यु

अधिकांश प्रेत इसी प्रकार बनते है।  जब अचानक युवावस्था में अकस्मात मृत्यु हो जाती है तब जीवात्मा को पता ही नहीं चलता कि वो मर चुका है। युवा जीव की इच्छाएं और वासनाएं भी अधिक होती है। अपने शरीर से मोह भी अधिक होता है। पर जब उनको पता ही नहीं रहता कि वे मर चुके है तो वो यह सब अहंकार छोड़ ही नहीं सकते।

जैसे हम स्वप्न में यही समझते है कि हम सशरीर सारे भोग भोग रहे है। हम जानते ही नहीं कि हमारा शरीर तो पलंग पर पड़ा हुआ है। जो विषयभोग कर रहा है वो तो सूक्ष्म शरीर है। इसी प्रकार प्रेत को अधिकतर पता ही नहीं होता कि वो मर चुका है।

एक बात ठीक ठीक समझ लीजिए की प्रत्येक प्रेत अपने अंतिम मनुष्य शरीर की पहचान लिए ही घूमता रहता है। वो उतना ही ज्ञानी व अज्ञानी, उतना ही बुरा व अच्छा होता है जितना वो मनुष्य शरीर में था। इसलिए वो प्रेत हो गया तो मनुष्य से अधिक ज्ञानी हो गया, ऐसा नहीं है। उदाहरणार्थ, यदि कोई मुस्लिम प्रेत है तो वो अपने प्रेत शरीरमें भी मुस्लिम भ्रांतियों को ही मान रहा होगा। यही कारण है की मुस्लिम प्रेत भगाने वाले लोग उसको मुसलमानों के बड़े बड़े प्रेत - जैसे की सुलेमान इत्यादि - की धमकी देकर डराकर भगाते है। 

प्रेत बननेका कारण 2 - अत्यधिक मोह

कुछ जीव ऐसे होते है जिनका अपने शरीर, अपनी संपत्ति, अपने परिवारजनों से इतना मोह होता है कि वे मृत्यु के बाद भी उनसे जुड़े रहना चाहते है। ऐसे प्रेत भी बड़ी संख्या में होते है। इसीलिए मृत्यु के बाद शरीर को जला दिया जाता है।

क्यों स्त्रियों को श्मशान नहीं जाने दिया जाता?

आजकल स्त्रियां श्मशान जाती है क्योंकि वे अपनी "विरता" और पौरुष दिखाना चाहती है।

स्त्रियां भावुक होती है। किसी मृतात्मा को जाने देने के लिए एक कठोर हृदय चाहिए। परन्तु मृतदेह के पास अत्यधिक विलाप करके स्त्रियां जीवात्मा की गति को बाधित करती है। पुत्री, पत्नी, बहन इत्यादि से पुरुष या स्त्री, किसीको भी अत्यधिक स्नेह होता है। वे प्रेत रूप में वही उपस्थित होते है। मृतात्मासे अपनी स्त्रियों का यह दुख देखा नहीं जाता।

जब पुत्र स्वयं पिता का अग्नि संस्कार करता है तब मृतात्मा का मोहभंग हो जाता है। शास्त्रों में तो यहांतक कहा गया है कि पुत्र द्वारा मृतात्मा की खोपड़ी हथौड़े से तोड़ी जाए। जब पुत्र इतनी क्रूरता दिखाता है, तो मृतात्मा के लिए गति करना सरल हो जाता है।

प्रेत बनने का तीसरा प्रकार - देव बना देना

व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनके परिजन उनकी फोटो घर के मंदिर में लगाकर देवता का स्थान दे देते हैं, उनको भोग आरती इत्यादि लगाते है। ऐसे में प्रेत का पोषण होता है और वो स्वयं को देव ही मानने लगता है। फिर उसको मुक्ति की कोई कामना भी नहीं रहती।

इस प्रकारके "भगवान्" राजस्थान में सबसे अधिक देखा गया है। वहां आप हर गली मोहल्ले में किसी "वीर" का मंदिर देखेंगे। ये ठीक नहीं। वीरों का पूरा सम्मान होना चाहिए, पर उनकी गति बाधित नहीं करनी चाहिए।

आप ही सोचिए, आपको कोई मरनेके बाद बांधकर रखेगा तो क्या आपको अच्छा लगेगा?

प्रेत बननेका प्रकार 4 - पिशाच से बाधित

कुछ व्यक्ति जीवित ही पिशाच के वश में आ जाते है। ऐसे पिशाच मरनेके बाद भी ऐसी जीवात्माओं को नहीं छोड़ते। उनको अपने "गिरोह" में बांधकर रखते है। इस प्रकार के प्रेतों की संख्या भी आजकल बहुत बढ़ रही है। पिशाच छोटे भी होते है, बड़े भी होते है और बहुत बड़े (लाखों प्रतिमाओं को वश में किए हुए) भी होते है।

पिशाचों के वश में आने वाले जीवित व्यक्ति अधिकतर पितरों के श्राप से ग्रसित होते है। जब पितृ क्रोधित होते है तो ऐसे ऐसे श्राप भी दे देते है।

इसलिए पितरों को सदैव तृप्त रखना चाहिए।

इसके अतिरिक्त भी कुछ कारण हो सकते है, पर यही मुख्य कारण है जितना मेरी जानकारी में है।

एक बात फिरभी समझनी आवश्यक है कि ये जो प्रेत गति होती है उसके पीछे भी कहीं न कहीं हमारे कर्मों का फल ही कारण होता है। इसलिए अपने कर्म अच्छे रखेंगे तो अपनी और अपने संतानों की दुर्गति नहीं होगी।

एक महत्वपूर्ण बात

हिंदू धर्म के अतिरिक्त जितने भी अधर्म है वे सब इन बड़े बड़े पिशाचों के ही पूजक है। इसलिए पिशाच पूजकों से दूरी बनाए रखें अन्यथा आप भी प्रेत योनि में ही जाओगे।

मृत्युभोज का भी बहुत विरोध हो रहा है आजकल। आर्यनमाज इसमें प्रमुख है। ये वही लोग है जो प्रेतों की संख्या अधिक से अधिक बढ़ाना चाहते है।

आपके पितृ गण तर्पण और श्राद्ध से सुखी होते है, और उनकी पूजा करने और भोग लगाने से दुखी होते है

यदि आज के बाद केवल इतना ही याद रखेंगे तो सबका कल्याण होगा। 

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अब इस श्रेणी के अगले भागमें हम देखेंगे की की क्या सिद्ध महात्माओं के मंदिर बनाकर पूजा करना सही है?

इस इस भाग में हम देखेंगे कि:

  • क्या सिद्ध संतों के मंदिर बनने चाहिए?
  • यदि इन प्रेतों के मंदिरों में भगवान नहीं हैं तो हमारी मान्यताएँ कैसे पूरी होती हैं?
  • क्या छोटी-मोटी मान्यताएँ पूरी होने के उद्देश्य से भी प्रेत पूजा करनी चाहिए?

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