कर्म सिद्धांत - भाग ४ - क्या पिछले जन्म के लोग सचमें इस जन्ममें फिरसे मिलते है?

हमने पिछले अनुभाग में देखा की कर्मों की गति कितनी गहन होती है। उसमें "ऋणानुबंध" का भी उल्लेख आया। ऋणानुबंध का अर्थ है की किसीके साथ व्यक्तिके ऋण से बना हुआ अनुबंध या कॉन्ट्रैक्ट। आज हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे। 

इस लेखमें हम देखेंगे की:

  1. क्या सचमें पूर्व जन्मके लोग इस जन्ममें मिलते है?
  2. क्या किसीको अपना अगला जन्म चुननेका विकल्प मिलता है?
  3. क्या पति पत्नीका सम्बन्ध सात जन्मों का है?
  4. अगला जन्म मिलनेके क्या आधार होते है?
  5. यदि मृत्युके समय फिरसे जन्म लेनेकी इच्छा ही ना हो तो क्या फिरसे जन्म मिलेगा?
  6. श्राद्ध तर्पण क्यों अनिवार्य है?
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क्या सचमें पूर्व जन्मके लोग इस जन्ममें मिलते है?

प्रायः लोग कहा करते है की अमुक अमुक व्यक्तिके साथ उसका पिछले जन्मका ऋण है, इसलिए इस जन्ममें वो इतना दुःख या सुख दे रहा है। क्या सचमें ऐसा होता है? इस विचार के दो पक्ष है। 
  1. आदि शंकराचार्यजी अपने भाष्यमें कहते है की दो व्यक्ति एकदूसरेसे एक जन्ममें ऐसे ही मिलते है जैसे की समुद्रमें दो लकडीके टुकड़े एकदूसरेके साथ टकराते है। इसका अर्थ ये होता है की एकबार टकरानेके बाद दोनों अथाह समुद्रमें कहीं खो जाते है और उनका फिरसे टकरानेकी सम्भावना लगभग शुन्य ही है। अर्थात, कोई किसीसे फिरसे नहीं मिलता। 
  2. शास्त्रोंमें - और विशेषतः ज्योतिषमें - "ऋणानुबंध" शब्दका उल्लेख बार बार आता है। ज्योतिषमें तो ग्रहों के कुछ संयोग  ऐसे बताए गए है की आप स्पष्ट रूपसे बता सको की व्यक्ति उसके सगे सम्बन्धीके साथ कुछ पूर्वजन्म के ऋण लेकर आया हो। जैसे की चतुर्थ के गुरु के कुछ संयोग संकेत देते है की जातक पिछले जन्ममें भी उसी कुलमें जन्मा था। सप्तम भाव और शुक्र के कुछ संयोग यह संकेत करते है की इस पति-पत्नी के युगलने पिछले जन्ममें एकदूसरेको कुछ वचन दिए थे, जो वे इस जन्ममें पूरा करने आए है। 
तो ये दोनों बातें कैसे सम्भव है? शास्त्र तो कभी जूठे हो ही नहीं सकते। तो फिर क्या आदि शंकराचार्य जुठ बोले? ये भी नहीं हो सकता, क्योंकि वे भी ईश्वर के ही अंशाअवतार थे। तो फिर सच क्या है?

शंकराचार्यजी के कथन का सच

सच समज़ने के लिए यदि आपने इस श्रेणीका पिछले लेख - कर्म सिद्धांत - भाग ३ - नहीं पढ़ा है तो सर्वप्रथम वही पढ़िए। इस लेखमें मैंने स्पष्ट किया है की कर्मोंकी गति कितनी गहन होती है। किसी एक कर्मके लिए, व किसी एक व्यक्तिका ऋण चुकाने के लिए जन्म लेना असंभव जैसा ही है क्योंकि दोनों व्यक्तियोंके अपने दूसरे कर्म भी होते है, अपने कर्मों के अनुसार उन दोनोंके मनुष्य जन्म एकसाथ हो ऐसा भी संभव होना अत्यंत कठिन है, और फिर सारे कर्म मनुष्य देहमें इसी पृथ्वी पर ही भोगे जाएं ऐसा भी आवश्यक नहीं है। सबकी अपनी अपनी कर्म गति होती है, और अपने कर्मोंके अनुसार भाग्य प्राप्त करते है। इसलिए यह कथन सर्वथा सत्य है की समुद्रमें टकराई हुई दो लकड़ियां फिरसे कभी नहीं मिलती। 

तो फिर शास्त्रों के ऋणानुबंध का क्या?

शास्त्रोंमें जो ऋणानुबंध बताए गए है वे भी सब बहुत कम संभावनाओं वाले है। पर ये संभावनाएं तब बनती है जब कुछ इस प्रकारकी परिस्थिति उतपन्न हो:
  1. जब कोई मनुष्य किसी तीव्र भावनासे किसी और मनुष्यसे जुड़ा हुआ हो - चाहे वो प्रेम हो, घृणा हो या प्रतिशोध हो - और अपने मृत्युके समय भी उसी भावनाको लेकर मरा हो। 
    • याद रहे, मृत्युके समय मनमें आने वाली भावना अतिप्रबल होती है। इसका परिणाम अगले ही जन्ममें मिल जाता है। जैसे की यदि मरते समय किसी प्राणी का ध्यान आ जाए तो अगला जन्म उसी प्राणी का मिलता है (महात्मा जड़भरत की कथा) . इस प्रकार यदि मरने वाला व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ तीव्र भावना से जुड़ा हुआ हो, तो यह संभावना घटित हो सकती है। यदि सामने वाली व्यक्तिका जन्म होनेमें समय लगता है तो उसकी आत्मा उतने समय तक प्रेत बनकर भटकती है। 
  2. जब कोई अतिपुण्यशाली व्यक्ति अपने पुण्य और तपोबलसे अपना अगला जन्म निश्चित करे। 
    • जी हाँ, ऐसा भी संभव है। जो बहुत तपस्वी लोग होते है उनको अपना अगला जन्म चुननेका विकल्प दिया जाता है। ऐसेमें ऐसी बहुतसी आत्माएं होती है जो अपने उसी कुलमें फिरसे जन्म लेना चाहती है। ऐसी जीवात्माएं स्वर्गमें रहकर किसी योग्य योनि की प्रतीक्षा करते है, और जबतक उन्हें अपनी पसंदके माता-पिता नहीं मिल जाते, या जिनके साथ उन्हें जीवन काटना है वही जीवात्माएं नहीं मिल जाती, तबतक वे प्रतीक्षा करते है। 
तो इस प्रकार ये दोनों ही घटनाएं बहुत कम घटित होनेकी सम्भावना रखती है। वैसे ही जैसे की समुद्रमें दो लकड़ियोंका आपसमें फिरसे टकराना!

तो क्या पति-पत्नी के सात जन्मों के बंधन वाली बात असत्य है?

पहली बात तो ये की ये सात जन्मों वाली बात किसी शास्त्रों से प्रमाणित नहीं है, लोकोक्ति है। पर जैसा मैंने ऊपर कहा, यदि पति-पत्नी का ये एक कठोर और घोर संकल्प है, तो उनके पुण्यों के अनुसार यह सम्भावना घटित हो सकती है। जिस जन्ममें ये कठोर संकल्प किया गया हो, वहीँसे पहला जन्म गिनना चाहिए। फिर चाहे कुत्ते-कुत्ती का, या पपीते (का पेड़) और पपीति का ही जन्म क्यों न मिले 😂😂. वास्तवमें यह लोक अवधारणा पति-पत्नी के एक दूसरेके प्रति संकल्पबद्ध रखनेके लिए प्रचलित है। 

तो क्या मृत्यु के समय अपना अगला जन्म चुना जा सकता है?

इसका सीधा सीधा उत्तर तो है, की हाँ, चुना जा सकता है। पर ये इतना सरल नहीं है। वैसे तो मृत्युके समय भगवान् का नाम लेकर भी मुक्त हुआ जा सकता है, पर क्या ये सब कर पाते हैं? मनुष्यको मृत्यु भी अपने कर्मों के अनुसार ही मिलती है। यदि जीवनभर प्रभुका नाम नहीं लिया तो मृत्युके समय भी स्मरण नहीं रहेगा। मृत्युके समय मनुष्यका जो भाव होता है, उसका बहुत बड़ा प्रभाव उसके अगले जन्म पर पड़ता है। यदि वह अपने घर और वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मोहग्रस्त है तो फिर वो प्रेत ही बन जाएगा। मनुष्य प्रेत कैसे बनता है यह पढ़ने के लिए मेरे इस विषय पर अन्य लेख आएँगे, उन्हें पढ़े। इसलिए यह अतिआवश्यक है की मृत्युके समय मनुष्य शांत रहकर केवल भगवानका चिंतन करे। परन्तु ये तभी संभव होगा जब उसने जीवनभर भक्ति की होगी। 

सामान्यतः ऐसा ही होता है की मनुष्य विविध लोकोंमें अपने कर्मों को भोगकर उन्हीं कर्मों के आधार पर अगला जन्म लेता है। अर्थात किए हुए कर्मों का दो बार भोग करेगा, एक तो स्वर्ग-नर्क इत्यादिमें, और दूसरा उसके अगले जन्मके प्रारब्ध निर्माणके द्वारा। 

यदि मृत्युके समय फिरसे जन्म लेनेकी इच्छा ही ना हो तो क्या फिरसे जन्म मिलेगा?

ऐसा आप बहुत बार होता हुआ देखेंगे। कोई बूढ़ा व्यक्ति अपने अंतिम दिनोंमें ऐसा कहता हुआ मिल जाएगा की अब उसको कोई इच्छा नहीं है, अब उसको फिरसे इस दुनियामें नहीं आना है। परंतु मुक्ति ऐसे नहीं मिलती। ये ठीक है की जाते जाते भी, उस मनुष्यको वैराग्य तो आ ही गया, ये अच्छी बात तो है, पर उसके संचित कर्मों का क्या? ऐसा तो नहीं हो सकता की जीवनभर आप पाप करते रहो, और मृत्युके समय कह दो की अब मुझे कुछ नहीं भुगतना है। उन कर्मों को भुगतने के लिए तो फिरसे आना ही पड़ेगा, और जैसे ही आप फिरसे आओगे, नए कर्म करना आरम्भ कर दोगे, और फिरसे चक्र शुरू हो जायेगा! हाँ, यदि पुण्य किए है, भगवान् का नाम लिया है, तो मृत्युके समय भगवान् या आएंगे, और फिर भगवान् ही आपके कर्मों का भुगतान कुछ ऐसे करवाएंगे की आपके कर्म भी छूट जाएं, और भक्ति भी बानी रहे। 

तो फिर ऐसे भटकते प्रेतों और पित्रुओं के लिए क्या किया जाए?

मनुष्य जो कोई भी सुकर्म  या कुकर्म करता है, अपने देह से ही करता है। जब प्रेतों के पास देह ही नहीं रहेगा तो वे अपना कल्याण कैसे करेंगे? वे भोग भी कैसे भुगतेंगे? इसलिए वे अन्यों के शरीरमें घुसकर भोग प्राप्त करते है। अतृप्त पितृ मनुष्यों को बहुत कष्ट देते है। ऐसे प्रेतों के लिए श्राद्ध व् तर्पण किया जाता है, क्योंकि एक जीवित व्यक्ति ही उनके लिए यह कर्म कर सकता है। यदि आपके पितृ प्रेत नहीं भी हुए है, तो भी, पितृलोकमें उनकी तृप्ति के लिए श्राद्ध तर्पण इत्यादि करते रहना चाहिए, इसके प्रतिभावमें पितृ हमें संसार के सारे भौतिक सुख प्रदान करते है। श्राध्द करते समय आपके पितृ प्रत्यक्ष उपस्थित रहकर अपने भोग ग्रहण करते है। रामायण की कथा अनुसार जब सीताजी श्राद्ध के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन परोस रही थी तो उन्होंने ब्राह्मणोमें अपने स्वसुर श्री दशरथजी को देखा। इस विषय पर मेरा एक विशेष लेख आएगा। 
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अब हम इस श्रृंखलामें आगे देखेंगे की मनुष्य का भाग्य अधिक बलवान होता है या उसका कर्म।

हम भाग ५ में देखेंगे की:
  1. मनुष्यका भाग्य अधिक बलवान होता है या कर्म? जब सबकुछ भाग्यमें लिखा होता है तो कर्म करनेसे क्या लाभ?
  2. क्या कर्म करनेसे भाग्य बदला जा सकता है?
  3. अच्छे कर्म तो नास्तिक लोग भी करते है, तो उन्हें कैसा फल मिलता है? "मैं तो भाई कर्म में विश्वास रखता हूँ, भगवान जैसा कुछ नहीं है" ऐसा कहने वालों का क्या होता है?
  4. तो फिर इस कर्मफल के चक्रसे छुटकारा कैसे मिलेगा?
  5. क्यों भक्तों को अन्य पापियों की तुलनामें अधिक दुःख मिलता है?

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