आजकल के सामान्य लोगों की तो क्या बात करनी, कुछ धर्माचार्य और कथावाचक भी कहते रहते है की रामजीको सीता माता का त्याग नहीं करना चाहिए था। हमारे लाखों वर्षों के इतिहासमें किसीभी ग्रंथमें या किसीभी मान्य संप्रदाय के आचार्यने ये कभी नहीं कहा, पर ये आजकल के महाज्ञानी लोग - नारीवादियों के प्रभावमें आकर - अनर्गल प्रलाप कर रहे है क्योंकि उनको शास्त्रों को समजनेकी यथार्थ दृष्टि नहीं है।
चलिए देखते है की इन निर्लज्जों के द्वारा प्रभु श्री राम के ऊपर क्या क्या आरोप लगाए जाते है।
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मेरा अपना मंतव्य
सर्प्रथम तो मैं अपना मंतव्य बता दूं. मैं प्रभु श्री राम और माता जानकी का - और समस्त पंचदेवों का - भक्त हुं। इसलिए उन्होंने कुछ भी गलत किया ऐसा मैं न सोच सकता हुं, न मान सकता हुं। भगवान् के अवतारोंकी लीला रसास्वादन के लिए होती है, भावविभोर होनेके लिए होती है, भक्ति के सागरमें डूबनेके लिए होती है........ टिका-टिपण्णी, आलोचना, तर्क-वितर्क-कुतर्क करनेके लिए नहीं होती। अवतार कुछभी गलत नहीं करते। प्रत्येक हिन्दू का शास्त्रों के प्रति दृष्टिकोण यही दृष्टिकोण होना चाहिए।
फिरभी जब मुर्ख लोग कुतर्क कर ही रहे है तो उनका तार्किक खंडन करना भी अनिवार्य है। इसलिए अब देखते है की इस विषय पर क्या क्या कुतर्क दिए जाते है।
पूरा उत्तरकांड ही प्रक्षिप्त है
सीता त्यागका प्रसंग उत्तरकाण्डमें ही आता है। तो क्यों न पुरे उत्तरकाण्ड को ही प्रक्षिप्त बता दिए जाए! आजकल सबसे अधिक तर्क यही दिया जा रहा है। इसका लाभ यह है की ऐसे लोगों को कोई शास्त्रीय चर्चा नहीं करनी पड़ती। बस बोल दिया की उत्तरकाण्ड जैसा तो कुछ पहले था ही नहीं, "पोंगा पंडितोंने" इसको जबरन घुसेड़ दिया है। आर्यसमाज जैसी आसुरी विचारधारा वाली संस्थाएं जबतक ऐसा कहती थी तबतक फिरभी ठीक था, पर अब तो परंपरागत संतोंमेंसे भी कुछ लोग ऐसा कहने लगे है। इन लोगों का ऐसा कहनेका आधार निम्नलिखित है।
- रामायण के पूर्व भागके समापनमें उसकी फलश्रुति आती है, जिसमें रामायण को पढ़नेसे होने वाले लौकिक और पारलौकिक लाभों को बताया गया है। इसका अर्थ है की रामायण यहांपर समाप्त हो जाती है।
- उत्तर: फलश्रुति तो प्रत्येक अध्यायके समापन पर भी आती है। प्रत्येक स्तुति के अंतमें भी आती है। तो क्या रामायण वहीँ समाप्त हो गई? स्वाभाविक रूपसे पूर्व रामायण समाप्त होना एक बड़ा सीमाचिन्ह है। यहापर फलश्रुति आना स्वाभाविक ही है। किसी भी पौराणिक या ऐतिहासिक ग्रन्थ की यही शैली है। इस क्षेत्रमें बिलकुल अनपढ़ व्यक्ति ही ऐसा कुतर्क दे सकता है।
- पूरा उत्तरकाण्ड तो प्रक्षित्प नहीं है, पर सीता त्याग वाला प्रसंग ही प्रक्षिप्त है
- ऐसा कहने वाले कुछ मान्य सम्प्रदायों के आचार्य है। परन्तु उनकी ही गुरु परंपरामें उनके ही पूर्वाचार्योंने न केवल सीता त्याग वाले प्रसंग को प्रामाणिक माना है, अपितु उसपर टिका भी लिखी हुई है। अर्थात ये आजकलके मार्डन आचार्य अपने ही गुरुओं के पक्षका विरोध कर रहे है। तो अब इन लोगों की क्या ही विश्वसनीयता रह जाती है?
- केवल वाल्मीकि रामायण ही नहीं, सारी मान्य और प्रचलित रामायणों में - जैसे की रामचरित मानस, कम्ब रामायण, अद्भुत रामायण इत्यादि सबमें सीता त्याग के प्रसंग का वर्णन आता है। तो क्या सारी की सारी रामायण एकसाथ प्रक्षिप्त हो गई?
इसके अतिरिक्त इन लोगों के पास उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त सिद्ध करनेके लिए और कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए यह पक्ष सर्वथा खंडित हो जाता है की श्री राम ने सीता माता का त्याग किया ही नहीं था, ये तो पोंगा पंडितोंने घुसा दिया है।
अब आगे बात करते है इस घटना पर हो रहे तर्क-वितर्क की।
रामजी सीता माता से इतना प्रेम ही नहीं करते थे। सारे पुरुष एक जैसे ही होते है!
यदि प्रेम न करते होते तो क्या इतनी दूर रावण जैसे राक्षस से अकेले लड़ने निकल पड़ते? वानर सेना तो बादमें आई। उनको क्या पड़ी थी? वे तो एक चक्रवर्ती सम्राट थे। जगत की कोई भी महासुंदरी या कोई भी अप्सरा से वे दूसरा विवाह कर सकते थे। यदि प्रेम नहीं करते थे तो सीता माता को पहले ही छाया सीता से बदलकर सुरक्षित क्यों कर लिया?
सीता माता को कितना आघात लगा होगा उनका त्याग होनेपर!
पहली बात तो ये की ये निर्णय केवल रामजी का नहीं था। ये रामजी और माता जानकी का संयुक्त निर्णय था।
किसीभी रामायणमें कहीं भी सीता माता को श्री राम के द्वारा लिए गए इस निर्णय पर प्रश्नचिन्ह उठाते हुए नहीं बताया गया है, अपितु उन्होंने ही अपने त्याग के लिए पूर्ण सहमति दर्शाई थी, और इस निर्णयको धर्मानुकूल बताया था। आपको सीताजी का त्याग हुआ था ये रामायण पढ़कर ही पता चला ना? तो फिर उसी रामायणमें लिखा है की सीताजी इस निर्णयसे पूर्णतः सहमत थी तो आप को क्या अधिकार है इससे असहमत होनेका, और कहनेका की रामजी का ये निर्णय गलत था? क्या सीताजी ने ऐसा कभी कहा? सीताजी की बात छोड़िए, क्या कभी जनक महाराजने भी रामजी से कोई प्रश्न किया? नहीं किया, क्योंकि विदेहराज एक महाज्ञानी पुरुष थे, और वे राजधर्म जानते थे।
आप अपने मनोविकार भगवानों पर मत थोपिए।
सीताजीने तो विरोध नहीं किया, पर एक पति के नाते रामजी को ऐसा नहीं करना चाहिए था
पति तो सब होते है। राजा भी बहुत होते है। पर क्या रामजी कोई साधारण राजा थे? उनका जन्म आदर्शोंको प्रस्थापित करनेके लिए हुआ था। केवल उनका ही नहीं, माता सीता का अवतार भी एक आदर्श नारी के चरित्र को चरितार्थ करनेके लिए हुआ था। और आदर्श राजा-रानी वही है जो अपनी प्रजा के लिए अपना निजी जीवन ठुकरा दें। चाहे एक भी अपवाद हो, पर जब प्रश्न निजी चरित्र पर आ जाता है तो राजा-रानी के लिए यह कर्तव्य बन जाता है की प्रजा की आस्था को सुद्रढ़ रूपसे बनाए रखें। आप ही सोचिए, आप कैसे राजा-रानी पसंद करेंगे? एक जो अपने निजी जीवन को प्राधान्य देकर प्रजा की भावनाओं की अवगणना करे, या ऐसा राजा-रानी जो की केवल और केवल प्रजा के लिए समर्पित हो?
पर धोबी का प्रलाप बीभत्स था, उसको लेकर ऐसा कठोर निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए
देखिए, रामजी उस समय मनुष्यवतारमें थे और उन्होंने कृष्णावतार जैसी कोई भव्य लीलाएं भी नहीं की थी जो की केवल भगवन ही कर सकते थे। वो इसलिए क्योंकि रावण को केवल कोई मनुष्य ही मार सकता था। इसलिए अयोध्या की प्रजा के लिए तो वे केवल एक राजा ही थे। भगवान नहीं। इसलिए एक साधारण व्यक्ति जो अपने राजा-रानी के चरित्रके विषयमें शंका कर सकता है, वही शंका धोबीने की।
अब यहाँ यह समझना आवश्यक है की हम यहांपर त्रेता युग की बात कर रहे है। इस कलयुग के आपके मापदंडों से उस समयकी घटनाओं पे निर्णय नहीं दिया जा सकता। वह समय सतियों का था। सती सावित्री, सती अनुसूया, सती सुलोचना (मेघनाद की पत्नी) इत्यादि महान स्त्रियां उसी समय हुई थी, और ऐसी ही स्त्रियां समाज के लिए आदर्श थी (सती क्या होती है, और एक पतिव्रता स्त्री कैसी होनी चाहिए इस विषय पर मेरा लेख यहाँ पढ़ सकते है -
क्या भारत में वास्तव में सती प्रथा थी? शास्त्रों की दृष्टि से 'सती' का अर्थ क्या है? क्यों स्त्री को पतिव्रता होना चाहिए?)। रामजी के अपने ही घरमें लक्ष्मणजी की पत्नी उर्मिला समस्त पत्नियों के लिए एक त्यागमूर्ति थी। स्वयं सीताजी से भी उनका त्याग अधिक महान था। यदि रामजी राजा होकर सीताजी को अपने साथ ही रख लेते तो उन सब आदर्श स्त्रियों का क्या? जब आप राजा है, तो आपका निजी जीवन भी प्रजा के आदर्शों से उत्तम स्तर का होना चाहिए, अन्यथा प्रजामें कभी न कभी, कोई न कोई ऐसा फूहड़ व्यक्ति मिल ही जायेगा जो राजा के चरित्र का योग्य या अयोग्य उदहारण देकर अपनी भूलों को ढकता रहेगा। रामजी की प्रजा को तो छोड़िये, आजके हमारे लोग ही रामजी के उदाहरण देकर अपने व्यभिचारको सही ठहरानेकी फूहड़ता करते होते। प्रभु श्री राम और माता जानकी जैसे आदर्श राजा-रानी ऐसा अवसर कभी देने वाले नहीं थे। उन्होंने अत्यंत ही दूरदर्शिता दिखाकर, अपने प्रेम जीवनका त्याग करके समाज के लिए एक सर्वोच्च आदर्श रख दिया।
इस प्रकार, धोबी का प्रलाप भी अकारण तो नहीं था। जब पूरा समाज ही इतने उद्दात आदर्शों के साथ जी रहा हो, तो वे अपने राजा से इन आदर्शों के साथ जीनेकी अपेक्षा रखें ये स्वाभाविक ही है। आजके समयमें भी क्या आप किसी ऐसे प्रधानमंत्री को स्वीकार कर सकते है जो की समाज के आदर्शों से तनिक भी नीच आदर्श वाला जीवन जी रहा हो?
तो माता सीता ने इतना बड़ा त्याग करके अपने समय की सबसे महान सतियों से भी बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त कर लिया, जो की एक महान रानी के लिए उचित ही है।
जब मानना ही नहीं था तो फिर अग्निपरीक्षा क्यों ली?
मूर्खों के द्वारा ऐसे फ़िल्मी डायलॉग ठोकना कुछ समयसे फैशन बन चूका है। चलो देखते है।
अग्निपरिक्षा तीन कारण से ली थी:
- छाया सीताजी से असली सीताजी को वापस लाना था
- समाज के संतोष के लिए यह अनिवार्य था। रामजी तो सर्वज्ञ है, वे तो सब जानते ही थे। पर न केवल अयोध्या वासियों के लिए, अपितु भविष्यमें रामायण पढ़ने वाले समस्त आस्तिकों की शंकानिवरण हेतु अग्निपरीक्षा अनिवार्य थी। वहांपर पूरी अयोध्या तो उपस्थित नहीं थी, पर लाखो साक्षी अवश्य ही उपस्थित थे। यही कारण है की अयोध्या की अधिकांश जनताको सीताजी की पवित्रता पर कोई संदेह नहीं था। और यही कारन है की आज भी उनकी पवित्रता पर कोई प्रश्न नहीं करता। इसलिए अग्निपरीक्षा अनिवार्य थी।
- भविष्यमें रामजी के दो पुत्रों को समाजमें सर्वस्वीकृति मिले इसलिए भी यह आवश्यक था। अपितु कोई भूलकर भी लव कुश की माता के ऊपर कोई लांछन ना लगा दे, इसलिए अंतमें भी सीताजीने एक अतिरिक्त परीक्षा देते हुए धरतीमें समा गई। रामजी की लीला तो समाप्त होनी ही थी। सभी भक्तों के साथ लक्ष्मी-नारायण को तो स्वधाम तो जाना ही था। तो फिर क्यों न एक अपवाद को सदा के लिए शमन करके ही स्वधाम जाया जाए? इसीलिए माता वैदेहीने भूगर्भ गमन किया।
पर गर्भवती अवस्थामें सीताजी को रामजीने इतना दुःख क्यों दिया?
इसलिए क्योंकि वे नहीं चाहते थे की उनके पुत्रों और पत्नी पर कोई लांछन आए। यह कार्य लव-कुश के जन्म से पहले ही करना अनिवार्य था। लव-कुश जब बड़े हो गए, तब भी उन्होंने पूरी अयोध्यामें अपना कौशल और पवित्रता दिखाकर यह सिद्ध किया की वे एक पवित्र माता-पिता के पवित्र राजकुमार है। यह इतना अनिवार्य था की स्वयं रामजी की ही माया से उनके सभी महान योद्धा लव कुश से युद्धमें परास्त हो गए।
और ऐसा भी नहीं की रामजीने माता जानकी को ऐसे ही त्याग कर दिया था। उन्होंने सीताजी के लिए वाल्मीकि आश्रममें पहलेसे सारी व्यवस्था कर राखी थी। लक्ष्मण स्वयं उन्हें वहां छोड़ने गए थे। वाल्मीकि रामायणमें यह स्पष्ट रूपसे आता है।
इसके अतिरिक्त, अमुक रामायणोंके अनुसार, श्री रामने राजा जनक के द्वारा सभी प्रकार की व्यवस्था करवाई थी, और समय समय पर उनके समाचार भी लेते थे। क्या आपने सोचा की क्यों कभी राजा जनकने रामजी से सीता त्याग को लेकर कोई प्रश्न नहीं किया? इसलिए क्योंकि वे भी राजधर्म जानते थे, और वे ये भी जानते थे की रामजी सीताजी के कुशल मंगलका पूरा ध्यान रख रहे है।
सीताजी का त्याग बड़ा था। हम सीताजी को मानेंगे, रामजी को नहीं।
आप विश्वास करें की न करें, ऐसे भी लोग है जो कहते है की "हम तुम्हारे राम को नहीं मानते क्योंकि उन्होंने सीताजी के साथ अन्याय किया था। हम सीताजी को मानते है क्योंकि उनका त्याग बड़ा था". वैसे तो हमें ऐसे मूर्खों से कोई चर्चा ही नहीं करनी चाहिए, पर चूँकि इसी विषय पर ये लेख है इसलिए इसका भी उत्तर दे देता हूँ।
माता सीता का त्याग निःसन्देश अभूतपूर्व था। उन्होंने एक रानी के राजधर्म के लिए अपने पति से दूर रहना स्वीकार कर लिया। पर क्या रामजी उनसे दूर रहकर प्रसन्न थे? रामजीने आजीवन दूसरे विवाह नहीं किए, जबकि संसार की कोई भी सुंदरी उनके लिए उपलब्ध हो सकती थी। वे आजीवन उपवासी रहे और भूमि पर ही सोए, जैसे जानकीजी सोती थी। माता सीता के लिए तो उनकी संतान साथ ही थी, इसलिए थोड़ा कम वियोग लगा होगा, पर रामजी के साथ तो उनका अपना कोई नहीं था। पूरा दिन राजकाज करके वे अपने महलमें आएं तो भी उन्हें क्या ही मिल जाने वाला था? किसको देखने के लिए घर आते? जब पता चल गया की उनके दो पुत्र हो चुके है, तो आप कल्पना करिए की उनको देखने के लिए रामजी का मन कितना लालाइत रहता होगा। क्या ये त्याग कम है?
सीताजी के साथ रामजी को भी वनमें चले जाना चाहिए था। राज तो कोई भी कर लेता।
इस तर्कमें यह भाव निहित है की रामजी के लिए सीताजी अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए थी, अपना राज नहीं। ये तो पलायनवाद हो जाता! रामजी यदि ऐसा नहीं करते तो एक आदर्श राजा का उदहारण कैसे प्रस्थापित होता? यदि उनके लिए राज्य से महत्वपूर्ण सीताजी का साथ ही होता तो वे सीताजी का त्याग ही क्यों करते? एक अपवाद के लिए वे अपना निजी जीवन क्यों नष्ट करते? सीताजी का वनवास इसीलिए हुआ क्योंकि राम-सीता को एक आदर्श राजा-रानी का उदाहरण प्रस्तुत करना था।
इस प्रकार किसीभी कुतर्क से राम-सीता का यह निर्णय अयोग्य नहीं था।
पुनः मैं कहूंगा की यदि आप एक भक्त है तो ऐसी शंका कभी नहीं आणि चाहिए की भगवन कुछ भी अनुचित कर सकते है। वे जो भी करते है, वही उचित होता है, वही धर्म होता है। हमारी ही बुद्धि की ये सिमा होती है की हम उनको समझ नहीं पाते।
🙏 जय सियाराम 🙏
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