कर्म सिद्धांत - भाग ५ - भाग्य अधिक बलवान होता है या कर्म?
हमने इस श्रृंखा ले पिछले लेख में देखा की क्या सचमें पिछले जन्म के लोग फिरसे इस जन्ममें हमें मिलते है?
आज हम लेखमें इन विषयों की चर्चा करेंगे:
- मनुष्यका भाग्य अधिक बलवान होता है या कर्म? जब सबकुछ भाग्यमें लिखा होता है तो कर्म करनेसे क्या लाभ?
- क्या कर्म करनेसे भाग्य बदला जा सकता है?
- अच्छे कर्म तो नास्तिक लोग भी करते है, तो उन्हें कैसा फल मिलता है? "मैं तो भाई कर्म में विश्वास रखता हूँ, भगवान जैसा कुछ नहीं है" ऐसा कहने वालों का क्या होता है?
- तो फिर इस कर्मफल के चक्रसे छुटकारा कैसे मिलेगा?
- क्यों भक्तों को अन्य पापियों की तुलनामें अधिक दुःख मिलता है?
मनुष्यका भाग्य अधिक बलवान होता है या कर्म? जब सबकुछ भाग्यमें लिखा होता है तो कर्म करनेसे क्या लाभ?
प्रायः लोग कहते है की भाग्य जैसा कुछ नहीं होता, मनुष्यका कर्म ही उसका भाग्य बनाता है। और भाग्यवादी कहते है, चाहे जो भी करलो, यदि भाग्य साथ नहीं देगा तो आप कुछ नहीं कर सकते।
शास्त्रोंमें इन दोनों मतों के पक्षमें बहुत बड़ी मात्रामें श्लोक मिल जाते है। किसी एक ही ग्रन्थमें एकदूसरे से विरोधाभासी कथन प्रचुर मात्रामें मिल जाएंगे। तो क्या ग्रंथकारों को ये बात समजमें नहीं आयी होगी? या हमारी ही समजमें कोई भ्रम है? चलिए देखते है।
पहली बात तो ये की भाग्य अटल होता है। जो लिखा जा चूका है उसका फल मिलकर ही रहेगा। यह बात हमारे दैनिक अनुभवकी ही है की कुछ लोग अकारण ही बहुत सारे सुख प्राप्त करते है, और कुछ लोग अकारण ही नाना प्रकारके दुःख झेलते है। इसके पीछे उनका भाग्य ही काम कर रहा होता है। यह समझने के लिए कि कुछ लोग नीच जीवन जीने के बावजूद अच्छा भाग्य क्यों पाते हैं, जबकि अन्य लोग उच्च जीवन जीने के बावजूद दुखमय जीवन क्यों पाते हैं, इस श्रृंखला का पहला लेख पढ़ें - कर्म सिद्धांत - भाग 1 - कर्म कितने प्रकार के होते हैं?
तो क्या कर्मका कोई महत्त्व ही नहीं है?
भाग्य वास्तवमें क्या है? भाग्य आपके कर्मों का ही तो फल है। अर्थात आप अपने कर्मोंसे ही अपना भाग्य बनाते है। कल का कर्म, आजका आपका भाग्य है, और आजका कर्म आपके कल का भाग्य है। आपकी पुस्तक के पिछले पन्नेमें पहलेसे कुछ लिखा जा चूका है, उसे आप मिटा नहीं सकते, पर अगला पन्ना अभी कोरा पड़ा है। लिख लीजिए आपको जो लिखना है। जितना सुमधुर और रसिक जीवन चाहते है, आप अभी लिख सकते है। इसलिए कर्म ही श्रेष्ठ है।
तो क्या कर्म करनेसे इस जन्मके भाग्य को बदला नहीं जा सकता?
जब आपका भाग्य ही आपका भूतकाल का कर्म है, तो वर्तमानमें कर्म करनेसे पुराने कर्म को क्यों नहीं बदला जा सकता? परंतु इसके लिए आपका पुराना कर्म जितना प्रबल है, उससे प्रबल आपका पुरुर्षार्थ होना चाहिए, तभी आप भाग्यको बदल सकते है। यदि हम भाग्य को बदल नहीं सकते तो इतने सारे ज्योतिषीय ग्रंथों, पूजा पाठों इत्यादि की आवश्यकता ही क्या थी? जब कुछ बदलने वाला ही नहीं है, तो भविष्य जानकार, या धार्मिक कार्य करके क्या लाभ?
अब इस पूरी बात को एक शास्त्रीय उदहारणसे समज़ते है।
उदहारण:
जब माता पारवती किशोरी अवस्थाकी हुई तब नारद मुनि उनके घर आए। उन्होंने पार्वती माताका हाथ देखकर उनके माता-पिता से कहा की यह कन्या अत्यंत ही प्रतिभाशाली है, देवता भी उसको वंदन करेंगे इतनी पूजनीय है। परन्तु इसके भाग्यमें एक खोट है। इसको एक ऐसा पति मिलेगा जिसमें सारे दुर्लक्षण होंगे। एक स्मशानमें निवास करने वाला, सांप का हार पहनने वाला, भूतों से घिरा हुआ पति मिलेगा। यह सुनकर माता-पिता तो बहुत दुखी हो गए। परंतु देवी पार्वतीने सोचा की जो भाग्य मिल चूका है, उसे तो नहीं बदल सकते, उसका श्रेष्ठ उपयोग अवश्य कर सकते है। इन कुलक्षणों वाले सर्वश्रेष्ठ वर का उन्होंने चिंतन किया तो उन्हें भगवान् महादेव दिखे। बस। उन्होंने अपने भाग्य को प्रणाम किया और महादेवजी को प्राप्त करनेके लिए तप करने लगे।
इस कथा से ये समझना है की भाग्यमें जो है वो तो मिलकर ही रहेगा, परन्तु उस भाग्य को स्वीकार करके जो भी परिस्थिति मिले उसमें सर्वश्रेष्ठ कर्म करके ही अपना उद्धार हो सकता है।
तो क्या ज्योतिषीय उपायोंसे दुखों कम किया जा सकता है?
अवश्य। यदि ये नहीं होता तो ज्योतिष की आवश्यकता ही क्या थी? भाग्य जितना प्रबल होगा, उतना ही उसका निराकरण प्रबल होना चाहिए, तभी जाकर उसका फल मिलेगा। और ज्योतिषीय उपाय केवल एकबार नहीं करने होते, समय समय पर ये उपाय करते रहने चाहिए, तभी निरंतर फल मिलता रहेगा।
अच्छे कर्म तो नास्तिक लोग भी करते है, तो उन्हें कैसा फल मिलता है? "मैं तो भाई कर्म में विश्वास रखता हूँ, भगवान जैसा कुछ नहीं है" ऐसा कहने वालों का क्या होता है?
कर्म किया है तो फल तो अवश्य ही मिलेगा। अच्छे कर्मोंका फल अच्छा ही मिलेगा। परंतु जो कर्म मनमें भगवानकी भक्ति से रहित होगा, उससे मिलने वाले फलमें भगवान् की विशेष कृपा नहीं होगी। ऐसे लोग म्लेच्छ बनकर अपने पुण्यों का भोग करेंगे। आप देख सकते है की विश्वभरमें अनेक म्लेच्छ देश के करोड़ों ऐसे लोग है जो विलासी जीवन जी रहे है। यह सब नास्तिक भाव से किए गए पुण्यों का फल है। उनको आध्यात्मिक उन्नति नहीं मिलती। ये लोग अपना भोग भोगेंगे, और फिरसे पामर योनिमें जाकर जीवन मरण के चक्कर लगाएंगे।
परंतु जब कोई पुण्य कार्य भगवान् की भक्ति के साथ किया जाता है तब उसमें वैराग्य भी जुड़ जाता है। फिर भगवान् ही आपको मुक्त कराने का दायित्व अपने ऊपर ले लेते है। वे आपको कर्मफल के चक्करमें न पड़ने के लिए प्रेरित करते है, और धीरे धीरे, अनेक जन्मों के उपरांत, आपको इस स्थितिमें ला देते है की जब आपके सारे संचित कर्म नष्ट हो जाते है, और आप भगवान् में ही लीन हो जाते है, अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेते है।
यदि सारे कर्मों से शिघ्र ही छुटकारा चाहिए तो करें?
शास्त्रोंमें अपने संचित कर्मों से शिघ्र ही छुटकारा पानेके अनेक उपाय बताए गए है। उनमेसे कुछ निम्नलिखित है:
- मन्त्र जाप/अनुष्ठान
- मन्त्रजाप और मन्त्र अनुष्ठान सबसे तिव्र गतिसे संचित कर्मोंको नष्ट करते है। महामंत्र जैसे की गायत्री, महामृत्युंजय, नवार्ण मन्त्र, षडाक्षर मन्त्र इत्यादि महापातनाशक है। इनके अनुष्ठानसे करोड़ों जन्मों के कर्म ऐसे नष्ट हो जाते है जैसे जंगल की आग पुरे जंगल को नष्ट कर देती है। परंतु इन मन्त्रों पर सबका अधिकार नहीं है, और न ही मन्त्रों का बोध ऐसे सार्वजनिक रूपसे कोई दे सकता है। और न ही मैं इसको देनेका अधिकारी हूँ। इसलिए इस विषयमें और कुछ नहीं लिखूंगा।
- नाम जाप
- यह मार्ग आजकल बहुत प्रचलित है जो की एक अच्छी बात है। मन्त्रजाप की भांति इसके नियम बहुत कठिन नहीं होते, और इसे कोई भी कर सकता सकता है। मुझे लगता है की इस विषयमें मार्गदर्शन करने वाले बहुत लोग है, इसलिए मेरा इसपर कुछ कहना आवश्यक नहीं है।
- कठोर व्रत
- शास्त्रोंमें अनेक ऐसे कठोर व्रत कहे गए है जो की बड़े से बड़े पापों के नाश करते है। "व्रतराज" ग्रन्थ में इन सभी व्रतों का पूरा विवरण दिया गया है। सामान्य रूपसे हम किसी एक दिन न खाने को ही व्रत समज़ते है, परंतु ऐसा नहीं है। जिस दिन उपवास होता है उस दिन सतत भगवान का स्मरण करना होता है, कोई क्रोध-लोभ-मोह नहीं करना होता, अधिकतर मौन रहना होता है, और अधिक से अधिक नाम या मन्त्रजप करना होता है। यही उपवास एक सार्थक उपवास है। इसके अतिरिक्त, कुछ घोर पापों के शमन के लिए अमुक कठोर व्रत भी शास्त्रों में दिए गए है, जैसे की चांद्रायण व्रत, क्रच्छ व्रत इत्यदि।
- देव सेवा
- रोज पूजा करना, मंदिर जाना, भगवान् का अभिषेक करना, सूर्य को अर्घ्य देना इत्यदि देव सेवा के कार्य अनेक जन्मों के पापों को नष्ट करने वाले होते है। मनुष्य को चाहिए के एक निश्चित व्रत लेकर आजीवन इन कार्यों को करता रहे।
- यम-नियम-स्वाध्याय
- अष्टांग योग के प्रथम दो चरण यम-नियम के साथ साथ स्वाध्याय का सर्वाधिक महत्त्व है। यम, अर्थात इन्द्रियों का दमन करना। इन्दिर्यों से जनित सारे विकारों का दमन करना ही यम है। आपके जीवनमें सातत्य और सत्व निरंतर बना रहे इसके लिए नियम आवश्यक है। किसी एक भगवतकर्म का नियम लीजिए, जीवनभर उसको करते रहिए। जैसे आप SIP करते है जिसमें रोज छोटी छोटी राशि भरते रहते है, पर निवृत्ति के समय वह एक बहुत बड़ी राशि बन जाती है, वैसे ही नियमित रूपसे किए गए कोई छोटे से धार्मिक आचरणका फल भी बहुत बड़ा होता है। स्वाध्याय का अर्थ है, नियमित रूपसे शास्त्रों का अध्ययन करना। आपके जो भी इष्टदेव है, उनके ग्रंथों का नियमित अध्ययन कीजिए।
- भगवान् की कथा श्रवण और पठन
- यदि ऊपर दिए गए उपायोंमेंसे कुछ भी नहीं कर पाएं, तो केवल नियमित रूपसे भगवान् की कथाओं का नियमित श्रवण और पठन ही कर लीजिए। इससे भी आपका उद्धार हो जाएगा। परन्तु कथा का श्रवण किसी अधिकारी पुरुष से ही कीजिए। हर चलते फिरते बाबा बाबी से नहीं।
- प्रायश्चित कर्म
- न चाहते हुए भी हमसे कोई न कोई पाप ही जाते है। केवल चलने फिरने और साँस लेनेसे भी जिव हत्या होती है, जिसका भी पाप लगता है। ऐसे छोटे छोटे पापों के लिए रोज पूजा के समय भगवान से क्षमा मांगकर प्रायश्चित करें। बड़े बड़े पापों के प्रायश्चित लिए अनेक ग्रंथोंमें पाप के प्रकार के आधार पर विविध उपाय बताए गए है। उन उपायों को करनेसे, और फिरसे ऐसे पाप न करनेका संकल्प लेनेसे इन पापों का शमन हो जाता है।
क्यों भक्तों को अन्य पापियों की तुलनामें अधिक दुःख मिलता है?
- मानसिक कर्मों की क्या गति होती है?
- क्या मन-ही-मन किसी को गाली देने से, किसी का अहित चाहने से, या मन-ही-मन भगवान का स्मरण करने से फल मिलता है?
- क्या ऑनलाइन हिंसक वीडियो गेम खेलने से या हस्तमैथुन करने से पाप लगता है?
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