भूत, प्रेत, पिशाच का रहस्य - भाग - ३ - क्या दिवंगत हो चुके सिद्ध संतों की पूजा, अर्चना करनी चाहिए?
इस लेखमाला के पिछले लेखमें हमने देखा की किसीभी मृत व्यक्तिको देवता बनाकर, मूर्ति बनाकर, मंदिरमें बिठाकर पूजा अर्चना नहीं करनी चाहिए। इसके ऊपर एक प्रश्न आया था जिसके उत्तरमें यह लेख लिखा जा रहा है।
प्रश्न है: क्या नगर देवता, ग्राम देवता और भी सिद्ध पुरुष उदाहरण के रूप में नीम करौली बाबा (कैंची धाम), गुरु गोरख नाथ। क्या इनको भी देव बनाया गया है। इनकी पूजा करना या मंदिर में स्थान देना सही है?
उत्तर: ग्राम देवता, स्थान देवता, क्षेत्रपाल इत्यादि सदैव शास्त्रीय ही होते है। अधिकतर ये सब पंचदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणपति और शक्ति देवी) के उग्र स्वरूप होते है। जैसे कि भैरव, रुद्र, काली, नरसिम्हा इत्यादि। जो लोग मनुष्यों को यह उपाधि दे देते है बहुत बड़ा अनर्थ करते है। वे इन क्षेत्रों की रक्षा तो नहीं कर पाते है, पर इन क्षेत्रों में उपद्रव बढ़ा देते है।
निम करौली बाबा इत्यादि सिद्ध पुरुषों को देव नहीं बनाना चाहिए। गुरु के रूप में उनकी प्रसंगोपात पूजा हो सकती है। जैसे की गुरु पूर्णिमा इत्यादि। जैसे हम अपने पूर्वजों को याद करते है वैसें। परन्तु उनका मंदिर ही बना देना, भोग आरती दैनिक रूप से करना, रोज का सैकड़ों लोगों का माथा टेकना, ये सब बिल्कुल अनुचित है।
श्राद्ध तर्पण के समय गुरु का भी तर्पण होता है। आप वो कर सकते है। आपको जबरदस्ती देव ही क्यों बनाना है?
गोरखनाथ इत्यादि मान्य संप्रदायों के अवतार माने जाते है। नाथ संप्रदाय में 9 नाथों को अवतार माना जाता है। तो उनकी पूजा हो सकती है, फिरभी उनके भी परम आराध्य दत्तात्रेय भगवान ही है। हरएक संत को अवतार ही बता देना, बड़े बड़े मंदिर बना देना, ये सब अनर्थ के कारण है।
सिद्धों के लिए समाधि बना सकते है। वो इसलिए क्योंकि उनका एक स्मारक रहनेसे लोग प्रेरणा लेते रहे। संतों का जीवन लोगों को प्रेरणा देनेके लिए ही होता हैं। इसलिए समाधि स्थल ठीक है। लोग वहां जाएं, नमन करे, उनके बारेमें बातें करें, और उस सिद्ध महात्मा के जो आराध्य देव रहे, उनकी पूजा करें। परन्तु स्वर्गीय सिद्ध आत्मा को ही भगवान बनाकर बांध देना ठीक नहीं।
हास्यास्पद बात यही है कि ये सब संत हमको मान्य भगवानों के नाम जप करने को ही कहते रहे। पर उनके मरनेके बाद हमने उनका ही नामजप शुरू कर दिया 🙄
याद रहे: ये सिद्ध संत तो अपनी गति कर ही लेते है। पर आप जो मूर्ति बनाकर रोज पूजते है उसमें प्रेत बैठ जाते है जो रोज मजे से आपके दिए गए भोगों का आनंद लेते है।
यदि असली भगवानों के अतिरिक्त सारे मंदिरों की मूर्तियों में प्रेत बसते है तो फिर उनके यहां मनोकामनाएं कैसे पूर्ण होती है?
सर्वप्रथम तो ये समझना होगा कि मूर्ति में बसता कौन है? ईश्वर तो सर्वशक्तिमान है, सर्वत्र है, वे एक से अनेक रूप कर सकते है। और प्रत्येक रूप में वो अपनी अमुक अमुक लक्षित शक्ति संचारित कर सकते है। जब असली ईश्वर की मूर्ति स्थापित की जाती है तब वह विग्रह बन जाती है जिसमें आवाहनकर्ता द्वारा जिस भावसे ईश्वर का आवाहन किया जाता है, उसी रूप में ईश्वर अपनी विशेष शक्ति संचारित करके अपनी ही एक प्रतिकृति बनाकर बैठ जाते है।
और प्रेत क्या करते है? प्रेतों में तो ऐसी कोई दिव्य शक्ति होती नहीं कि वो एक से अनेक बन जाए, या अपनी अमुक शक्ति संचारित कर दे। उदाहरण के लिए साईबाबा एक मृत व्यक्ति है। परंतु देशभरमें इनकी अनेक प्रतिमाएं हैं। तो साईं बाबा का असली प्रेत (जो यदि अभी है भी तो, नहीं तो कोई और प्रेत) कहींपर स्थित हो गया तो वो अपना सूक्ष्म शरीर लेकर दूसरे स्थान पर स्थित नहीं हो सकता। तो क्या करे? यहीपर प्रेतों के गिरोह का उपयोग होता है। यही गिरोह का मुखिया अन्य प्रेतों को विविध प्रतिमाओं में भेजकर उनके द्वारा भोग प्राप्त करता है।
तो फिर मनोकामनाएं कैसे पूर्ण होती है?
लौकिक मनोकामनाएं बहुत छोटी वस्तु है। वे आपके पितृ भी - यदि तृप्त है तो - पूर्ण कर सकते है। और पितृ तो प्रेत से उच्च अवस्था के जीव है, फिरभी केवल साल में एकबार श्राद्ध और कुछ कुछ वर्षों में तर्पण से तृप्त हो जाते है। परंतु प्रेत तो सतत भोग मांगते रहते है। मनुष्यों के समान ही उनको कभी संतोष नहीं होता। जितना भोग भोगेंगे, उतनी ही उनकी लालसा बढ़ेगी। जब आपसे पर्याप्त समर्पण, श्रद्धा और भोग मिल जाते है, तो आपके छोटे मोटे लौकिक कार्य वे कर देते है। परंतु फिर उनकी लालच आपसे और बढ़ जाती है।
याद रहे, प्रेत सबके सभी कार्य पूर्ण नहीं कर सकते। वे किसके कोई कोई कार्य सिद्ध कर सकते है। दूसरों के शरीर में गिरोह का प्रेत भेजकर कोई छोटमोटा निर्णय आपके पक्षमें वे ला सकते है।
वास्तवमें यह शक्ति प्रत्येक जीवित व्यक्ति के पास भी होती है। अपने मनोबल और तपोबल से व्यक्ति इस ब्रह्मांड को अपने छोटेमोटे कार्यों के लिए आदेश दे सकता है। प्रेत भी ऐसा ही कुछ करते है, पर बदलेमें बहुतकुछ अपेक्षा रखते है।
छोटीमोटी ही सही, लौकिक ही सही, यदि प्रेत मनोकामनाएं पूर्ण करते है तो ईश्वर के पास क्यों जाएं?
यहां इस प्रश्न में ऐसा भाव निहित है कि ईश्वर की भक्ति में तो बहुत मेहनत लगती है, इन प्रेत पिशाचों को तो सरलता से रिझाया जा सकता है।
1. ऐसा नहीं है कि ईश्वर की भक्ति कठिन है और वे जल्दी परिणाम नही देते। श्रद्धा से किया हुआ प्रत्येक कर्म ईश्वर तुरंत स्वीकार कर लेते है।
2. प्रेत यदि आपसे सरलता से रीझ जाएं तो तो और बड़ी समस्या है। सावधान हो जाएं क्योंकि वे आपके पुण्य और शुद्धता को देखकर आपसे आकर्षित हुए है। उनको आपके पुण्यों का फल चाहिए जो कि आपकी मनोकामनाओं से कही अधिक बड़े है। इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखूंगा।
यह बात एक उदाहरण से समझते है।
एक नादान अवस्था का बालक है जिसे चॉकलेट चाहिए। उसके मातापिता को पता है कि उसको चॉकलेट से एलर्जी है इसलिए उसको वो दिलाते नहीं है, और दुकानदार को भी बोल दिया है कि उसको चॉकलेट न दें। पर गली में एक गुंडा रहता है। बालक उस गुंडे के पास जाकर 5 रुपए की चॉकलेट के लिए दस रुपए देकर चॉकलेट दिलाने को बोलता है। गुंडा चॉकलेट दे देता है।
अब बच्चा गुंडे का फैन हो गया है। अपने मां बाप को छोड़कर सारे काम गुंडे से ही करवाता है। गुंडा अब उसे पढ़ने भी नहीं देता और अपने स्वयं के दस गंदे काम बच्चे से करवाता है। अब बच्चा बड़ा हो गया है, पर पढ़ाई लिखाई कुछ की नहीं, गुंडे के चंगुल में ऐसा फंस चुका है कि अब वो स्वयं भी जीवनभर गुंडा ही बना रहेगा।
यदि यह बच्चा अपने मातापिता की बात माना होता तो उन्होंने बच्चे को मेहनत करवाके पढ़लिखकर एक बड़ा अफसर बनाया होता। जब वो बड़ा अफसर बन जाता तो उसको छोटेमोटे कामों के लिए गुंडों की सहायता की आवश्यकता नहीं रहती। अपने सारे काम वो संवैधानिक रूप से कर सकता था और अपना सुखी जीवन जो सकता था।
यहां पढ़ाई लिखाई का अर्थ है पूजापाठ, व्रत, तपस्या इत्यादि। पढ़ाई जीवन के कुछ ही वर्ष करनी पड़ती है, पर इसका लाभ जीवनपर्यंत अनेकगुना करके मिलता है। सोचिए कि आपने अपनी पढ़ाई में कितने पैसे खर्च किए? और आप कमाएं कितना? इतना ही नहीं, इसी पढ़ाई के कारण आपका विवाह हुआ, घर, गाड़ी, संतान और सारे लौकिक और मानसिक सुख मिले।
इसी प्रकार, भगवान की भक्ति में किया गया छोटा सा भी प्रयत्न बहुत बड़ा, बहुत लंबे समय तक, और अनेक आयामी शुभ परिणाम देता है। ईश्वर की भक्ति आपको वो नहीं देती जो आप चाहते है, अपितु वो देती है जो आपके हित में है। जब आप ईश्वर को समर्पित हो जाते है तो ईश्वर आपके परम कल्याण का मार्ग स्वयं बनाते है और आपको उसपर चलाते है।
जबकि गुंडे सदैव आपसे बहुत अधिक लेकर बहुत थोड़ा ही देंगे। और जितना आप उनके समीप जाएंगे, उतना ही वे आपको अपने गुलाम बनाते जायेंगे। वे कभी आपको ईश्वर के पास जाने नहीं देंगे।
इसलिए चाहे मनोकामना लौकिक हो या अलौकिक, छोटी हो या बड़ी, उच्च हो या निकृष्ट या तो चाहे अत्यंत निंदनीय मनोकामना भी क्यों न हो, ईश्वर से ही मांगनी चाहिए।
अस्तु 🙏
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