ज्योतिष की दृष्टि से गर्भसंस्कार - करें इच्छित गुणों वाले संतान की प्राप्ति

सामान्यतः लोग यह मानते हैं कि बच्चे जब 8 से 10 वर्ष के हो जाते हैं, तभी संस्कारों का सिञ्चन शुरू हो सकता है, क्योंकि उससे पहले वे बहुत छोटे होते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि बच्चा जब जन्म लेता है, तभी उसका 80% तय हो जाता है कि वह कैसा जीवन जीएगा। केवल 6 वर्ष की आयु तक उसका 90% जीवन तय हो जाता है। बाकी जीवन में जो संस्कार वह प्राप्त करता है, वे केवल 10% ही प्रभाव डालते हैं। इसलिए गर्भसंस्कार व्यक्ति निर्माण के किसी भी अन्य आयाम से कई गुना अधिक महत्वपूर्ण हैं। बच्चा किस स्कूल में पढ़ेगा, किस समाज में रहेगा, ये सब तो बहुत ही तुच्छ बातें हैं।

सामान्यतः गर्भसंस्कार को केवल आयुर्वेद का विषय माना जाता है। गर्भसंस्कार वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक उत्तम कोटि का संतान प्राप्त किया जा सकता है। आयुर्वेद का यह विषय अत्यंत गहन है, और यदि इसे अच्छी तरह से अनुसरण किया जाए तो निश्चित रूप से इच्छित संतान की प्राप्ति हो सकती है।
आयुर्वेद की दृष्टि से गर्भसंस्कार कैसे करना है, इसके बारे में कई पुस्तकें लिखी गई हैं और प्रचुर मात्रा में शोध साहित्य उपलब्ध है। इसलिए यहाँ उस विषय की चर्चा नहीं करेंगे। इसके अलावा आध्यात्मिक शास्त्रों (वेदों और पुराणों) में भी इस विषय को विस्तार से लिया गया है। इस विषय में अभी और अनुसंधान के लिए अवकाश है। फिर भी, कई ज्ञानी पुरुष इस विषय को जानते हैं।
आज के इस लेख में हम गर्भसंस्कार से संबंधित एक पूर्णतः उपेक्षित विषय को देखेंगे, जो ज्योतिष शास्त्र से संबंधित है। इस विषय का सार समझने के लिए ज्योतिष के किसी भी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है, हालांकि इसकी तकनीकी बातें समझने के लिए ज्योतिष का थोड़ा-बहुत आधारभूत ज्ञान जरूरी है।
ज्योतिष की दृष्टि से गर्भस्थ शिशु को उसका "मन" उसकी माता से प्राप्त होता है और धर्म — अर्थात् अपने जीवन का कर्म या कर्तव्य — पिता से प्राप्त होता है। शास्त्र कहते हैं, आत्माः जायते इति पुत्रः—अर्थात् पुत्र (या पुत्री) पिता की आत्मा का ही प्रतिबिंब होता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि पिता की आत्मा के तो कई भाव होते हैं। उनमें से कौन सा भाव संतान पर प्रतिबिंबित होता है? कई बार तो हम देखते हैं कि पिता-पुत्र एक-दूसरे के शत्रु होते हैं, तो यह कैसे सिद्ध होता है कि पुत्र पिता की आत्मा का प्रतिबिंब है?
(यहाँ जहाँ-जहाँ 'आत्मा' शब्द का उपयोग हुआ है, वहाँ 'जीवात्मा' समझना चाहिए।)
यहाँ जो विषय मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, वह ज्योतिष सूत्रों से प्रमाणित है या नहीं, यह मैं नहीं जानता, लेकिन यह अनुभवसिद्ध अवश्य है। ज्योतिष के विद्वान इस तथ्य की पुष्टि करते हैं और यह इतनी सरल बात है कि आप स्वयं भी इस प्रयोग को परख सकते हैं।
अब आप अपनी और अपने पुत्र-पुत्री की कुंडली निकालें और निम्नलिखित बातों की जाँच करें। वैसे तो यह प्रक्रिया अत्यंत ही सरल है, लेकिन अगर ज्योतिष के बारे में कुछ भी ज्ञान न हो—और थोड़ा भी सीखने की इच्छा न हो—तो नीचे का पैराग्राफ छोड़कर आगे पढ़ सकते हैं।
अब देखें कि आपके संतान की लग्न राशि कौन सी है। इसके बाद देखें कि वह राशि पिता की कुंडली के किस स्थान में बैठी है। यहाँ पिता का जो स्थान देखा जाता है, उस स्थान से संबंधित पिता की आत्मा का भाव संतान लेकर जन्म लेता है। उदाहरण के लिए, यदि संतान मिथुन लग्न है और पिता के लाभ स्थान में मिथुन राशि है, तो वह संतान पिता के लिए लाभ लेकर आता है और उसमें निरंतर वृद्धि करता है। अपने जीवन में भी वह बहुत धन प्राप्त करता है। यदि पिता के सुख स्थान की राशि संतान की लग्न राशि बनती है, तो वह पिता को भी बहुत सुख-सुविधाएँ देता है और अपने जीवन में भी बहुत सुख-सुविधाएँ भोगता है। इसी तरह ज्ञान भाव से जन्म लेने वाला संतान पिता के ज्ञान में तो वृद्धि करता ही है, बल्कि वह स्वयं भी पिता से कहीं अधिक ज्ञानी बनता है। अगर शत्रु भाव से जन्म लेता है, तो पिता-पुत्र के बीच अनचाहे भी शत्रुता हो जाती है। संतान को पिता का अहित नहीं करना होता, फिर भी वह अहित कर बैठता है। यदि व्यय भाव से जन्म होता है, तो पिता की पूरी संपत्ति उड़ा देता है। यदि रोग भाव से जन्म होता है, तो पिता को भी रोगी बनाता है और स्वयं भी रोगी बनता है। इत्यादि। ज्योतिष को थोड़ा-बहुत समझने वाला व्यक्ति इस बात को बहुत आसानी से समझ सकता है।
यहाँ हमने देखा कि संतान जब जन्म लेता है, तभी यह तय हो जाता है कि वह पिता की आत्मा का कौन सा भाव लेकर जन्मा है। यह भी पता चल जाता है कि संतान पिता के लिए कैसा सिद्ध होगा और यह भी निश्चित हो जाता है कि संतान किस क्षेत्र में पिता से आगे बढ़ेगा। लेकिन यह तो जन्म के बाद की बात हुई, सवाल यह है कि यह कैसे निश्चित होता है कि संतान पिता का कौन सा भाव लेकर जन्म लेगा? इस बात का निर्णय तो जन्म से पहले ही हो जाना चाहिए! जी हाँ, इस बात का निर्णय जन्म से पहले ही नहीं, स्त्री के बीज में गर्भाधान होने से पहले ही हो जाता है! और यही है पुरुष के लिए गर्भसंस्कार की मुख्य विधि।
कुंडली में आए विभिन्न स्थानों को हमने अनुवाद करके "घर", "गृह", "स्थान" आदि नाम दे दिए। जबकि उनका शास्त्रीय नाम है "भाव"। कुंडली का प्रत्येक स्थान आत्मा के विभिन्न भावों का प्रतीक है। इसलिए जिस समय संतान का गर्भाधान होता है, उस समय पिता के मन, बुद्धि और आत्मा के भाव कैसे हैं, उस पर यह निर्भर करता है कि उनके आने वाले संतान पर पिता की आत्मा का कैसा प्रतिबिंब पड़ेगा। सरल भाषा में कहूँ, तो यदि गर्भाधान से पहले कुछ समय तक पिता को उच्च ज्ञान के प्रति बहुत जिज्ञासा हो, तो उसका संतान अति ज्ञानी होता है और पिता को भी बहुत ज्ञान देता है। यदि पिता का मन धन-लाभ के लिए निरंतर मथ रहा हो, तो संतान के आते ही पिता को धन-लाभ होता है और संतान भी अपने जीवन में बहुत धन कमाता है। यदि शत्रुता का प्रबल भाव हो, तो संतान अपने पिता का ही शत्रु बनकर आता है (इसके अलावा अनिष्ट कर्मों का फल देने के लिए भी संतान अपने माता-पिता का शत्रु बनकर आता है)। यदि बहुत मोज-शौक और पैसे उड़ाने का भाव हो, तो संतान पिता की सारी संपत्ति उड़ा देता है, इत्यादि।
यहाँ यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जीवन में कोई भी सिद्धि स्वतः अच्छी या बुरी नहीं होती। पैसे कमाना स्वतः अच्छी या बुरी बात नहीं है। पैसे कैसे कमाए जाते हैं, उस पर सब कुछ निर्भर करता है। केवल ज्ञान होना स्वतः अच्छा या बुरा नहीं है, कैसा ज्ञान होना महत्वपूर्ण है। यदि कोई आध्यात्मिक रूप से ज्ञानी हो, तो यह अच्छी बात है, लेकिन किसी को ठगकर पैसे कमाने का ज्ञान अच्छा ज्ञान नहीं है। इसलिए पिता के जीवन में गर्भाधान के समय केवल यह कि कौन सा भाव प्रभावी था, यह पर्याप्त नहीं है, यह सात्विक था या आसुरिक, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि सात्विक भाव के साथ गर्भाधान हुआ हो, तो निस्संदेह संतान भले ही किसी भी भाव को लेकर जन्म ले, वह पिता और समाज के लिए शुभ ही होगा।
उदाहरण के लिए, शत्रुता स्वतः अशुभ नहीं है। शत्रुता किसके साथ है, यह अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए यदि गर्भाधान से कुछ समय पहले पिता के मन-मस्तिष्क पर धर्म के शत्रुओं का संहार करने का भाव बहुत प्रबल हो, तो संतान पिता की कुंडली के पराक्रम भाव को लेकर जन्म लेगा और अधर्म के शत्रुओं का नाश करेगा। वह पिता के साथ शत्रुता नहीं करेगा। ऐसे तो सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन शायद ऊपर दिए गए उदाहरण पर्याप्त हैं।
अब एक महत्वपूर्ण बात, जिसके लिए मैंने यह लेख लिखा है। हम जानते हैं कि जब एक स्त्री गर्भवती होती है, तो इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि वह हमेशा प्रसन्न रहे और उसे जो कुछ भी पसंद हो, वह किया जाए। इसका कारण यह है कि संतान को मन उसकी माता से मिलता है। इसलिए माता का मन जितना प्रसन्न रहेगा, उतना ही बच्चा मानसिक रूप से स्वस्थ होगा। यह बात सत्य है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। यदि मनुष्य का मन प्रसन्न और संतुष्ट हो, तो दुनिया का कोई भी दुख उसे दुखी नहीं कर सकता, और यदि वह मन से ही दुखी हो, तो कोई सुख उसे सुखी नहीं कर सकता। इसलिए संतान का मन स्वस्थ हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। लेकिन संतान के कर्म का क्या? संतान का कर्म तो पिता द्वारा तय होता है। तो इसके लिए समाज क्या करता है? इसलिए इस विषय को गहराई से समझकर प्रत्येक संतान की इच्छा रखने वाले पिता को निम्नलिखित करना चाहिए।
उपरोक्त बातों को स्थापित करने के बाद यह सिद्ध होता है कि संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पिता का जीवन अत्यंत सात्विक और धर्ममय होना अत्यंत आवश्यक है। इसके बाद उसे जैसा संतान चाहिए, वैसा मन में विचार करना चाहिए और उसी के अनुसार उसकी निरंतर प्रवृत्ति होनी चाहिए। यदि धन-लाभ की इच्छा हो, तो दैनिक लक्ष्मी पूजन करना चाहिए और सही मार्ग से, नीतियुक्त तरीके से अधिक से अधिक धन कैसे कमाया जाए, उस दिशा में निरंतर कार्यरत रहना चाहिए। यदि ज्ञानी संतान चाहिए, तो दिव्य ज्ञान की साधना करनी चाहिए। यदि समाज के लिए कल्याणकारी संतान चाहिए, तो समाज के अनिष्टों का नाश करने की निरंतर प्रवृत्ति होनी चाहिए, इत्यादि। और ये सभी बातें गर्भाधान से कम से कम एक महीने पहले से करनी चाहिए। गर्भाधान होते ही संतान के अधिकांश कर्म तय हो जाते हैं। जन्म लेना तो अभी बहुत दूर की बात है।
यहाँ एक और बात है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। यह माना जाता है कि गर्भाधान के बाद केवल स्त्री का मन और प्रवृत्ति ही महत्वपूर्ण होती है, पिता जो कुछ भी करता है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा नहीं है। गर्भाधान के बाद भी गर्भसंस्कार की प्रक्रिया पति और पत्नी दोनों की होती है। इस समय के दौरान पिता द्वारा निरंतर धार्मिक और परोपकारी कार्य करने, पत्नी के साथ रोज मधुर संवाद करने, और दान-पुण्य करने से संतान को विशेष ईश्वरीय कृपा प्राप्त होती है, जिससे एक मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बच्चे का जन्म होता है।आशा है कि मैं उपरोक्त विषय को अच्छी तरह से समझा पाया हूँ। यदि किसी को और प्रश्न हों, तो वे मुझसे सीधे संपर्क कर सकते हैं।

कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए

अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, रविवार, मंगलवार, उपवास, किसी त्योहार और सूतक के दिनों में संभोग नहीं करना चाहिए। दिन के समय कभी भी, भूल से भी संभोग नहीं करना चाहिए। संध्या समय गर्भाधान करने से आसुरी बुद्धि वाली संतान उत्पन्न होती है। रात 9 बजे से 1 बजे तक का समय उत्तम है। वैसे तो ये नियम जीवनभर पालने चाहिए, लेकिन संतान प्राप्ति के लिए तो ये अनिवार्य हैं। संभोग के समय यथासंभव भगवान का स्मरण करना चाहिए। यह बात विचित्र लग सकती है, लेकिन यही उत्तम संतान प्राप्ति की विधि है।

भगवान् आपकी मनोकामना पूर्ण करे 🙏

शुभमस्तु।

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