कर्म सिद्धांत भाग - ३ - क्या कर्मोंकी गति समझ पाना किसीभी मनुष्य या बड़े से बड़े महात्मा के लिए संभव है?

इस लेखमें हम देखेंगे की:

  1. कर्मों की गति कितनी जटिल होती है
  2. कर्मोंका फल निश्चित करनेके लिए ईश्वरको क्या क्या ध्यान रखना पड़ता है 
  3. उदहारणसे समझेंगे की कर्णावतीमें हुई प्लेन दुर्घटनामें एकसाथ २५० लोग कैसे मरे होंगे
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कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः

अर्थ: कर्म की प्रकृति को समझना चाहिए, विकर्म (निषिद्ध कर्म) को भी समझना चाहिए, और अकर्म (निष्क्रियता) को भी समझना चाहिए। कर्मों की गति गहन (जटिल) है।

- भगवदगीता ४.१७ 

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भगवद्गीता के उपरोक्त श्लोकको आपने सुना ही होगा, और "गहना कर्मणो गति:" तो बहुत प्रचलित वाक्य है। आइये सबसे पहले इस श्लोकका सामान्य अर्थ समज़ते है। 

कर्म: जो कर्म करने योग्य है

विकर्म: जो कर्म त्याज्य है

अकर्म: ऐसे कर्म जो किए तो जाते है पर इनके साथ कर्तुत्व भाव नहीं जुड़ा होता

भगवान कहते है की मनुष्यको अपने कल्याण के लिए इन तीनों प्रकारके कर्मोंको समझके जो करने योग्य कर्म है उन्हें ही करना चाहिए, जो त्याज्य है उनको नहीं करना चाहिए, और प्रत्येक कर्मों को अकर्मण्य भाव से करना चाहिए। मनुष्य को यथाशक्ति इनको समज़ना चाहिए क्योंकि कर्मों की गति बहुत ही गहन है। 

अब इस श्लोक पर तो १००० पन्नों की पुस्तक लिखी जा सकती है और फिरभी इसका महात्म्य पूरा पूरा नहीं लिखा जा सकता, इसलिए पुरे श्लोकका तो विवेचन मैं यहाँ नहीं करूँगा, परन्तु कर्म सिध्दांतको समज़ने के लिए "गहना कर्मणो गति:" वाक्यको समज़ना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए मैं इसी विषय पर चर्चा करूँगा। 

गहना कर्मणो गति: - कर्म की गति गहन होती है

गति गहन तो होती है, पर कितनी गहन होती है?

इस विषयको समज़नेके लिए इस श्रेणी का पहला भाग पढ़ना अनिवार्य है। 

मनुष्य अपने जीवनकालमें छोटे-बड़े करोडो कर्म करता है, और करोडो कर्म भोगता भी है। एक एक स्वास पर कर्म होता है, और एक एक स्वास पर कर्मों का भोग भी होता रहता है। किस क्षण हम किस जन्मके कर्म का भोग भोग रहे है ये कोई नहीं कह सकता। हमारे मनुष्य जीवनके अंतर्गत हम बड़े बड़े और छोटे छोटे कर्म करते रहते है जिसका हमें फल भी मिलता रहता है।

  • हमारे माता-पिता, भाई-बहन और वो सब लोग जो हमारे जीवनकी हर छोटी बड़ी घटनाओं से जुड़े होते है वे सब अपना अपना कर्म भोगनेके लिए ही हमारे साथ जुड़े होते है। 
  • जो भी जिव हमारे आसपास होते है - जैसे की कोई पालतू प्राणी, पेड़-पौधे इत्यादि - यहांतक की कईबार तो निर्जीव वस्तुएं भी अपना भोग भोगनेके लिए ही हमारे साथ जुड़े होते है। 
  • जीवनमें घटनेवाली विविध घटनाएं जिसमें प्रत्यक्ष रूपसे व्यक्तिसमूहमें कोई जुड़ाव नहीं है, फिरभी उसकी असर पड़ती है। उदहारणके लिए कोरोनाके समय अनेक लोग ऐसे थे जिन्होंने बहुत पैसे गवाएं, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने बहुत पैसे कमाएं। गवाने वालों के पैसे कमानेवालोंको मिल गए। जबकि उन दोनों व्यक्तिसमहूके बिच कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं था।  यह भी भाग्यका ही खेल है। 
  • कुछ लोगोंके साथ पूर्वजन्म के ऋणानुबंध होते है जो हमें इस जन्ममें चुकाने होते है। पर दोनों व्यक्तिके पूर्वजन्म के मृत्युके बाद अपनी अपनी गति हुई होगी। उदहारणके लिए, पिछले जन्ममें पतिपत्नीके कुछ ऋणानुबंध रह गए थे जो इस जन्ममें पुरे करने है। परन्तु हो सकता है की पत्नीकी मृत्युके बाद उसका तुरंत मनुष्य योनिमें ही जन्म हो गया, और पति हजारो लाखो वर्षो तक विविध योनिओमें घूमता रहा। तो पत्नीके भाग्यका फिर क्या होगा? अब ये तो  ठीक ठीकसे भगवान् ही बता सकते है पर शास्त्रोंकी दृष्टिसे हजारो, लाखों या करोड़ों वर्षोके बाद भी ये दोनों एकदूसरे के ऋण चुकाए बिना मुक्त नहीं हो सकते। जबतक वे दोनों फिरसे नहीं मिलते, तबतक वे अपने दूसरे संचित कर्म भुगतते रहेंगे। 

उदहारण:

अभी कुछ ही समय पूर्व (कर्णावती) अहमदाबादमें हुए विमानी अकस्मात्में 250 से अधिक लोग एकसाथ मर गए। इसके साथ ही वहां कुछ और छोटे बड़े जिव रहे होंगे - जैसे की पेड़ पौधे, कुत्ते और सूक्ष्म जिव -  इन सबकी मृत्यु एक ही समय, एक जैसी ही क्यों आई? वो भी इतनी भयानक! कर्मसिद्धांत के अनुसार  हम कह सकते है की इन सब लोगों के भाग्य अपने अलग अलग जन्मों के इकठ्ठे हुए और यहाँपर उसका भोग हुआ। हो सकता है किसीने ५ करोड़ वर्ष पूर्व किसी जिवको जलाकर मार दिया हो, किसीने पिछले कल्पमें (अरबो अरबो वर्ष पुर) कोई जंगलमें आग लगाईं हो,  या किसीने इसी जन्ममें ही किसी जिवको उपरसे निचे गिराकर मार दिया हो! मूल बात यह है की ईश्वरने कुछ ऐसी रचना की, की सबलोग अपने अपने कर्म भुगतनेके लिए एकसाथ इकठ्ठे हो गए। याद रहे, इन सब लोगोंका जब जन्म हुआ था तभी यह निश्चित था की सब लोग ऐसे ही इकठ्ठे मरेंगे। उन्होंने एकसाथ मरनेके लिए ही जन्म लिया था, परन्तु अपने इस जीवनकालमें उन्होंने अन्य कर्मों के फल भी भुगते, और कुछ नए कर्म भी संचित किये। सोचिए कितनी गूढ़ भग्य रचना की गई होगी!

सोचिए, जिस ईश्वरको सभी कर्मों की गति निश्चित करनी है उसको क्या क्या करना होगा:

  1. कौनसे कर्मों के फल वो किस किस लोकमें कैसे कैसे भुगतेगा
  2. कौनसा कर्म किस जन्ममें भुगतेगा
  3. उसके साथ ऐसे लोगों को जोड़ा जाए जिनके अपने भी कर्म भुगते जाएं और इस व्यक्ति के साथ भी जुड़े कर्म भुगते जाएं। सबका इस योग्य समय पर जन्म होना, और एकसाथ एकदूसरे के संपर्कमें कब और कैसे आना है, ये भी निश्चित करना होगा। यहांतक की एक छोटीसी घांस की पट्टी भी घरके आँगनमें उगाने के लिए उस पत्ती के जीवका और उस घर के स्वामी के भाग्य का भोग एकदूसरे के साथ जुड़ना चाहिए। 
  4. और यह सब काम अनेक लोकों के अनेक जीवों के खतों को याद रखते हुए, देश काल परिस्थिति के अनुसार करना। उदहारण के लिए इस पृथ्वी पर वायरस लेकर ब्लू व्हेल तक अनगिनत जिव रहते है। उनके जीवनके सुख-दुःखके अपने नियम होते है। फिर प्रत्येक देश की संस्कृतिके अनुसार दुःख-सुख होते है (जैसे की भारतमें छोटी आयुमें मातापिता से वियोग दुखदाई है, पर अमरीकामें यह सामान्य बात है) उसका ध्यान रखना, फिर केवल पृथ्वी लोक ही नहीं है, ऐसे और अनेक लोक है, उस सबके अपने नियम भी है, इनके अनुसार कर्मफल निश्चित करना, फिर ऐसे अनेकों ब्रह्माण्ड भी है जहाँ बिलकुल ही अलग नियम लगते है, उन सबका समन्वय करना।
जो ऊपर विवरण दिया गया है वो भी केवल मेरी पामर बुद्धि से दिया गया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर तो इससे बहुत अधिक जटिल काम करते है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। 

यही कारण है की शास्त्र कर्मों की गति को लेकर केवल इतना ही कहते है की "गहना कर्मणो गतिः" और साथमें यह भी कहते है की कर्मों की गति को समझना केवल "सर्वज्ञ" के ही बस का काम है। और सर्वज्ञ केवल ईश्वर ही होते है, और कोई नहीं हो सकता। शास्त्र इससे अधिक कुछ कह भी नहीं सकते। यदि आप ईश्वरको जान भी लो, मोक्ष के अधिकारी भी बन जाओ, फिरभी आप सर्वज्ञ तो नहीं हो सकते। क्योंकि मोक्ष तब मिलता है जब आप ईश्वरमें अपनेआप को विलीन कर दो। परन्तु इस अवस्थामें भी आप स्वयं ईश्वर नहीं बन जाते। जैसे पानी की एक बून्द सागरमें मिलकर स्वयं सागर ही होनेका अनुभव करती है, पर वास्तवमें वह पूरा सागर नहीं होती। 

इससे एक आश्चर्यचकित कर देने वाली बात यह भी है की, ऐसे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ ईश्वर कृष्ण लल्ला बनकर आपकी छोटीसी मूर्तिमें कैसे बस जाते है! सच ही कहा गया है, की ईश्वर बहुत कृपालु और सरल है!
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अब यह प्रश्न उठता है की क्या सचमें इस जन्ममें मिले हुए लोग अपने अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब लेने के लिए फिरसे अगले जन्ममें मिलते है? यह प्रश्न का उत्तर हम अगले अनुभागमें देखेंगे। 

कर्म सिद्धांत - भाग ४ में हम देखेंगे कि:

  1. क्या वास्तव में पूर्व जन्म के लोग इस जन्म में मिलते हैं?
  2. क्या किसी को अपना अगला जन्म चुनने का विकल्प मिलता है?
  3. क्या पति-पत्नी का संबंध सात जन्मों का होता है?
  4. अगला जन्म मिलने का क्या आधार होता है?
  5. यदि मृत्यु के समय फिर जन्म लेने की इच्छा ही न हो तो क्या फिर जन्म मिलेगा?
  6. श्राद्ध-तर्पण क्यों आवश्यक है?

पढ़ें: कर्म सिद्धांत - भाग ४ - क्या पिछले जन्म के लोग वास्तव में इस जन्म में फिर से मिलते हैं?


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