वर्ण व्यवस्था का विज्ञान और उसकी की सार्थकता

लेख के आरम्भ होनेसे पहले ही लिख देता हूँ की मैं केवल और केवल जन्म से वर्ण व्यवस्था मानता हूँ, और जो कर्म से यह व्यवस्था मानते है उन्हें मैं महामूर्ख मानता हूँ। ऐसे लोग यदि मुझसे चर्चा (शाश्त्रार्थ नहीं, चर्चा) करना चाहे तो मैं तैयार हूँ। अब आगे...

किसी प्रजातिके वंश की शुद्धि का क्या महत्त्व है ये तो कहनेकी आवश्यकता ही नहीं है। आज यदि हम देखें तो कुत्ते, बिल्लियां, घोड़े पालने वाले लोग भी अपने पालतू प्राणी के वंश (नस्ल) के बारेमें अत्यधिक सावधान होते है। कुछ लोग तो अपने कुत्तोंके २०० साल की पीढ़ियों का नाम, पता और प्रमाणपत्र रखते है। दुर्भग्यसे लोगोंमें मनुष्य के बीज-अंशकी शुद्धताकी कोई चिंता नहीं रही है। यदि ऐसा कहा जाए की आंतरजातीय विवाहसे वर्णसंकरता व्याप्त होती है और मनुष्योंकी गुणवत्ता कम होती है, तो पता नहीं कितने ही लोग लड़ने आ जाएंगे। जबकि यह बात १००% वैज्ञानिक और सरलतासे समझी जा सकती है। तो मुझे लगता है की इस विषयमें तो इतना कुछ लिखनेकी आवश्यकता नहीं है, पर वर्णव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलु है जिसके ऊपर बहुत कम लिखा गया है, और वो है, वर्ण व्यवस्थाका सामजिक विज्ञान। 

क्या है वर्ण व्यवस्थाका सामाजिक विज्ञान?

वर्ण यह व्यवस्थाके अनुसार समाजमें सबके लिए रोजगार आरक्षित था और उनके दैनिक कारभार के अनुसार ही सबके लिए अनुकूल आध्यात्मिक नियम दिए गए थ।  इन नियमों का पालन करनेसे सबके लोक और परलोक दोनों ही सिद्ध होते थ।  कल्पना करिए की यदि किसी व्यक्ति को अपने या अपनी आने वाली पीढ़ियों के रोजगार के लिए कोई चिंता नहीं है, उनकी स्त्रियों के लिए पूरी सुरक्षा है, उनकी कुल परम्पराएं अनवरत चलती ही रहने वाली है, तो फिर उस व्यक्ति को अपने जीवन में कौनसी चिंता रह जाएगी? वह बहुत सरलता से अपनी आध्यात्मिक साधना कर पाएग। 

अभी के लोगों की समस्या ही यही है की कल क्या होगा यही नहीं पता, तो अगली पीढ़ी की तो क्या ही बात करें।  ऐसे में व्यक्ति चाहे तो भी क्या ही साधना कर लेगा? आज लोगों के लिए किसी एक बात की भी सुरक्षा नहीं है।  न ही किसीके पास समय है।  लोग अपना स्वयं का नहीं कुछ देख पाते, समाज के लिए क्या कर लेंगे?

पुराने समय में समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी धर्म पर आरूढ़ था। 

क्षत्रिय

क्षत्रिय को पता था की उसका कर्म ही रक्षा करना है।  उसको यह भी पता था की युद्ध में वो मर भी जायेगा तो भी उसके परिवार की सुरक्षा अन्य समाज ले ही लेगा। एक unwritten contract हुआ करता था क्षत्रियों और अन्य समाजों के बिच। 

ब्राह्मण

ऐसे ही ब्राह्मणों के लिए धन एकत्रित करना वर्ज्य था, परन्तु उनके घर को चलाने का भार समाज पर था।  इसलिए ब्राह्मण को बिना धन एकत्रित करनेकी चिंता करे अपनी साधना, और लोक कल्याण का कार्य करनेके लिए पूरा समय मिल जाता था। 

शूद्र 

शुर्द्रों के लिए प्रत्येक प्रकार की नौकरियां उपलब्ध थी। सारे इंजीनियर शूद्र ही होते थे।  उनको अपने विषय से अधिक विषय पढनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी। 

वैश्य 

वैश्य सुख से व्यापर और खेती कर सकते थे क्योंकि उनको कभी "lebor प्रॉब्लम" नहीं होने वाली थी।  न ही सुरक्षा की समस्या होने वाली थी। 

सब अपना अपना काम सुख से करते थे और अपना लोक और परलोक दोनों ही सुधार लेते थे।

वर्ण समुदाय आधारित न्याय व्यवस्था

न्याय व्यवस्था बिलकुल विकेन्द्रित थी। अधिकतर केस तो समाज के आगेवान अंदर ही अंदर निपटा लेते थे। बहुत काम केस पंचायत तक जाते थे।  और राजा तक तो कोई केस जाना बहुत बड़ी बात हो जाती थी। समाज के अपने नियम स्वयं बनता था, इसलिए उसका पालन भी स्वयं ही करते थ।  क्योंकि वे उनके अपने नियम थे। 

अब आज हमारा संविधान कुछ १०-१५ लोगों ने मिलकर इधर उधर से उठाकर बना दिया।  किसीसे कुछ पूछा ? जो संविधान कश्मीर में लागु हो रहा है वही नियम कन्याकुमारी में लागु है।  क्या इन दोनों संस्कृतियों में कोई साम्यता है? जब संविधान बनाने में जनता की भागीदारी ही नहीं है तो कोई इसका क्यों पालन करे?

क्या दिल्ली में रह रहे लोगों और उड़ीसा के बीहड़ जंगलों में रह रहे लोगों के समाज के नियम एक हो सकते है? कभी नही। 

पुराने समय में एक ही स्थान में रह रहे लोग अपने अपने छोटे छोटे समाजों के लिए स्वयं ही नियम बनाते थे और स्वयं ही पालन करते थे।  उनके अपने ही लोग न्यायाधीश होते थे जो की उनके समाज में सबसे सन्मानित व्यक्ति हुआ करते थे।  अब ये न्याय व्यवस्था कितनी सुदृढ़ होगी ?

और आज देख लो।  सुप्रीम कोर्ट में डेढ़ दो करोड़ केस पेंडिंग है, हाई कोर्ट में ३-४ करोड़ होंगे और सेसंस कोर्ट में तो नजाने कितने ही होंगे।  न्याय की किसी भी परिभाषा में ये "न्यायलय" नहीं है।

वर्तमान लोकतंत्र का जो स्वरुप है वो इतिहास का सबसे निकृष्ट स्वरुप है।  लोकतंत्र के नामपर जंगलराज ही चल रहा है। वर्णाश्रम रचित राज व्यवस्था ही श्रेष्ठ थी जिसमें क्षेत्रीय और चक्रवर्ती राजाओं द्वारा साशन चलाया जाता था। 

आज इस जगत के किसी भी लोकतान्त्रिक देश को लोकतंत्र से कोई लाभ हुआ नहीं दिख रहा है।  जो इससे अतिरिक्त और कोई भी घटिया से घटिया दिखने वाली व्यवस्था चला रहे है, वे अच्छी से अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था से बढ़िया साशन चला रहे है।

भारतमें लोकतंत्रकी यथार्थता पर इसी ब्लॉग में मेरा एक लेख श्रृंखला है। इच्छुक पाठक वह श्रृंखला पढ़ सकते है। 

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