हिन्दू संस्कृति इतनी उत्कृष्ट होनेके बाद भी आज हिन्दुओंकी स्थिति इतनी दयनीय क्यों है?

प्रश्न: इतिहासमें हिंदू इतना शक्तिशाली था, इसके अपने इतने देश थे वह क्यों मार खाता रहा? हिन्दू धर्म आज सबसे पवित्र और कल्याणकारी धर्म है, अन्य तो सारे अधर्म ही है, तो फिर हिन्दुओं की आज इतनी दयनीय स्थिति क्यों है?

उत्तर: इस भूमण्डलमें आर्य जाति केवल हम हिन्दू ही है, अन्य सभी मलेच्छ जातियां है। इतिहासका अवलोकन करनेपर समझ आता है की पिछले २००० वर्षों में अलग अलग म्लेच्छ जातियां अपने वैभव और सुख के चरम पर थी। कभी शक, कभी हुण, कभी मंगोल, कभी अरब तो आजकल आंग्ल प्रजा (current white race) अपने वैभव के चरम पर है। इन प्रजाओंने ऐसा क्या कर्म किया है जो इतना सुख पा रहे है?

शास्त्रों के अनुसार नास्तिक लोग जब ईश्वरार्पण की अनिच्छासे पुण्य कर्म करते है तो उनको म्लेच्छ देशोंमें वैभवशैली जीवन जिनका फल मिलता है। ऐसे लोग अपना फल भोगकर फिरसे पुण्यशुन्य हो जाते है और कर्मों के बंधनमें बंधते है। जबकि जब कोई आस्तिक व्यक्ति ईश्वर के प्रति प्रेम को ही केन्द्रस्थानमें रखकर पुण्य करता है वह भारत देशमें सुख भी भुगतता है और आध्यात्मिक प्रगति भी करता है। 

यदि आप देखें तो इन सब विविध म्लेच्छ जातियों के वैभव का समय दीर्घकालीन नहीं होता है। ये लोग कुछएक सौ वर्षोंमें नष्ट हो जाते है। जबकि भारत देश लाखों वर्षोंसे विश्वपटल पर शिरमौर ही रहा है। इतिहासके इतने बड़े पटलमें पिछले ७-८०० वर्ष कोई बड़ा समयकाल नहीं है। और हमारा देश पुनः वैभव की ओर अग्रेसर हो भी चूका है जो की दीर्घकालीन रहेगा। 

मनुष्यके विविध कर्मों की गति कैसी होती है? क्या स्वर्ग या नर्क जैसा कुछ होता है? अगला जन्म मिलनेके क्या नियम है? कर्मबन्धन से कैसे छुटकारा मिल सकता है? इत्यादि प्रश्नों के उत्तर के लिए पढ़िए मेरी कर्म सिद्धांत श्रृंखला। 

फिरभी, हमारी भूमि पुण्यभूमि होनेके उपरांत भी, मलेच्छों के हाथों हिन्दुओं की इतनी बड़ी दुर्गति कैसे हो गई?

समयचक्र अपना काम करता है। जबतक देवी देवताओं की पूजा होती रहेगी, कलयुग आगे नहीं बढ़ेगा। एक समय पूरी पृथ्वी पर देवताओं की पूजा होती थी।

कालचक्र में कलयुग सबसे छोटा है। सतयुग के 16 लाख वर्ष, त्रेता के 12 लाख, द्वापर के 8 और कलयुग के केवल 432000 वर्ष। और इस कलयुग में भी बार बार धर्म की पुनःस्थापना होती रहेगी। कलयुग के अंदर भी छोटे छोटे सतयुग इत्यादि आते रहेंगे।

एक चतुर्युगी का कुल समय 40 लाख वर्ष से अधिक है। इसमें घोर कलयुग का समय 2 लाख वर्ष से अधिक नहीं है। हमने केवल 1 हजार वर्ष का कठिन इतिहास देखा है।

ये तो इस संसार की नियति ही है। कली राक्षस भी भगवान का भक्त ही है। जैसे स्वादिष्ट पकवान में थोड़ी मिर्ची आवश्यक होती है इसी प्रकार कालचक्र में कलयुग का होना भी अनिवार्य है।

और ऐसा भी नहीं कि हमारे भाग्य ही फूटे है जो हमने इस समय जन्म लिया। हम सतयुग में भी थे, द्वापर, त्रेता हर समय थे। पर हम अपनेआपको मुक्त नहीं कर पाए।

वास्तवमें कलयुग हमारे जैसे मूर्खों के लिए ही बना है जो अपने आपको अन्य युगों के सुख में मुक्त नहीं कर पाए।

कलयुग के अनेक दुर्लक्षण है, पर एक बहुत अच्छा गुण है। जो सतयुग में हजारों वर्षों की कठोर तपस्या से फल मिलता है, वो कलयुग में केवल भगवान का नाम लेनेसे मिलता है। कलयुग में दुख ही इतने होते है कि व्यक्ति को अपनेआप वैराग्य आ जाता है, उसको फिरसे जन्म लेनेकी इच्छा ही नहीं होती। इसमें यदि भगवान की भक्ति मिल गई तो मुक्ति निश्चित है।

अब कोई महामूर्ख ही होगा जो ऐसा सुनहरा अवसर जाने देगा। और हम सब यही महामूर्ख है। भगवान हम सबको सद्बुद्धि देनेकी कृपा करें 🙏

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